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INDEPENDENCE DAY: 18 अगस्‍त 1947 को पाकिस्तान से आजाद हुआ था जिला दिनाजपुर

उस समय कुल ढाई दिनों तक बालुरघाट ब्रिटिश से मुक्त रहा।

INDEPENDENCE DAY: 18 अगस्‍त 1947 को पाकिस्तान से आजाद हुआ था जिला दिनाजपुर
नई दिल्ली. INDEPENDENCE DAY COUNTDOWN सीरीज के तहत आज हम आपको बताएंगे कि आजादी के बाद 18 अगस्‍त 1947 के दिन को जानना हमारे लिए क्यों जरूरी है। अब तक आपने जाना कि 17 अगस्‍त 1947 को भारत और पाकिस्तान के बीच खींची गई थी। इस विभाजक रेखा के जरिए ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर सिरिल रेडक्लिफ ने गुलाम भारत के 9 करोड़ लोगों के बीच साढ़े लाख किलोमीटर की रेखा खींच कर दो हिस्सो भारत और पाकिस्तान में बांट दिया था। दोनों राष्ट्रों को बांटने वाली एक अस्थायी रेखा पहले ही लॉर्ड वावेल द्वारा फरवरी 1947 में बना दी गई थी। परन्तु इस अस्पष्ट विभाजन को कोई बंगाल और पंजाब में हिन्दुओं, मुस्लिमों और सिखों की लगभग बराबर की संख्या को देखते हुए फिर से बनाने के लिए रेडक्लिफ कमीशन बनाया गया।
जहां पूरा देश पंद्रह अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, वहीं इसके तीन दिन बाद दक्षिण दिनाजपुर जिले के बालुरघाट के निवासी ने 18 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। दरअसल वर्तमान दक्षिण दिनाजपुर जिले के बालुरघाट सहित कई इलाके 18 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुए थे। 15 अगस्त 1947 को देश ब्रिटिश शासन से मुक्त हुआ, लेकिन बालुरघाट सहित पश्चिम बंगाल के कई इलाके 17 अगस्त 1947 तक पाकिस्तान के अंतर्गत थे। तत्कालीन हिन्दु महासभा के अध्यक्ष व जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कड़ी लड़ाई लड़ कर 18 अगस्त 1947 को बालुरघाट पाकिस्तान से मुक्त कराकर भारत में शामिल किया।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में बालुरघाटवासी लोगों की अहम भूमिका थी। उसी वर्ष 14 सितंबर को तत्कालीन दिनाजपुर जिले के महकमा कार्यालय का दस हजार लोगों ने घेराव किया था। इनलोगों ने ट्रेजरी भवन में आग भी लगाई थी। स्वतंत्रता सेनानियों ने इस दिन बालुरघाट शहर के कुल 16 सरकारी कार्यालय को तहस-नहस कर दिया। एसडीओ कार्यालय के सामने से ब्रिटिश झंडा यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा लगा दिया था।
दस हजार स्वतंत्रता सेनानियों की डर से शहर की पुलिस फरार हो गई थी। उस समय कुल ढाई दिनों तक बालुरघाट ब्रिटिश से मुक्त रहा। इस घटना की याद में तत्कालीन एसडीओ कार्यालय के सामने सरकार ने एक स्मारक स्तंभ का निर्माण कराया। चौधरी के मुताबिक बालुरघाट सीमा से सटे डांगी गांव में 1942 के 14 सितंबर को स्वतंत्रता सेनानी एकत्रित होकर बालुरघाट के लिए रवाना हुए। जिस स्थान से रवाना हुए थे वहां भी एक स्मारक स्तंभ है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण यह स्मारक स्तंभ नष्ट होने की कगार पर है।
नीचे की स्लाइड्स में जानिए, मोहम्मद अली जिन्ना ने जमीन के बंटवारे को लेकर उठाई थी आवाज-

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