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जनरल बाजवा के आने के बाद भारत-पाक संबंधों में कितना बदलाव?

आर्मी चीफ भले बदल जाए, पर भारत के प्रति पाकिस्तानी आर्मी की गहरी दुश्मनी कभी नहीं बदलती।

जनरल बाजवा के आने के बाद भारत-पाक संबंधों में कितना बदलाव?
नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जनरल राहिल शरीफ़ के बाद पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख के तौर पर लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा को नियुक्त किया है। शनिवार (26 नवंबर) को प्रधानमंत्री शरीफ ने बाजवा को नए सेना प्रमुख के रूप में चुन लिया। सूत्रों के मुताबिक उम्मीदवारों के चयन में जिन बिंदुओं पर ध्यान दिया गया उनमें विदेश नीति पर उनके विचार और खासकर भारत के साथ संबंधों को संज्ञान में रखा गया। उनके नाम का ऐलान काफी चौंकाने वाला है क्‍योंकि किसी को भी उम्‍मीद नहीं थी वह पाक आर्मी के अगले सेना प्रमुख हो सकते हैं। लेकिन नवाज ने बाजवा को नया पाक आर्मी चीफ चुना है।
भारत के प्रति पाकिस्तानी आर्मी की गहरी दुश्मनी
आर्मी चीफ भले बदल जाए, पर भारत के प्रति पाकिस्तानी आर्मी की गहरी दुश्मनी कभी नहीं बदलती। जनरल राहिल शरीफ ने वरीयता के आधार पर चार नाम दिए थे उन चार नामों में से एक नाम प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चुनना था और उन्होंने जनरल कमर जावेद बाजवा का नाम चुना है। यह बात तो सब को मालूम थी कि नया सेना प्रमुख वही बनेगा जिसने दहशतगर्दी के ख़िलाफ जनरल राहिल शरीफ के साथ लड़ाइयां लड़ी हों। कश्मीर से लेकर उत्तर में चरमपंथियों के साथ लड़ाई में कमर जावेद बाजवा का लंबा अनुभव रहा है।
ना खुशी की बात है और ना ही गम की
जब पाकिस्तान में एक कमजोर हुकूमत शासन करती है तो फौज की भूमिका और बढ़ जाती है। चाहे बाजवा हो या राहिल शरीफ़, पाकिस्तान में फ़ौज एक संस्था के तौर पर काम करती हैं। इनका दखल नीतियों को बनाने को लेकर भी है फिर चाहे भारत, अफगानिस्तान और अमेरीका के साथ पाकिस्तान के संबंध की ही बात क्यों ना हो। बाजवा के आने से भारत के साथ जो स्थिति है, वो ऐसी ही बनी रहेगी। ये ना खुशी की बात है और ना ही गम की। जब राहिल शरीफ भी आए थे तो कोई निजी नीति लेकर तो नहीं आए थे भारत-पाक संबंध में। फ़ौज एक संस्था है, वो भारत को अपने नजर से देखता है।
कश्मीर को काफी गहराई से देखा और समझा
पाकिस्तान के एक टॉप अफसर ने कहा, 'जनरन बाजवा एलओसी के पूरे इलाके की जटिलताओं और यहां चलाए जाने वाले ऑपरेशन्स की बारीक समझ रखते हैं। अपने करियर में उन्होंने कश्मीर को काफी गहराई से देखा और समझा है, पर अभी कुछ भी कहना दरअसल जल्दबाजी होगा। जनरल परवेज मुशर्रफ और कयानी के बारे में भी जैसा शुरुआत में कहा गया था, उन्होंने वैसा नहीं किया।'
भारत के प्रति कट्टर दुश्मनी रखने वाली छवि
खुद को पाकिस्तान के महान रक्षक की तरह पेश करने वाले जनरल शरीफ ने देश में ही पैदा हुए आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। उनकी छवि भारत के प्रति कट्टर दुश्मनी रखने वाली भी थी। शायद इसकी वजह यह भी थी कि भारत के साथ 1965 की लड़ाई में उनके अंकल और 1971 के युद्ध में उनके भाई मारे गए थे।
डीजीएमओ की बातचीत में तेजी लानी चाहिए
