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Chandra Shekhar Azad Jayanti 2019: जानें कब और कैसे 15 साल की उम्र में चंद्र शेखर तिवारी बने 'आजाद'

Chandra Shekhar Azad Jayanti 2019/ भारत मां का सपूत, आजादी के महानायक और अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजाने वाले चंद्र शेखर आजाद का आज जन्म दिवस है। आज उनकी 103 वीं जयंती मनाई जा रही है। आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव में 23 जुलाई 1906 को हुआ था।

Chandra Shekhar Azad Jayanti 2019: जानें कब और कैसे 15 साल की उम्र में चंद्र शेखर तिवारी बने आजाद
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Chandra Shekhar Azad Jayanti 2019 Know about Chandra Shekhar Tiwari became Azad 15 year old

Chandra Shekhar Azad Jayanti 2019/ भारत मां का सपूत, आजादी के महानायक और अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजाने वाले चंद्र शेखर आजाद का आज जन्म दिवस है। आज उनकी 103 वीं जयंती मनाई जा रही है। आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव में 23 जुलाई 1906 को हुआ था।

इस खास मौके पर देश के तमाम लोग सोशल मीडिया पर चंद्र शेखर आजाद की जयंती पर उन्हें याद कर रहे हैं। पीएम मोदी ने ट्वीट कर चंद्रशेखर आज़ाद की जयंती पर उन्हें याद किया और ट्वीट कर लिखा कि भारत माता के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद को उनकी 103 वीं जयंती पर श्रद्धांजलि देता हूं। आगे लिखा कि वे एक निर्भीक और दृढ़ निश्चयी क्रांतिकारी थे। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। उनकी वीर गाथा हमेशा देश के लोगों को प्रेरणा देती रही है और देती रहेगी।

कैसे बने 15 साल की उम्र में चंद्र शेखर आजाद

आजादी की बात है जब पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ एक माहौल बना हुआ था। हर जगह धरना, बहिष्कार और विद्रोह हो रहे थे। उसकी वक्त गांधीजी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेते हुए चंद्र शेखर आजाद बनारस में गिरफ्तार हो गए। तब उनकी उम्र महज 15 साल ही थी।

उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। जब जज ने उनसे उनका नाम, पिता का नाम और पता पूछा तो उन्होंने बेधड़क होते हुए कहा कि मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्र और पता है जेल यह जवाब सुनकर मजिस्ट्रेट तंग रह गए।

उनकी उम्र कम होने की वजह से जज ने उन्होंने जेल नहीं भेजा लेकिन मजिस्ट्रेट ने 15 कोड़ों की सजा दी। 15 साल की उम्र में चंद्रशेखर तिवारी चंद्र शेखर आजाद बन गए। तभी से उनका नाम आजाद हो गया।

भारतीय आंदोलनकारियों में आजाद ही नहीं भगत सिंह, राज गुरु, सुख देव, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, प्रेम किशन खन्ना और अशफाकउल्ला खान भी साथी थे। वह देश के गौरवपूर्ण आंदोलन में से एक थे। पंडित सीताराम तिवारी और अग्रनदेवी का जन्म आजाद (असली नाम: चंद्रशेखर सीताराम तिवारी) था। अपने बेटे को संस्कृत का एक महान विद्वान बनाने के लिए, कासिलो को पढ़ने के लिए राजी होना पड़ा।

लेकिन लड़का शिक्षित नहीं था। 13 साल की आयु में वह अपने माता-पिता के अध्ययन का दबाव नहीं झेल पाने के कारण मुंबई भाग गया। वह मुंबई के वाडा में रहने लगे। कोयला कंपनी में काम किया। लेकिन दो साल पुराने उस गंदे जीवन से वापस लौट वो 1921 में वाराणसी के लिए रवाना हुए और संस्कृत विद्यालय में शामिल हो गए।

इसी समय देश भारतीय स्वतंत्रता जोरों पर थी। यह तब था जब चंद्र शेखर ने खुद भारतीय स्वतंत्रता के लिए कुछ करने का फैसला किया। वह केवल पंद्रह साल के थे। जिस उत्साह से वे पढ़ रहे थे उस संस्कृत विद्यालय में उन्होंने उत्साहपूर्वक प्रदर्शन किया। पुलिस आई और पकड़कर कठघरे में खड़ा कर दिया। चंद्रशेखर ने कानून मंत्री के सवालों का जवाब दिया।

उन्होंने 9 अगस्त 1924 को, इन सभी क्रांतिकारियों ने मिलकर काकोरी, वूर में सरकारी स्वामित्व वाली ट्रेन को रोक दिया। कुछ समय के लिए चंद्रशेखर आज़ाद को छोड़कर सभी क्रांतिकारी कारों को पुलिस ने पकड़ लिया। इस बीच, भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव संसद पर हमला करते रहे, पुलिस को गिरफ्तार किया और उन्हें अदालत में फांसी दी।

इस घटना से आजाद परेशान थे। वो उन्हें छुड़वाने के लिए सब कुछ कर रहे थे लेकिन नेहरु ने भी उनकी मदद नहीं की। आखिरकार अल्फ्रेड पार्क में अपने अन्य क्रांतिकारी दोस्तों को आजाद करवाने के दौरान पुलिस के साथ मुठभेड़ में आजाद शहीद हो गए। महज 25 साल की उम्र में आजादी के लिए उन्होंने अपना जीवन बलिदान कर दिया। भगत सिंह को फांसी देने के ठीक 25 दिन बाद उनको भी मार दिया गया।

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