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मिलिए भारत की पहली महिला ऑटो ड्राइवर शीला दावरे से, जिनको सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने शेयर की उनकी स्टोरी

भारत सरकार (GOI) के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शीला दावरे की स्टोरी शेयर की गई है। जिसमें शीला दावरे को भारत की पहली महिला ऑटो ड्राइवर बताया गया है। आइये जानते हैं देश की पहली महिला ऑटो ड्राइवर शीला दावरे के बारे में।

मिलिए भारत की पहली महिला ऑटो ड्राइवर शीला दावरे सेमिलिए भारत की पहली महिला ऑटो ड्राइवर शीला दावरे से

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 सितंबर को 'भारत की लक्ष्मी' नामक एक सोशल मीडिया अभियान शुरु किया था। जिसका उद्देश्य देश की सशक्त और आत्मनिर्भर महिलाओं को सम्मानित करना है। उसी अभियान को आगे बढ़ाते हुए रविवार को भारत सरकार के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शीला दावरे की स्टोरी शेयर की गई है। जिसमें शीला दावरे को भारत की पहली महिला ऑटो ड्राइवर बताया गया है। आइये जानते है देश की पहिला महिला ऑटो ड्राइवर शीला दावरे के बारे में।

शीला दावरे के संघर्ष और सफलता की कहानी

शीला दावरे को हम आज देश की पहली महिला ऑटो ड्राइवर के रूप में जानते है। लेकिन शायद ही किसी को मालूम हो, जब 18 साल की उम्र में उन्‍होंने अपना घर छोड़ा तब उनके हाथों में महज 12 रूपये थे। यह अस्‍सी के दशक की बात है। तब पुणे में सारे टैक्सी ड्राइवर पुरुष थे जो कि खाकी ड्रेस पहनते थे। ऐसे में शीला ने सलवार कमीज पहनकर ऑटो चलाना शुरू किया। भारत की पहली महिला ऑटो ड्राइवर के तौर पर उनका नाम लिम्‍का बुक में भी दर्ज हो चुका है।

शीला दावरे अब महिलाओं को ड्राइविंग के लिए प्रोत्‍साहित करने का काम करती हैं। उन्होंने ऐसे समय में अपने काम की शुरुआत की थी जब महिलाओं की थोड़ी बहुत पढ़ाई के बाद उनकी शादी करवा दी जाती थी। लेकिन शीला ने समाज के नियमों को बदलाव लाने की ठान ली। परिवार ने इस काम का शुरू में विरोध किया लेकिन बाद में स्‍वीकार कर लिया।

जब ट्रैफिक पुलिस से हुई उनकी हाथापाई

समाज अब भी उनके इस रुप को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। अक्सर महिला होने के कारण उन्‍हें भाड़ा चुकाने में लोगों की आनाकानी सामना करना पड़ता था। शुरुआत में राइड्स से मामूली कमाई शुरू हुई। धीरे-धीरे पैसा जोड़कर उन्‍होंने खुद का एक ऑटो रिक्‍शा खरीदा। उन्‍हें परिवार की तरफ से भी दिक्कतों और विरोध का सामना करना पड़ा।

एक बार तो ट्रैफिक पुलिस ने बहस के दौरान उन पर हाथ भी उठा दिया। लेकिन शीला ने हिम्मत दिखाई और इसके बाद उन्‍हें ऑटो यूनियन का समर्थन भी मिला। आखिरकार शीला ने इस पुरुष प्रधान पेशे में अपनी जगह बना ही ली। करीब 13 साल तक ड्राइवरी करने के बाद स्‍वास्‍थ्‍य कारणों से उन्‍हें यह काम छोड़ना पड़ा। आज वह अपनी ट्रैवल कंपनी चलाती हैं। उनके पति शिरीष ने हमेशा उनका साथ दिया। अब उनका सपना एक अकादमी खोलने का है जहां महिलाओं को ऑटो रिक्‍शा चलाने का प्रशिक्षण दिया जा सके।

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