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भारत में 5 लाख डॉक्टरों का अकाल : रिपोर्ट

WHO के अनुसार भारत में 1674 लोगों की चिकित्सा के लिए एक डॉक्टर ही उपलब्ध है।

भारत में 5 लाख डॉक्टरों का अकाल : रिपोर्ट
नई दिल्ली. चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं हमारे समाज का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। जहां एक तरफ देश में ओडिसा और कानपुर में स्वास्थ्य सेवाओं के आभाव में एक महिला और लड़के की मौत हो गई तो वहीं दूसरी तरफ पूरा देश मेडिकल केयर से सेवाओं से जूझ रहा है। ये किसी से नहीं छुपा है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। लेकिन इसी साल राज्यसभा में संसद सत्र के दौरान यह बात सामने आई थी। इंडिया स्पेंड वेबसाइट के मुताबिक, देश में 5 लाख डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। इसका मतलब है कि हम 67 फीसदी डॉक्टरों की जरुरत है ताकि सभी को हेल्थ केयर का लाभ मिल सके।
तो वही दूसरी तरफ पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण को लेकर अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत में 2014 के अंत तक 7 लाख 40 हजार डॉक्ट थे। जिसके मुताबिक डॉक्टर और मरीज के बीच 1:1674 का अनुपात था। अल्जीरिया, वियतनाम और पाकिस्तान की तुलना में और भी बुरा हाल है। जबकि हमें 1:1000 का अनुपात पूरा करना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार प्रति हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में 1,674 लोगों की चिकित्सा के लिए एक डॉक्टर ही उपलब्ध है। यह स्थिति तब है जब कुपोषण और वातावरणीय स्थिति के चलते देश में बीमारियों का प्रकोप कुछ ज्यादा होता है।
बता दें कि इस समय भारत को कम से कम 5 लाख डॉक्टरों की जरुरत है। कई लोग तो अब तक अपनी मेडिकल की पढ़ाई भी पुरी कर चुके है। यदि हम देश में और भी ज्यादा मेडिकल सीट जोड़ते है तो तब भी हम इस अनुपात को पुरा नहीं कर पाएंगे।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय डॉक्टरों की कमी को देखते हुए अपने इस फैसले से विदेशों में बसने वाले डॉक्टरों पर रोक लगाना चाहती थी लेकिन डॉक्टरों की कमी का एक मात्र कारण यह नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक देश में इस समय 412 मेडिकल कालेज हैं। इनमें से 45 प्रतिशत सरकारी क्षेत्र में और 55 प्रतिशत निजी क्षेत्र में हैं। हमारे देश के कुल 640 जिलों में से मात्र 193 जिलों में ही मेडिकल कालेज हैं और शेष 447 जिलों में चिकित्सा अध्ययन की कोई व्यवस्था ही नहीं है।
मौजूदा समय में डॉक्टर बनना बहुत महंगा सौदा हो गया है और एक तरह से यह आम आदमी की पहुंच से बाहर ही हो गया है। सीमित सरकारी कालेजों में एडमीशन पाना एवेरस्ट पर चढ़ने के बराबर हो गया है और प्राईवेट संस्थानों में दाखिले के लिए डोनेशन करोड़ों तक चूका गया है ऐसे में अगर कोई कर्ज लेकर पढाई पूरी कर भी लेता है तो वह इस पर हुए खर्चे को ब्याज सहित वसूलने की जल्दी में रहता है। यह एक तरह से निजीकरण को भी बढ़ावा देता है क्योंकि इस वसूली में उसे दवा कंपनियां पूरी मदद करती है। डॉक्टरों को लालच दिया जाता है या उन्हें मजबूर किया जाता है कि कि महंगी और गैर-जरूरी दवाईया और जांच लिखें।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के मामले में तो स्थिति और भी बदतर है, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार सर्जरी, स्त्री रोग और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में 50 फीसदी डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा 82 फीसदी तक पहुंच जाता है. यानी कुल मिलाकर हमारा देश ही बहुत बुनियादी क्षेत्रों में भी डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं। यह स्थिति एक चेतावनी की तरह है।
कहीं ज्यादा तो कहीं भारी कमी देश भर में इस समय सबसे ज्यादा मेडिकल कालेज कर्नाटक में हैं, जबकि महाराष्ट्र इस मामले में 48 मेडिकल कोलेजों के साथ दूसरे नंबर पर हैं, लेकिन अगर डॉक्टरों की तैनाती देखें तो महाराष्ट्र में इस समय सर्वाधिक 1,53,513 डॉक्टर तैनात हैं, जबकि कर्नाटक इस मामले में देश में तीसरे स्थीन पर है जहां 1,01,273 डॉक्टर तैनात है। देश की आबादी के हिसाब से एमबीबीएस की सीटों की काफी कमी है। देश में आधी आबादी वाले राज्यों में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए महज 20 प्रतिशत सीटें हैं। 31 प्रतिशत आबादी वाले छह राज्यों में एमबीबीएस की पढ़ाई की 58 प्रतिशत सीटें हैं।
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