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मानवाधिकार दिवस / कितने लोग रोज भूखे सोते हैं, कितने हैं अनपढ़ ?, जाने हर सवाल का जवाब

आज मानवाधिकार दिवस 2018 (Human Rights Day 2018) है। पूरी दुनिया में रहने वाले हर इंसान के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से 70 वर्ष पहले ही यूनेस्को ने मानवाधिकार आयोग का गठन कर दिया था।

मानवाधिकार दिवस / कितने लोग रोज भूखे सोते हैं, कितने हैं अनपढ़ ?, जाने हर सवाल का जवाब

आज मानवाधिकार दिवस 2018 (Human Rights Day 2018) है। पूरी दुनिया में रहने वाले हर इंसान के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से 70 वर्ष पहले ही यूनेस्को ने मानवाधिकार आयोग का गठन कर दिया था। हमारे देश में भी 25 वर्ष पहले एनएचआरसी का गठन किया जा चुका है। बावजूद इसके देश और दुनिया में हर रोज बेशुमार ऐसी घटनाएं घटित होती रहती हैं, जिससे मानवता शर्मसार होती है। क्या कहते हैं मानवाधिकार उल्लंघन के आंकड़े? क्या है इसकी मूल वजहें और कितने खतरनाक हो सकते हैं इसके परिणाम? तमाम पहलुओं को विवेचित करता आलेख। अपनी बात शुरू करने से पहले आइए चंद खूबसूरत तथ्यों पर नजर डालें।

दुनिया की आबादी 7 अरब 35 करोड़

-आज दुनिया की आबादी 7 अरब 35 करोड़ के आस-पास है। इतने लोग धरती पर अब के पहले कभी नहीं रहे। लेकिन इंसान की मेधा का कमाल देखिए कि अगर धरती पर कृषि जनित मौजूदा ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए पूरी क्षमता से कृषि उत्पादन किया जाए तो 30 अरब से ज्यादा लोगों के खाने के लिए यह धरती अन्न उगा सकती है। मगर वास्तविकता यह है कि संयुक्त राष्ट्र की ‘हंगर इंडेक्स’ रिपोर्ट के मुताबिक 92 करोड़ लोग हर दिन या तो भूखे सोते हैं या आधे पेट से भी कम खाकर सोते हैं।

दुनिया के 30 से ज्यादा देशों में 100 फीसदी साक्षरता

-आज दुनिया के 30 से ज्यादा देशों में 100 फीसदी साक्षरता है। दुनिया के 50 से ज्यादा देश 80 प्रतिशत साक्षरता के आस-पास हैं और मौजूदा संसार में पढ़ाई-लिखाई के जितने साधन और कुशल तकनीक उपलब्ध हैं, उसकी आधी क्षमता का भी इस्तेमाल अगर मुनाफा कमाने की जगह सबको शिक्षा उपलब्ध कराने में लगाई जाए तो दुनिया में जितने लोग शिक्षा के आकांक्षी हैं, उससे तीन गुना ज्यादा लोगों को शिक्षित किया जा सकता है।

लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया में अभी भी 1 अरब 26 करोड़ के आस-पास लोग अशिक्षित हैं और करीब डेढ़ अरब से ज्यादा लोग अर्धशिक्षित या बस काम चलाऊ शिक्षा ही हासिल कर सके हैं। क्योंकि वास्तव में शिक्षा इतनी महंगी है कि उसे हासिल करना सबके बस में नहीं है। ये सिर्फ दो तथ्यों की बात है, जबकि हकीकत यह है कि धरती अगर आज एक देश हो जाए और सभी इंसानों के बीच भाईचारा कायम हो जाए तो आज धरती इतनी संपन्न होगी, जितनी इतिहास में न तो पहले कभी थी और न ही इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन हकीकत इसके उलट है।

पनप रही है बर्बरता

दूसरे विश्व युद्ध के तकरीबन 73 सालों बाद आज धरती यूं तो इतना विकास कर चुकी है कि तब के मुकाबले एक हजार गुना ज्यादा संपन्न है और एक लाख गुना ज्यादा दुनिया में सुविधाएं पैदा हो गई हैं। लेकिन इंसान की गरिमा में इस विकास और सहूलियत के बीच फिर से बर्बरता और अमानवीयता के इतने घने बादल मंडराने लगे हैं, जितने दूसरे विश्व युद्ध के समय या उसके पहले भी शायद न रहे होंगे क्योंकि धीरे-धीरे इंसानों में फिर से जंगली जानवरों की तरह अपना वर्चस्व स्थापित करने की वही प्रवृत्ति लौट आई है, जिससे हजारों साल लड़ते हुए उसने अपने को जंगल और जंगली जानवरों से अलग किया था।

