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होली व्यंग: दो घूंट अंदर जाते ही लगने लगे ''नेताजी जिंदाबाद'' के नारे

वैसे तो नेताजी की कोठी में उत्सव होना कोई नई बात नहीं है। इधर चुनावों का बिगुल बजता है, उधर नेताजी के घर उत्सव शुरू हो जाता है। दारू की पेटियां पहुंचने लगती हैं। शौकीनों की बहार आ जाती है। दो घूंट अंदर जाते ही ‘जिंदाबाद-जिंदाबाद’ के नारों से पूरी कोठी गुंजायमान हो जाती है।

होली व्यंग: दो घूंट अंदर जाते ही लगने लगे

वैसे तो नेताजी की कोठी में उत्सव होना कोई नई बात नहीं है। इधर चुनावों का बिगुल बजता है, उधर नेताजी के घर उत्सव शुरू हो जाता है। दारू की पेटियां पहुंचने लगती हैं। शौकीनों की बहार आ जाती है। दो घूंट अंदर जाते ही ‘जिंदाबाद-जिंदाबाद’ के नारों से पूरी कोठी गुंजायमान हो जाती है।

नेताजी के चुनाव जीतने के बाद तो उत्सव लगातार कई दिन चलता है। पूरी कोठी रंगीन लाइटों से जगमग करने लगती है। बधाई देने के लिए जब थोड़ा रुतबे वाले लोग आते हैं तो जाहिर है कि दारू के ब्रांड भी सुपीरियर हो जाते हैं।

अब सड़क छाप समर्थकों की बजाय धन्ना सेठों और ब्यूरोक्रेट्स की गाड़ियां नेताजी की कोठी की शोभा बढ़ाने लगती हैं। नेताजी जब अपने राजयोग को और मजबूत करने के लिए मंगल, केतु, राहू और शनि जैसे ग्रहों को साध लेते हैं और बिल्ली के भाग्य से छींका फूटने की तर्ज पर जब उन्हें झंडी वाली गाड़ी मिल जाती है, तो फिर उत्सवों का सिलसिला स्थाई रूप धारण कर लेता है।

उनके घर जाती रोड, वीआईपी रोड में तब्दील हो जाती है। पायलट गाड़ी नेताजी के आगे पीछे लग जाती हैं। उनकी पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में हो जाता है। यानी उत्सवों का नशा सिर चढ़कर बोलने लगता है। नेताजी का रोम-रोम उत्सवमय हो जाता है।

उत्सवों की अंतहीन श्रंखला में पहली मर्तबा नेताजी की कोठी पर मदनोत्सव का आयोजन हुआ। अफसर और अफसरनियां तो गुलाल लेकर आए ही, नेताजी की कई चेलनियां भी वहां खिलखिलाती हुई नमूदार हो गईं।

उनके चेहरे रंग से इतने पुते हुए थे कि यह पता लगाना मुश्किल था कि उनमें शीला कौन है, लीला कौन है और बसंती कौन...! नेताजी एक संत की तरह विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने अपने चेहरे पर रंग लगवाए जा रहे थे और बीच-बीच में किसी-किसी से कनखियों में बतियाए भी जा रहे थे।

उनके चेहरे की रंगत और आंखों का नूर देखते ही बनता था। वे अच्छे-खासे सिद्ध पुरुष मालूम पड़ रहे थे। मदनोत्सव के लिए नेता जी ने क्या-क्या प्लानिंग कर रखी है, यह जानने की उत्सुकता खाकसार के भीतर कुलांचे भर रही थी।

जेहन में लगातार आइडियाज पर आइडियाज दस्तक दे रहे थे। एक आइडिया ने दिमाग में ऐसी सरगोशी की कि खाकसार भी पैंट, कोट, हैट और काला चश्मा लगाकर किसी सुपर हीरो की तरह मस्ती से डग भरते और सिक्योरिटी गार्डों का सलाम कबूलते हुए भीतर पहुंचने में कामयाब हो गया।

खाकसार को उसकी प्रेमिका ने रास्ते में रोककर हैप्पी होली कहते हुए भांग का ऐसा घोटा पिलाया और साथ ही आंख भी दबा दी, लिहाजा ज्ञान चक्षु भी खुलते चले गए। खाकसार ने भीतर घुसते ही किसी मंझे हुए एंकर की तरह अपने मोबाइल से नेताजी की कोठी में चल रहे मदनोत्सव का नजारा लाइव दिखाना शुरू कर दिया। अब लोग लाइव देख रहे हैं.. और क्या देख रहे हैं कि...

नेताजी को रंग लगाने दूसरे दलों के नेता भी आए हैं। जिनके खिलाफ नेताजी आए रोज बयानों के गोले छोड़ते हैं, वे भी नेताजी की बगल में विराजमान हैं। एक-दूसरे को कोहनियां मार रहे हैं। एक-दूसरे के कान में फुसफुसा रहे हैं।

स्माइल पर स्माइल दे रहे हैं। ऐसे लग रहा है, जैसे दोनों विरोधी नहीं बल्कि एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हों। राजनीति में पार्टनर हों। एक-दूसरे के कारनामो के राजदार हों।

लोग लाइव देख रहे हैं... कि नेताजी भीतर से पुरानी ढोलकी उठा लाए हैं और ढोलकी पर थाप देते हुए नृत्य की मुद्रा में आ गए हैं। उनके समर्थक ‘जय हो’ का नारा लगा रहे हैं और नेताजी ठुमक-ठुमक कर होली के रंग हवा में बिखेर रहे हैं।

उनकी भाव-भंगिमाएं सभी को चकित कर रही हैं। नेताजी लीडर होने के साथ-साथ अच्छे-खासे नर्तक भी हैं, ऐसा दृश्य पहली बार लोग देख रहे हैं। हवा में रंग बिखेरते और नाचते-नाचते नेताजी के हाथ में पता नहीं कहां से अचानक माइक आ जाता है और अचानक नेताजी भाषण शुरू कर देते हैं।

उनके भाषण में वीर रस भी है, करुण रस भी और भावुकता रस भी। नेता जी बोल रहे हैं और जनता लाइव सुन रही है कि ... ‘हमने होली की परंपराओं को जिंदा रखा है। हम अपनी गौरवपूर्ण संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन कर रहे हैं।

हम दुश्मन की गोली का जवाब होली से देने के लिए तैयार बैठे हैं। होली हमारी आन-बान और शान है। हम मिट जाएंगे लेकिन होली मनाना नहीं छोड़ेंगे। दुनिया की कोई महाशक्ति हमें होली मनाने से नहीं रोक सकती।’ वगैरह-वगैरह। लोग तालियां बजा रहे हैं।

एक अति उत्साही समर्थक ने डीजे बजाना भी शुरू कर दिया है। डीजे की आवाज में नेताजी की आवाज दब गई है। फिर भी नेताजी अपने भाषण दिए जा रहे हैं और लोग डीजे की धुन पर नाचते जा रहे हैं। मदनोत्सव अपने शबाब पर है।

खाकसार ने भी लाइव कवरेज बीच में छोड़कर नेताजी की एक चेली के साथ नाचना शुरू कर दिया है। नेताजी की कोठी की होली ब्रज की होली में तब्दील होने लगी है। गोपियां पूरी मस्ती में हैं। नेताजी परिदृश्य से ओझल हो रहे हैं और खाकसार गोपियों से घिरता जा रहा है।

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