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राइट टू प्राइवेसी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से 134 करोड़ लोगों पर पड़ा ये सीधा असर

नौ सदस्यीय बेंच ने सुनवाई के दौरान इस पर विचार किया कि आखिर राइट टु प्रिवेसी के अधिकार की प्रकृति क्या है।

इसके अलावा 1954 और 1962 में राइट टु प्रिवेसी को मूल अधिकार न मानने वाले दो फैसलों का भी अध्ययन किया गया।

आधार कार्ड स्कीम में नागरिकों की निजता के हनन को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राइट टू प्रिवेसी के निर्धारण के लिए संवैधानिक पीठ के गठन का फैसला लिया था।

राइट टु प्रिवेसी को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व जज के.एस. पुट्टास्वामी, राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग के पहले चेयरमैन रहे शांता सिन्हा, नारीवादी शोधकर्ता कल्याणी सेन मेनन और अन्य लोगों ने याचिका दाखिल की है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान आधार कार्ड जारी करने वाली संस्था भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने कहा था कि संसद की ओर से बनाए गए तमाम कानून अलग-अलद तरह से इस प्रिवेसी का संरक्षण करते हैं, लेकिन यह मूल अधिकार नहीं माना जा सकता।

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