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स्वतंत्रता दिवस 2018: काकोरी कांड के इन 10 क्रांतिकारियों ने बदल दिया था लोगों का आजादी के प्रति नजरिया

15 अगस्त को देश अपना 72 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। काकोरी कांड इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। इसे आजादी पाने में सबसे अहम दिन के रुप में देखा जाता है। 9 अगस्त 1925 को कोकरी कांड ने अंग्रेजी हुक्कुमत की जड़ें हिला दी थीं।

स्वतंत्रता दिवस 2018: काकोरी कांड के इन 10 क्रांतिकारियों ने बदल दिया था लोगों का आजादी के प्रति नजरिया
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15 अगस्त को देश अपना 72 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। लेकिन शायद काकोरी कांड इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। इसे आजादी पाने में सबसे अहम दिन के रुप में देखा जाता है। 9 अगस्त 1925 को कोकरी कांड को अंजाम दिया गया था. जिसमें देश के अमर जवानों ने अपना खास योगदान दिया था।

9 अगस्त 1925 का दिन इतिहास में काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस दिन देश के क्रांतिकारियों ने काकोरी में एक ट्रेन को रोककर उसमें डकैती डाली थी. तब से इसका नाम कोकारी कांड पड़ गया।

इस ट्रेन को लूटने के पीछे अंग्रेजों के सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाना था। क्रांतिकारी खजाने को लूटकर उन पैसों से हथियार खरीदना चाहते थे। जिसमें विख्यात क्रांतिकारी संगठन‘हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’का मुख्य योगदान रहा था।

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आपको बता दें कि इस संगठन के लौग धन इक्ठठा करने के लिए लूट-पाट करते थे। जिसकी वजह से सरकार उन्हें डांकू लुटेरे कहकर बदनाम कर रही थी जिसकी वजह से उन्होंने सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई। जिसमे काकोरी कांड सबसे पहला कदम था।

इन 10 लोगों पर चला था मुकदमा

इस प्रकरण में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मनमठनाथ गुप्ता, मुरारी लाल गुप्ता, मुकुंदी लाल गुप्ता और बनवारी लाल का अहम योगदान रहा था।

अंगेजी सरकार ने इस मामले में राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और अशफाकुल्ला खान को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुना दी गई। इसके अलावा सचिंद्र सान्याल और सचिंद्र बख्शी को कालापानी की सजा दी गई तथा अन्य 4 को 14-14 साल की सजा सुनाई गई।

उल्लेखनीय है कि पं. रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर की जेल में 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गई। उन्होंने अपने आखिरी वक्त में देशवासियों से कहा मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं इसके साथ ही वह फांसी के तख्ते की ओर जाते हुए जोर से भारत माता और वंदेमातम् की जयकार करते रहे।

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ये थी बिस्मिल की अंतिम पक्ति

अंत में उन्होंने चलते समय कहा था कि मालिक तेरी रजा रहे और तू ही रहे, बाकी न मैं रहूं, न मेरी आरजू रहे। जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे, तेरा हो जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे।

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