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राष्ट्रपति चुनाव 2017: जानें भारत में कैसे होता है राष्ट्रपति चुनाव?

जो भी कैंडिडेट यह कोटा सबसे हासिल करता है, वही होता है भारत का राष्ट्रपति।

राष्ट्रपति चुनाव 2017: जानें भारत में कैसे होता है राष्ट्रपति चुनाव?
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राष्ट्रपति चुनाव को ले कर लंबे समय से चली आ रही उधेड़बुन का आज समाधान हो जाएगा क्यों कि आज यानी कि सोमवार 17 जुलाई 2017 को राष्ट्रपति चुनाव है। हमारे देश में राष्ट्रपति चुनाव का तरीका विधानसभा चुनाव से काफी अलग है।

भारत में राष्ट्रपति जहां राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल करता है, लेकिन इसके सदस्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक भी होता है।

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लेकिन वो एकल हस्तांतरणीय वोट के तहत मतदान करते हैं। आइए आपको विस्तार से समझाते हैं भारत में राष्ट्रपति के चुनाव की चुनाव प्रणाली के बारे में:

अप्रत्यक्ष निर्वाचन:

भारत में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रणाली का जिक्र संविधान के अनुच्छेद 54 में है। जिसके मुताबिक राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं बल्कि उसके द्वारा चुने गए लोग करते हैं जिसे कि निर्वाचक मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) कहा जाता है।

मतदान का अधिकार:

राष्ट्रपति चुनाव में सभी प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य और लोकसभा तथा राज्यसभा में चुनकर आए सांसद वोट डालते हैं। जिन लोगों को तो राष्ट्रपति ने संसद में सांसद मनोनीत किया है वो इसमें भाग नहीं ले सकते। इसके अतिरिक्त राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य भी इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते, क्योंकि उनका चुनाव जनता द्वारा नही होता है।

एकल हस्तांतरणीय वोट:

इस खास व्यवस्था में वोटर के पास अपनी प्रायोरिटी तय करने की स्वतंत्रता होती है मसलन वोटर वोट तो एक ही देगा लेकिन वह यह तय कर सकता है कि कौन सा उसका पसंदीदा प्रत्याशी है और कौन थोडा कम यानी कि वोटर बैलट पेपर पर राष्ट्रपति पद के लिए कौन सा प्रत्याशी उसकी पहली पसंद है और कौन दूसरी, कौन तीसरी है इस बात की जानकारी दे देता है।

अगर किसी स्थिति में वोटर की पहली प्रायोरिटी वाले प्रत्याशी वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे एकल हस्तांतरणीय वोट (सिंगल ट्रांसफरेबल वोट) कहा जाता है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली:

राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का महत्व अलग-अलग होता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का महत्व भी अलग होता है। जिस आधार पर वोटों का महत्व निर्धारित किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहते हैं।

आइए आपको बताते हैं कैसे तय होता है वोटों का वेटेज (महत्व):

MLA के वोट का महत्व:

अगर MLA (विधायक) के वोट का वेटेज तय करना हो तो जिस राज्य का वह विधायक होगा, उस राज्य की कुल आबादी को उस प्रदेश की कुल विधानसभा सदस्यों की संख्या से भाग दे दिया जाता है।

ऐसा करने पर जो भागफल आता है, उसे एक बार फिर 1000 से भाग दे दिया जाता है। अब जो भागफल आता है, वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का वेटेज होता है। यदि 1000 से भाग देने पर अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

MP के वोट का वेटेज:

MP (सांसदों) के मतों के वेटेज तय करने के लिए सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है। अब इस टोटल वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग दे दिया जाता है। इस तरह जो भागफल प्राप्त होता है, वह एक सांसद के वोट का वेटेज होता है। अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0। 5 से ज्यादा शेष हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

मतगणना:

राष्ट्रपति चुनाव आम चुनाव की तरह नहीं होते जिसमें सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाला प्रत्याशी ही विजयी होता है। वही प्रत्याशी राष्ट्रपति बन सकता है जिसके खाते में सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा आये।

राष्ट्रपति चुनाव में यह बात पूर्व निर्धारित होती है कि जीतने वाले को कितना वोट यानी वेटेज पाना होगा। हाल में राष्ट्रपति चुनाव के लिए जो निर्वाचक मंडल है, उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है। अतः चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी को 5,49,442 वोट हासिल करने होंगे।

इन सब के बाद जो भी कैंडिडेट यह कोटा सबसे हासिल करता है, वही होता है भारत का राष्ट्रपति।

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