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भीमा-कोरेगांव हिंसा मामला : कोरेगांव भीमा लड़ाई की 202 वीं वर्षगांठ, जिले में 163 लोगों के घुसने पर लगायी गई रोक

पुणे ग्रामीण पुलिस ने कोरेगांव भीमा लड़ाई की 202 वीं वर्षगांठ से पहले कई लोगों के जिले में घुसने पर रोक लगा दी गई है। मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिडे सहित 163 लोगों के प्रवेश पर रोक लगायी है।

भीमा-कोरेगांव हिंसा मामला : कोरेगांव भीमा लड़ाई की 202 वीं वर्षगांठ से पहले 163 लोगों को नोटिस जारी कर जिले में प्रवेश करने पर रोक
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भीमा-कोरेगांव हिंसा मामला (फाइल फोटो)

भीमा-कोरेगांव हिंसा मामला में पुणे ग्रामीण पुलिस ने कोरेगांव भीमा लड़ाई की 202 वीं वर्षगांठ से पहले आरोपी मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े सहित 163 लोगों को नोटिस जारी कर इन सबके जिले में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है।

एक जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ पर एक समारोह के दौरान हिंसा हुई थी। जिसमे एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। जानकारी अनुसार लोग यहां कोरेगांव भीमा लड़ाई के दिवस को मनाने के लिए एकत्र हुए थे। भीम कोरेगांव के विजय स्तंभ में शांतिप्रूवक कार्यक्रम चल रहा था। तभी अचानक भीमा-कोरेगांव में विजय स्तंभ पर जाने वाली गाड़ियों पर किसी ने हमला बोल दिया। इसी घटना के बाद दलित संगठनों ने 2 दिनों तक मुंबई समेत नासिक, पुणे, ठाणे, अहमदनगर, औरंगाबाद, सोलापुर सहित अन्य इलाकों में बंद ऐलान किया था। इस दौरान तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हुई। इसके बाद पुणे के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस रवीन्द्र कदम ने भीमा-कोरेगांव में दंगा भड़काने के आरोप में विश्राम बाग पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कर पांच लोगों को गिरफ्तार किया था।

कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले वापस होंगे

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल को कहा था कि भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में दलित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दायर आपराधिक मामलों को जल्द से जल्द वापस लिया जाएगा। एनसीपी के विधायक प्रकाश गजभिये ने उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर भीमा कोरेगांव मामले में कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने की मांग की थी।

भीमा-कोरेगांव लड़ाई का इतिहास

इतिहास की बात करें तो भीमा कोरेगांव लड़ाई जनवरी 1818 को पुणे के पास हुई थी। ये लड़ाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवाओं की फौज के बीच हुई थी। इस लड़ाई में अंग्रेज़ों की तरफ से महार जाति के लोगों ने लड़ाई की थी और इन्हीं लोगों की वजह से अंग्रेज़ों की सेना ने पेशवाओं को हरा दिया था। महार जाति के लोग इस युद्ध को अपनी जीत और स्वाभिमान के तौर पर देखते हैं और इस जीत का जश्न हर साल मनाते हैं।

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