मानवाधिकार की परिभाषा

द्वितीय विश्व युद्ध की महाविभीषिका से गुजरने के बाद दुनिया ने बहुत शिद्दत से इस बात को समझा था कि जब तक दुनिया के हर इंसान की बुनियादी गरिमा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक इंसानों और जानवरों में कोई फर्क नहीं होगा। इसीलिए 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के एक वृहद सम्मेलन में, जिसमें दुनिया भर के महत्वपूर्ण देशों और संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे, बुनियादी मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृति प्रदान की गई। इस घोषणा के तहत ऐलान किया गया कि धरती पर पैदा हुए हर इंसान की जिंदगी को महत्वपूर्ण माना जाएगा। उसे जीने के लिए दूसरे इंसानों के साथ बराबरी, आजादी और सम्मान का अधिकार दिया जाएगा। यही नहीं यह भी कहा गया कि कुछ भी हो जाए, किसी भी स्थिति में किसी भी इंसान से मानवीय गरिमा के ये अधिकार नहीं छीने जाएंगे, जिन्हें हम मानवाधिकार कहते हैं। यह बात यहां तक जोर देकर कही गई कि अगर कोई अपराधी भी है तो भी उसके मानवाधिकार खत्म नहीं होंगे।

गठित हुआ मानवाधिकार आयोग

पूरी दुनिया ने इन सार्वभौम मानवाधिकारों को अपने-अपने ढंग से स्वीकृति दी और उन्हें अपने-अपने देशों के संविधानों में भी शामिल किया। हमने हालांकि काफी साल बाद (करीब 45 सालों बाद) 1993 में मानवाधिकार आयोग की स्थापना करके इन अधिकारों को कानूनी जामा पहनाया, लेकिन भारतीय संविधान में जो मूल अधिकार मौजूद हैं, उन अधिकारों की पृष्ठभूमि में भी इन्हीं सार्वभौम मानवाधिकारों की गरिमा मौजूद है।

मानवाधिकार उल्लंघन रिपोर्ट

  • संविधान में मौजूद मूल अधिकारों और 1993 में मानवाधिकारों को कानूनी गारंटी देने के बावजूद भी आज देश में इंसानी गरिमा छिन्न भिन्न हो रही है।
  • महिलाओं के विरुद्ध तमाम दावों के बावजूद लगातार बढ़ती बलात्कार की घटनाएं, दलितों के विरुद्ध बढ़ते अत्याचार, अल्पसंख्यकों के खिलाफ सरेआम होता भेदभाव और धर्म तथा जाति के उन्माद में शुरू हुआ ‘मॉब लिंचिंग’ का दौर मानवाधिकारों पर शर्मनाक आघात है।
  • पिछले कुछ सालों में जिस तरह से देश और पूरी दुनिया में मानवीय गरिमा के विरुद्ध खौफनाक माहौल पैदा हुआ है, उस सबको देखते हुए लगता है कि जैसे मानवाधिकार महज किताबी बात होकर रह गए हैं।
  • क्योंकि कोरी हकीकत यही है कि ज्यों-ज्यों दुनिया विकास के शिखर पर पहुंचती जा रही है, निर्माण की भव्यतम ऊंचाइयों को भी पार कर गई है, त्यों त्यों उसमें बर्बरता और पशुता लौटती आ रही है।
  • यह हैरान करने वाला सच है कि पिछले एक दशक में दुनिया में जिस तरह जातीय, नस्ली और धार्मिक नरसंहार हुए हैं, वे सब 15वीं और 16वीं शताब्दी के बर्बर दौर की याद दिला रहे हैं।

नहीं थम रहीं अमानवीय घटनाएं

आज जबकि दुनिया में ज्ञान, साधन और चमत्कारिक तकनीक मौजूद है, जिससे धरती के हर इंसान को शांति से भरा गरिमापूर्ण जीवन मिल सकता है, उस दौर में जितनी उथल-पुथल, दहशत और बर्बरता है, उतनी शायद ही पहले कभी रही हो। यह पहला ऐसा दौर है, जब पूरी दुनिया से अलग-अलग कारणों से 80 करोड़ से भी ज्यादा लोग विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं।

हर साल जातीय और नस्ली दंगों, आतंकवाद और सरहदों की अकड़पूर्ण लड़ाई में 5 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। करोड़ों लोगों को भोजन उपलब्ध नहीं है। पूरी दुनिया में हर साल 20 लाख से ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे हैं। मुठभेड़ों में तमाम मासूम मारे जा रहे हैं और दुनिया के हर देश में जो भी, जहां अल्पसंख्यक है, उस पर तो मानो खौफनाक दहशतों का पहाड़ ही टूट पड़ा है।

मानव अस्तित्व के लिए संकट

यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि किताबों में भले मानवाधिकारों की बड़ी-बड़ी दुहाइयां दी गई हों। लेकिन वास्तविकता यही है कि दुनिया के हर कोने में आज मानवाधिकारों का खौफनाक हनन हो रहा है।

मानव इतिहास का यह बहुत खतरनाक दौर है, जब इंसान बहुत ताकतवर होते हुए भी अपनी बर्बर प्रवृत्ति के चलते इंसान के अस्तित्व को ही मिटाने पर तुला है।

अगर इंसानों की इंसानों के विरुद्ध यह बर्बरता समय रहते न रोकी गई, अगर सभा-सम्मेलनों और किताबों से आगे बढ़कर मानवाधिकारों को व्यावहारिकता का अमलीजामा नहीं पहनाया गया, तो डर है कि बर्बर हो रही दुनिया कहीं समूची सभ्यता को ही नष्ट न कर दे।

वक्त आ गया है कि हम मानवाधिकारों को सिर्फ रस्म अदायगी के लिए न याद करें बल्कि ईमानदारी से उन पर अमल करें वरना बिना तीसरे महायुद्ध हुए भी दुनिया का खात्मा हो सकता है।

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