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INDEPENDENCE DAY: 22 जुलाई 1947 को तिरंगा बना राष्ट्रध्वज, भोपाल ने की थी अलग होने की मांग

संविधान सभा में नेहरू तिरंगे को अपने हाथों से फहराते हैं।

INDEPENDENCE DAY: 22 जुलाई 1947 को तिरंगा बना राष्ट्रध्वज, भोपाल ने की थी अलग होने की मांग
नई दिल्ली. INDEPENDENCE DAY COUNTDOWN सीरीज के तहत आज हम आपको बताएंगे कि 22 जुलाई 1947 का दिन हमारे लिए जानना क्यों जरूरी है। अभी तक आपने 21 जुलाई 1947 के बारे में जाना कि पंजाब के कई गांवों में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़कने की घटनाओं ने वायसराय लार्ड माउंटबेटन और गवर्नर जिनकिंस की सिरदर्दी बढ़ा दी थी। दिल्ली में नेहरू ने भारतीय संविधान का मसौदा पेश करते हैं जिसमें एक प्रावधान को सभी कांग्रेसी नेताओं ने खारिज कर दिया था, ये प्रावधान था कि संघ प्रमुख को देश का राष्ट्रपति कहा जाए और उसका कार्यकाल पांच साल का हो। नेहरू कलकत्ता में दंगे को लेकर बहुत डरे हुए थे और 15 अगस्त के बाद अतिरिक्त सुरक्षा की मांग करते हैं। दूसरी तरफ, कराची में सभी स्कूल और कॉलेजों को वहां आने वाले शरणार्थियों के लिए बंद कर दिया गया।
22 जुलाई 1947 को भारत-पाक के कई बड़े नेता वायसराय हाउस में विभाजन परिषद की बैठक में शामिल हुए, जिसमें नेहरू, जिन्ना, लियाकत अली खान, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, बलदेव सिंह और ओकिंस लेग आते हैं। बैठक में कई मुद्दों पर बात होती है लेकिन इस बैठक में ये सबसे महत्वपूर्ण मु्द्दा था कि 15 अगस्त के बाद दोनों देशों के सीमा पर होने वाली गड़बड़ी से कैसे निपटा जाएगा और इस बात पर दोनों देश के नेताओं के बीच आम राय बन भी जाती है।
दिल्ली में शाम के वक्त संविधान सभा में नेहरू तिरंगे को अपने हाथों से फहराते हैं जिसे सभी नेताओं ने बिना किसी विरोध के राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया था और भारत को उसकी पहचान मिल जाती है।
नीचे की स्लाइड्स में जानिए, विभाजन परिषद की बैठक में क्या आम राय बनती है -
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