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Budget 2019 : भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल और आर्थिक सर्वेक्षण की पूरी रिपोर्ट

आर्थिक सर्वेक्षण यह आकलन भी देता है कि 2019-20 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7 प्रतिशत की दर से विकसित होगी। यह शुभ आकलन है। सर्वेक्षण में दर्ज है कि करीब तीन करोड़ पचास लाख केस अभी अनिर्णीत हैं, इनमें से 87.5 प्रतिशत केस जिला और निचले स्तर की अदालतों में हैं। सर्वेक्षण का सुझाव है कि पांच सालों में ही सारे केस निपटाए जा सकते हैं अगर निचली अदालतों में 2279 जज, उच्च न्यायालयों में 93 जज और सुप्रीम कोर्ट में एक जज और नियुक्त कर दिया जाएं।

Budget 2019 : भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल और आर्थिक सर्वेक्षण की पूरी रिपोर्टBudget 2019 GDP Of India Economic Survey 2019 PDF

आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 पेश कर दिया गया है। सर्वेक्षण में साफ किया गया है कि अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है और ढेर सारे अवसर भी मौजूद हैं। सर्वेक्षण को गहराई से देखा जाए तो साफ होता है कि अर्थव्यवस्था कई तरह के सवालों से जूझ रही है। पर इन सवालों में ही कई जवाबों के संकेत भी छिपे हैं। आर्थिक सर्वेक्षणों का यूं तो मुख्य महत्व यह होता है कि उनमें अर्थव्यवस्था के बारे में प्रामाणिक आंकड़े तथ्य रखे जाते हैं। पर आर्थिक सर्वेक्षणों में कई बार कुछ ऐसे विचार पेश किये जाते हैं जो लगातार चर्चा का विषय बने रहते हैं।

गौरतलब है कि 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल बेसिक इनकम या सर्वांगीण बुनियादी आय का विचार पेश किया गया था, इस विचार के तहत प्रस्ताव यह है कि सबको एक न्यूनतम आय सरकार की तरफ से दे दी जाए। इस पर बहुत विमर्श हुआ और हाल में गए लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी ने जो न्याय योजना की रुपरेखा रखी थी, उसके मूल में यही सर्वांगीण बुनियादी आय का ही विचार था। राहुल गांधी गरीबी हटाओ-2 के तहत पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72000 रुपये का वादा लेकर सामने आए थे।

Economic Survey 2019 PDF

आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि राजकोषीय घाटा 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद का 3.4 प्रतिशत रहा, 2017-18 में यह 3.5 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा खासा राहतकारी है। ग्लोबल अर्थव्यवस्था में अपनी चमक बनाए रखने के लिए जरुरी है कि राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण रखा जाए। आर्थिक सर्वेक्षण के संकेत देखें तो बजट में भी राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने की कोशिश दिखायी देगी। सकल घरेलू उत्पाद का राजकोषीय घाटा से रिश्ता बहुत संवेदनशील है।

अगर यह लगातार बढ़ता है तो भारत की रेटिंग ग्लोबल बाजार में कम होती है। रेटिंग कम होने से विदेशी निवेश में कमी आती है। विदेशी निवेश कहीं न कहीं भारत में गुणवत्ता वाला रोजगार लेकर आता है, जिसकी भारत में सख्त कमी है। भारत में रोजगार की नहीं, गुणवत्ता वाले रोजगार की कमी है। गुणवत्ता वाले रोजगार को लेकर आर्थिक सर्वेक्षण में कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े रखे गए हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि अभी भारत में 1915 प्रकार की न्यूनतम मजदूरियां पाई जाती हैं तरह-तरह के कामों के लिए। तीन में से एक मजदूर को न्यूनतम मजदूरी कानून से कोई सुरक्षा नहीं मिलती है। तीन में एक मजदूर के लिए कोई कानून नहीं है, यह बात सिर्फ चिंताजनक नहीं, शर्मनाक भी है। निश्चय ही पांच ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था में ऐसे कानूनी मदद से वंचित मजदूरों के साथ प्रवेश नहीं किया जाना चाहिए।

सर्वेक्षण वकालत करता है कि एक राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी दर घोषित की जाए, अलग-अलग इलाकों के लिए और राज्य सरकारों को इन न्यूनतम मजदूरी दरों से कम पर न्यूनतम मजदूरी घोषित नहीं करनी चाहिए। एक टोल फ्री नंबर होना चाहिए, जहां पर न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी दिए जाने की शिकायत की जा सके। आर्थिक सर्वेक्षण का एक आशय यह निकलता है कि भारत को उन अर्थव्यवस्थाओं से सीखना चाहिए, जिन्होंने तेज गति से निर्यात बढ़ाया।

