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Hans Raj Khanna Death Anniversary: भारत का वो जज जिसने पूर्व PM इंदिरा गांधी से टकराने की हिम्मत दिखाई थी

Hans Raj Khanna Death Anniversary: 25 फरवरी 2008 को न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की मृत्यु के बाद ऑस्ट्रेलियन लॉ जर्नल नें शोक संदेश में लिखा कि वो भारत के महान न्यायाधीश थे।

Hans Raj Khanna Death Anniversary: कानून की रक्षा के लिए इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़े हो गए थे हंसराज खन्नाHans Raj Khanna Death Anniversary

Hans Raj Khanna Death Anniversary: भारत देश में कई देशभक्तों नें जन्म लिया जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ लूटा दिया। उन्हीं देशभक्तों में एक थे हंसराज खन्ना। उन्होंने उस समय अपनी हिम्मत का परिचय दिया, जब बाकी सभी ने देश के लोगों पर हो रहे अन्याय के आगे अपना सर झुका दिया था। लेकिन एक अकेले हंसराज खन्ना थे, जो अड़े रहे। वो अकेले ऐसे शख्स थे जिन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला लेने की हिम्मत दिखाई।

कौन थे हंसराज खन्ना

हंसराज खन्ना का जन्म 1912 में पंजाब के अमृतसर में हुआ था। वो स्वतंत्रता सेनानी सरब दयाल खन्ना के पुत्र थे। उन्हें बचपन से यही शिक्षा मिली थी कि अन्याय के सामनें अपना सिर कभी नहीं झुकाना चाहिए। इसलिए उन्होंने लॉ में स्नातक किया और अमृतसर में ही वकालत पूरी की। उनको हैबियस कॉरपस के लिए देश भर में एक निडर और साहसी जज के तौर पर जाना जाता है।

क्या था हैबियस कॉरपस केस

12 जून 1975 के बाद इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री के अधिकार छीन लिए गए थे। उन्हें बस प्रभावहीन प्रधानमंत्री के तौर पर पद संभालना था। न वो वोट कर सकती थी और न हीं उन्हें लोकसभा में कुछ बोलने का अधिकार था। अपनी इस बेइज्जती से इंदिरा गांधी गुस्से से बौखला गई। उन्होंने अपने पद का गलत फायदा उठाया और खुद को डिक्री द्वारा शासन (Rule by Decree) का अधिकार दे दिया। जिसके अन्तर्गत अब देश में वो ही सर्वेसर्वा थीं। उनके बनाए गए कानून को चुनौती देना का हक किसी को नहीं था। वो उस समय देश की तानाशाह बन गई थीं। इसी दौर में उन्होंने एक कानून लागू कर दिया कि कोई भी ऐसा व्यक्ति कोर्ट में न्याय के लिए अपील नहीं कर सकता था। जिसके साथ बुरा बर्ताव हुआ हो या फिर जिसके परिवार के सदस्यों को बिना किसी कानूनी अधिकार के ही हिरासत में ले लिया गया हो।

पैनल हुआ था गठित

इस कानून की जांच के लिए एक पैनल गठित हुआ था। जिसमें 5 जजों को शामिल किया गया था। मुख्य न्यायाधीश अजित नाथ राय, जस्टिस बेग, जस्टिस भगवती, जस्टिस हंसराज खन्ना और जस्टिस चंद्रचूड़ इस पैनल का हिस्सा थे। लेकिन इनमें से किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो इंदिरा गांधी के विरुद्ध जा सके। अकेले हंसराज खन्ना ही ऐसे जज थे जिन्होंने हिम्मत दिखाई। उन्होंने न्याय का साथ नहीं छोड़ा।

उन्होंने महाधिवक्ता से पूछा कि भारतीय संविधान में नागरिकों को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. आपातकाल में यदि कोई पुलिस अधिकारी केवल व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण किसी व्यक्ति की हत्या कर देता है, तो क्या आपके अनुसार मृतक के संबंधियों को न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं है?

जिसके जवाब में महाधिवक्ता नें कहा कि जब तक आपातकाल जारी है तब तक ऐसे व्यक्तियों को न्याय पाने का कोई रास्ता नहीं है। लेकिन फिर भी उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदला। जिसके लिए आज भी उनके साहस को याद किया जाता है।

उस केस में 4-1 के बहुमत से फैसला लिया गया कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को आपातकाल के दौरान अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ चुनौती देने का अधिकार नहीं है।

25 फरवरी 2008 को हुई मृत्यु

न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की मृत्यु के बाद ऑस्ट्रेलियन लॉ जर्नल नें शोक संदेश में लिखा कि न्यायमूर्ति एचआर खन्ना भारत के महान न्यायाधीश थे और सारे राष्ट्रमंडल देशों के न्यायाधीशों के लिए सत्यनिष्ठा का एक आदर्श थे।

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