अभी जो हालात नियंत्रण रेखा पर हैं वो बढ़नी नहीं चाहिए। ये किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं होगा। बाजवा को एक कदम आगे जाकर डीजीएमओ की बातचीत में तेजी लानी चाहिए। अगर सेना प्रमुख नहीं बात कर सकते हैं तो फौज के इन अधिकारियों को मिलना चाहिए। हालांकि सेना प्रमुखों के नहीं मिलने की ऐसी कोई खास वजह नहीं है।
राहिल ने फौज को एक संस्था के तौर पर मजबूत किया
जहां तक रिटायर हो रहे जनरल राहिल शरीफ की बात है तो उन्होंने फौज को एक संस्था के तौर पर मजबूत किया है। उन्होंने परंपरागत रूप से सिर्फ़ लड़ाई में फ़ौज के इस्तेमाल की जगह चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग में फौज का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। जनरल शरीफ जब आए थे तब जनरल कियानी ने दो बार एक्सटेंशन ले लिया था। उस वक़्त फौज का हौसला बहुत कम हो चुका था। क्योंकि जब जनरल समय पर नहीं जाते हैं और एक्सटेंशन ले लेते हैं तो एक किस्म की राजनीति शुरू हो जाती है। इसलिए जनरल शरीफ़ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि कैसे फ़ौज के हौसले को बढ़ाया जाए।
ऐसे में सबकी निगाह इस बात पर है कि भारत के प्रति बाजवा का रवैया क्या उतना ही दुश्मनी भरा होगा जितना जनरल शरीफ का था? जानकारों का मानना है कि यह जानने के लिए अभी थोड़ा इंतजार करना होगा।
अभी इंतजार करना होगा
भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह का भी मानना है कि बाजवा के रुख को ठीक तरह समझने के लिए अभी इंतजार करना होगा। 2007 में कांगो में संयुक्त राष्ट्र के मिशन में जनरल बाजवा ने ब्रिगेड कमांडर के तौर पर जनरल बिक्रम सिंह के मातहत काम किया था।
अंतर्राष्ट्रीय माहौल में एक अफसर का व्यवहार अलग
जनरल सिंह ने कहा, 'यूएन मिशन में जनरल बाजवा का काम पूरी तरह प्रोफेशनल और शानदार था, पर अंतर्राष्ट्रीय माहौल में एक अफसर का व्यवहार अलग होता है और अपने देश में अलग। देश में उन्हें राष्ट्रीय हितों के हिसाब से काम करना पड़ता है।'
कश्मीर नीति में कोई बदलाव नहीं आने वाला
जनरल सिंह के मुताबिक, 'जनरल बाजवा 10वीं कोर के कमांडर रह चुके हैं, जो वहां की सबसे बड़ी कोर है। उन्हें भारत के प्रति अपने देश की नीति के बारे में बहुत अच्छे से जानकारी है। मुझे लगता है कि जहां तक पाकिस्तानी आर्मी की कश्मीर नीति का सवाल है, तो उसमें कोई बदलाव नहीं आने वाला।'
बाजवा के आर्मी चीफ बनने से कुछ नहीं बदलने वाला
दक्षिण एशिया के कई अंतर्राष्ट्रीय जानकारों का भी यही मानना है। जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय की असोसिएट प्रफेसर सी क्रिस्टीन के मुताबिक बाजवा के आर्मी चीफ बनने से कुछ नहीं बदलने वाला। भारत का भी यही मानना है कि पाकिस्तानी आर्मी का रवैया न तो भारत के प्रति बदलने वाला है और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फैलाने की पाकिस्तान की नीति में भी कोई परिवर्तन आएगा।
नवाज शरीफ को भी जनरल बाजवा से काफी उम्मीदें
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने अलग-अलग कार्यकाल में छह आर्मी चीफ चुन चुके हैं। उन्होंने ही जनरल परवेज मुशर्रफ को 1998 में चुना था। एक साल बाद में मुशर्रफ ने उनका तख्तापलट कर दिया और उन्हें सउदी अरब जाना पड़ा। नवाज शरीफ की राहील शरीफ से भी कुछ खास नहीं बनी, जिन्हें 2013 में खुद उन्होंने ही चुना था। ऐसे में नवाज शरीफ को भी जनरल बाजवा से काफी उम्मीदें होंगी।
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