सर्वेक्षण में दर्ज है कि निजी निवेश ही विकास, नौकरियों, निर्यात और मांग का कारक है। गौरतलब है कि भारत में नई औद्योगिक परियोजनाओं की शुरुआत नहीं हो रही है। उसकी वजह एक यह भी है कि तमाम उद्यमों में मांग में कमजोरी दिखाई दे रही है। निवेश बढ़े, रोजगार मिले, लोगों की जेब में क्रय शक्ति आए तो मांग मजबूत हो और अर्थव्यवस्था में चुस्ती, तेजी आए। ऐसा विचार आर्थिक सर्वेक्षण रखता है और बहुत साफगोई से सर्वेक्षण बताता है कि भारत में पूंजी की लागत महंगी है।

महंगे कर्ज लेकर उद्यमी जो माल बनाएंगे, वह अंतर्राष्ट्रीय बाजार में महंगा ही पड़ेगा। यही वजह है कि ग्लोबल बाजारों में भारतीय माल को बेचना आसान नहीं होता। निर्यात बढ़ाने के लिए बजट को कुछ करना चाहिए। इस आर्थिक सर्वेक्षण को संकेत मानें तो बजट में निर्यात के मसले पर कुछ कदम उठने चाहिए। सर्वेक्षण बताता है कि 2024-25 तक पांच ट्रिलियन डालर यानी पांच लाख करोड डालर की अर्थव्यवस्था हासिल करने के लिए करीब आठ प्रतिशत साल की दर से विकास जरुरी है।

आठ प्रतिशत विकास दर को हासिल करना निश्चय ही बहुत चुनौतीपूर्ण है। आर्थिक सर्वेक्षण यह आकलन भी देता है कि 2019-20 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7 प्रतिशत की दर से विकसित होगी। यह शुभ आकलन है। अर्थव्यवस्था की सुस्ती की खबरों के चलते विकास दर के छह प्रतिशत से भी नीचे रहने की आशंकाएं थी। आर्थिक सर्वेक्षण एक बहुत महत्वपूर्ण बात अर्थव्यवस्था के संबंध में रखता है जिसका ताल्लुक कानून से है।

सर्वेक्षण बताता है कि कानूनी अड़चनों के चलते भारत में कारोबार करने में मुश्किलें आती हैं। सर्वेक्षण में दर्ज है कि करीब तीन करोड़ पचास लाख केस अभी अनिर्णीत हैं, इनमें से 87.5 प्रतिशत केस जिला और निचले स्तर की अदालतों में हैं। सर्वेक्षण का सुझाव है कि पांच सालों में ही सारे केस निपटाए जा सकते हैं अगर निचली अदालतों में 2279 जज, उच्च न्यायालयों में 93 जज और सुप्रीम कोर्ट में एक जज और नियुक्त कर दिया जाएं।

ये नई नियुक्तियां स्वीकृत सीमाओं के अंतर्गत है। यानी इन नई नियुक्तिओं में कोई बड़ी अड़चन नहीं है। यह इस सर्वेक्षण का बहुत ही महत्वपूर्ण सुझाव है, इस पर फौरन अमल होना चाहिए। न्यायाधीश लोग इस बात का बुरा न मानें पर सच यह है कि इक्कीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था में अभी न्यायिक व्यवस्था अठारहवीं शताब्दी की ही चल रही है। अगर आर्थिक सर्वेक्षण के इस सुझाव को अमली जामा पहनाया जा सके, तो यह सुझाव आर्थिक सर्वेक्षण का 2018-19 का सबसे महत्वपूर्ण सुझाव माना जा सकता है।

परिवहन के क्षेत्र में चुनौतियों को रेखांकित करते हुए आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि भारत में विद्युत कारों का कुल कार बाजार में हिस्सा सिर्फ दशमलव जीरो छह यानी .06 प्रतिशत है, चीन में यह 2 प्रतिशत है और नार्वे में तो यह 39 प्रतिशत है। आर्थिक सर्वेक्षण यह भी इंगित करता है कि छोटे उद्यमों को बड़ा होने से रोकने वाले कानून स्थितियों को खत्म होना चाहिए। एक फर्म को अगर छोटा होने में ही फायदा मिलता है तो वह बड़ी नहीं होना चाहेगी।

बड़ी फर्मों के पास उत्पादकता के लाभ होते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि ऐसी स्थितियां बनाई जानी चाहिए, जिनमें छोटी फर्म लगातार बड़े होने की ओर प्रेरित हो। कुल मिलाकर आर्थिक सर्वेक्षण बहुत साफगोई से कुछ बातें सामने रखता है। संभव है कि इनमें से कुछ बातें आने वाले वक्त में गहन आर्थिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र भी बनें।

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