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INDEPENDENCE DAY: 23 जुलाई 1947, सिखों ने रखी धार्मिक स्थलों को पंजाब में शामिल करने की मांग

सीमा आयोग की रिपोर्ट में रजवाड़ों को आमंत्रित किया गया था लेकिन मुस्लिम लीग को नहीं इससे मुस्लिम लीग की चिंता बढ़ गई।

INDEPENDENCE DAY: 23 जुलाई 1947, सिखों ने रखी धार्मिक स्थलों को पंजाब में शामिल करने की मांग
नई दिल्ली. INDEPENDENCE DAY COUNTDOWN सीरीज के तहत आज हम आपको बताएंगे कि 23 जुलाई 1947 का दिन हमारे लिए जानना क्यों जरूरी है। अभी तक आपने 22 जुलाई 1947 के बारे में जाना कि इस दिन भारत-पाक के कई बड़े नेता वायसराय हाउस में विभाजन परिषद की बैठक में शामिल हुए, जिसमें नेहरू, जिन्ना, लियाकत अली खान, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, बलदेव सिंह और ओकिंस लेग आते हैं। बैठक में कई मुद्दों पर बात होती है लेकिन इस बैठक में ये सबसे महत्वपूर्ण मु्द्दा था कि 15 अगस्त के बाद दोनों देशों के सीमा पर होने वाली गड़बड़ी से कैसे निपटा जाएगा और इस बात पर दोनों देश के नेताओं के बीच आम राय बन भी जाती है। दिल्ली में शाम के वक्त संविधान सभा में नेहरू तिरंगे को अपने हाथों से फहराते हैं जिसे सभी नेताओं ने बिना किसी विरोध के राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया था और भारत को उसकी पहचान मिल जाती है।
सीमा आयोग की रिपोर्ट में रजवाड़ों को आमंत्रित किया गया था लेकिन मुस्लिम लीग को नहीं इससे मुस्लिम लीग की चिंता बढ़ गई। ने वायसराय को चिट्ठी लिखी कि दो दिन चलने वाली रजवाड़ों की इस बैठक में मुस्लिम लीग को भी शामिल किया जाए, इस पर वायसराय ने कहा कि इस लीग में उन्होंने पटेल और नेहरू को भी नहीं बुलाया। पंजाब में सीमा रिपोर्ट पर एक बैठक हुई जिसमें कहा गया कि ननकाना साहब को पंजाब में शामिल किया जाए। दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष ज्ञानी करतार सिंह ने कहा कि पंजाब की सीमा ऐसी रखी जाए कि सिखों के सारे धर्मस्थल उसमें आ जाएं।
नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, मुस्लिम लीग के नेता अपनी अनदेखी को लेकर बहुत परेशान थे-
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