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बाला साहेब पुण्यतिथि : अक्खा मुंबई में चलती थी हुकूमत पर बेटे के आगे हो गए बेबस

बाला साहेब को अपने ही पुत्र जयदेव एक समय बाद अच्छे नहीं लगते थे। इसके पीछे न सिर्फ संपत्ति विवाद था बल्कि जयदेव द्वारा दूसरी शादी करना भी एक प्रमुख कारण रहा।

बाला साहेब पुण्यतिथि : अक्खा मुंबई में चलती थी हुकूमत पर बेटे के आगे हो गए बेबस

1970-80 दशक में बॉलीवुड की तमाम ऐसी फिल्में बनी जिसमें कोई एक ऐसा कैरेक्टर होता था जिसकी तूती पूरे शहर में बोलती थी, उसकी जबान से निकला शब्द ही नियम होता था। बगावत करने की हिमाकत किसी में भी नहीं होती थी। जिसने भी खिलाफत की सोची समझो उसने पूरे शहर से दुश्मनी कर ली। ऐसी कहानियां सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि हमारे देश में वास्तव में भी ये सब हुआ। वो किसी और ने नहीं बल्कि मुबंई के बाला साहेब ठाकरे ने कर दिखाया था।

आज बाला साहेब की पुण्यतिथि (Bal Thackeray Death Anniversary) है। बाला साहब के तमाम ऐसे किस्सों को आप लगातार सुनते आए हैं कि कैसे पूरी मुबंई उनके एक इशारे पर बंद हो जाया करती थी। जिसे वह तलब कर दें वह अगले ही पल उनके सामने सिर झुकाए खड़ा हो जाता था। क्या नेता और क्या अभिनेता। उनकी हुकूमत से कोई बच नहीं पाया, पर उनके ही बेटे जयदेव ठाकरे ने अपने ही पिता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। भाई उद्धव ठाकर से संपत्ति विवाद को लेकर वह अपने पिता बाला साहेब तक से भिड़ गए। इसका खुलासा शिवसेना के ही नेता अनिल परब ने कोर्ट में किया था।

अनिल परब बताते हैं कि बाला साहेब को अपने पुत्र जयदेव कभी पसंद नहीं आए। इसके पीछे न सिर्फ संपत्ति विवाद था बल्कि जयदेव द्वारा दूसरी शादी करना भी एक प्रमुख कारण रहा। साल 1995 तक तो जयदेव परिवार के साथ ही रहते थे। लेकिन इसी साल उन्होंने पत्नी स्मिता को तलाक देकर दूसरी शादी कर ली और घर छोड़कर कहीं और चले गए। जिसको लेकर पिता बाला साहब को काफी सदमा पहुंचा और उन्होंने जयदेव से बात करना बंद कर दिया।

जयदेव की मां मीना ठाकरे और बड़े बेटे बिंदु माधव का निधन 1996 में हो गया। परिवार पर आयी इस बड़ी विपदा में शामिल होने जयदेव भी आए। बाला साहब को लगा कि वह पुरानी बातों को भूलकर फिर से पिता के साथ रहने लगेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। कुछ दिन बाद ही जयदेव फिर घर से चले गए। लगातार घर से दूर रहने के कारण वह पिता के गुस्से की जद में आते गए। मीडिया जब भी जयदेव से कुछ जानना चाही उन्होंने कुछ भी बोलने से इंकार दिया।

2012 में बाला साहेब बहुत बीमार हो गए। बीमारी इस कदर हावी हुई कि वह महिनों लीलावती अस्पताल के बेड पर ही पड़े रहे। इस दौरान देश-दुनिया की तमाम बड़ी शख्सियत बाला साहब का हाल जानने अस्पताल पहुंची। लेकिन जयदेव एक बार भी पिता को देखने नहीं पहुंचे। आखिरी वक्त में बाला साहेब ने खुद कहा कि जयदेव मुझे कभी देखने नहीं आया इसलिए मैं बीमार हूं। उनकी ये नाराजगी कभी बदलती उससे पहले ही वो 17 नवंबर 2012 को 87 साल की आयु में दुनिया को अलविदा कहकर चले गए।


इसके बाद उद्धव और जयदेव में संपत्ति को लेकर विवाद छिड़ गया जो हाईकोर्ट तक पहुंच गया। उद्धव ने जनवरी 2014 में प्रोबेट पिटीशन दाखिल की। इस तरह की याचिका आमतौर पर दिवंगत व्यक्ति की वसीयत को कोर्ट से सत्यापित कराने के लिए दाखिल की जाती है। उद्धव के मुताबिक बाला साहेब जो संपत्ति छोड़कर गए उसकी कीमत 14.85 करोड़ है वहीं जयदेव कहते हैं कि सिर्फ मातोश्री बंगला ही 40 करोड़ रुपए का है। कुल संपत्ति जोड़ दी जाए तो वह 100 करोड़ को पार कर जाएगी।

अपने ही भाई उद्धव पर आरोप लगाते हुए जयदेव कहते हैं कि आखिरी वक्त में पिता की दिमागी हालत ठीक नहीं थे। वह वसीयत को कागजों पर दस्तखत करने की स्थिति मे नहीं थे पर परिवार के ही बाकी लोगों ने वसीयत के कागज अंग्रेजी में बनवाकर उसपर बाला साहेब से मराठी में दस्तखत करवा लिया। वह यह भी सवाल उठाते हैं कि पिता ने अपना जीवन मराठी लोगों और भाषा को समर्पित किया तो फिर उनकी वसीयत अंग्रेजी में क्यों बनाई गई। बहरहाल यह मामला अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है। इतने सालों में काफी कुछ बदल गया। उद्धव आज शिवसेना को लीड कर रहे हैं। वहीं जयदेव राजनीति से एक फासला मेनटेन करके चल रहे हैं।

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