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Holi Essay In Hindi : ये है सबसे बेस्ट होली पर निबंध हिंदी में

Holi Essay In Hindi (होली पर निबंध हिंदी में) : होली 2019 (Holi 2019) का त्यौहार 21 मार्च को देशभर में मनाया जाएगा। होली के त्यौहार (Holi Festival) पर अगर आपको स्कूल में होली पर निबंध (Holi Par Nibandh) लिखना है तो लेखक सरस्वती रमेश द्वारा होली का सबसे बेस्ट निबंध (Essay on Holi) हम आपके लिए लाये हैं और होली का निबंध हिंदी (Holi Essay In Hindi) में आपके लिए सबसे बेस्ट साबित होगा। तो आइये जानते हैं होली के सबसे बेस्ट हिंदी निबंध कैसे लिखें और इतना ही नहीं होली का भाषण (Holi Speech in Hindi) में भी इसे आप यूज कर सकते हैं।

Holi Essay In Hindi : ये है सबसे बेस्ट होली पर निबंध हिंदी में

Holi Essay In Hindi (होली पर निबंध हिंदी में) : होली 2019 (Holi 2019) का त्यौहार 21 मार्च को देशभर में मनाया जाएगा। होली के त्यौहार (Holi Festival) पर अगर आपको स्कूल में होली पर निबंध (Holi Par Nibandh) लिखना है तो लेखक सरस्वती रमेश द्वारा होली का सबसे बेस्ट निबंध (Essay on Holi) हम आपके लिए लाये हैं और होली का निबंध हिंदी (Holi Essay In Hindi) में आपके लिए सबसे बेस्ट साबित होगा। तो आइये जानते हैं होली के सबसे बेस्ट हिंदी निबंध कैसे लिखें और इतना ही नहीं होली का भाषण (Holi Speech in Hindi) में भी इसे आप यूज कर सकते हैं।

इन दिनों सारे वातावरण में वासंती-फगुनाहट हवाओं का प्रभाव हर ओर दिखने लगा है। बाग-बगीचे रंग-बिरंगे फूलों से सज उठे हैं। इसी रंगीन मौसम में अबीर-गुलाल उड़ाती आ पहुंची है होली। सदियों से मनाए जाने वाला यह पर्व अपनी लोक-परंपराओ, पौराणिक मान्यताओं और अपने में निहित संदेश को आज भी जन-जन के मन में बिखेर रहा है। आइए, हम सब इस पर्व के संग अपने मन में व्याप्त समस्त कलुषता, आपसी वैर-वैमनस्य को भुलाकर एक-दूसरे को प्रेम के रंग में सराबोर कर दें।

Holi Essay In Hindi : होली पर निबंध हिंदी में

हमारा देश एक उत्सवधर्मी देश है। ये उत्सव हमारे मन-जीवन से इस तरह जुड़े हुए हैं कि अगर इन्हें अलग कर दिया जाए तो उत्सव का उत्स ही क्षीण हो जाएगा। जब प्रकृति अपनी मनोरम छटाओं का उत्सव मनाती है, तो हम सब रंगों की होली खेलते हैं। यह पर्व अनायास ही नहीं मनाया जाता। असल में सृष्टि की रंगीनियत को देखकर जब हमारे रोम-रोम में इंद्रधनुष उगने लग जाएं तो समझो फागुन आ गया है। अपने औपचारिक व्यवहार को तिलांजलि दे कुछ समय के लिए नैसर्गिक रूप में उमंगित होने का समय होता है फागुन। मन में साल भर से दबी चुलबुली वृत्तियों को अनावृत्त करने का अवसर। हंसने-हंसाने, मिलने-मिलाने और रंगने-रंगाने का पर्व। निषेधों, मर्यादाओं को सजल भाव से तोड़ने का पर्व।

Holi Essay In Hindi : होली पर निबंध हिंदी में

राग-रंग की होली

होली के दो प्रमुख अंग माने जाते हैं-राग और रंग। राग अर्थात गीत, संगीत, नृत्य के अनुराग में उल्लसित हुआ मन। जब मन में अनुराग का रंग हो तो मतभेद की सारी दीवारें खुद-ब-खुद ढह जाती हैं। सारे मनमुटाव, पूर्वाग्रह, कुंठाएं भस्मीभूत हो जाती हैं। अनुरागित मन सिर्फ प्रेम देना और बदले में प्रेम लेना जानता है। अनुराग से अनुराग को बढ़ाना चाहता है। रंगों में भी यही बात होती है- प्रेम का रंग उत्पन्न करना। सबको एकरंगी कर देना। जो जितना आत्मीय होता है, उस पर रंग उतना ही चटख डाला जाता है। एक बार नहीं सौ बार उलीचा जाता है, यह आत्मीयता का रंग। आत्मीयता के साथ उत्सव मनाने का आनंद ही कुछ और है।

समरसता का रंग

होली अपने आप में एक अद्भुत पर्व है। इसे मनाने के पीछे चाहे जो कथा-मान्यता हो लेकिन समरसता की जो कहानी होली रचता है, उसके समक्ष समस्त कहानियां छोटी जान पड़ती हैं। रंग लगाकर सबको एक रंग करना, गले मिलना। होली सामाजिक सद्भाव को सदियों से बनाए हुए है। समाज में आपसी प्रेम-भाईचारे को जीवंत बनाए हुए है। आपसी मिलाप की जैसी अभिव्यक्ति रंगों के माध्यम से की जाती है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। जाति-पाति, ऊंच-नीच, धर्म का भेद सब स्वतः ही खत्म हो जाता है। सबके तन-मन रंग जाते हैं। कोई गोरा नहीं, काला नहीं, निर्धन नहीं, धनवान नहीं, मालिक नहीं, नौकर नहीं। सभी एक ही बौछार में भीग रहे होते हैं। सबकी पहचान रंगे हुए चेहरों में विलुप्त हो जाती है। सब एक रंग में दिखते हैं। उल्लासित रहते हैं। किसी को किसी से कोई शिकवा करने का ख्याल नहीं। पुरानी लेनी-देनी, वैर, कटुता सब रंगों की पिचकारी से धुल चुकी होती है। सब एक-दूसरे की गलबहियां करते हैं। गुलाल से सराबोर हैं। जब तक रंग के स्पर्श से मन की गांठें ढीली न पड़ जाएं, तब तक पर्व कैसा! होली तो एक रंगीन सेतु है, जो मन के दो किनारों को जोड़कर एक कर देता है। होली की मस्ती का स्वर गुंजायमान हो उठता है। ‘होली है!’ का चहुंओर प्रफुल्लित सामूहिक शोर वातावरण में व्याप्त हो जाता है।

गीत-संगीत की उमंग

रंगों की बरसात में जब ढोलक की थाप बजती है तो पूरे तन-मन में अह्लाद की झुरझुरी दौड़ पड़ती है। पहले मन में हलचल होती है फिर तन में और फिर पूरा वजूद ही होली की मस्ती में सराबोर हो उठता है। इस त्योहार की यही तो विशेषता है। अह्लाद की जैसी नदी होली के विचार मात्र से फूटती है, वह किसी और पर्व में कहां। यह कोई व्यक्तिगत प्रसन्नता नहीं, इसमें सभी शामिल होते हैं। बिना समूह में हुल्लड़बाजी किए, चुहल किए, भाभी को छेड़े, देवर के साथ ठिठोली किए कहां पूर्ण होता है उल्लास का यह अप्रतिम पर्व। गांवों में महीने भर पहले से ही फाग गाए जाते हैं। ढोलक, मृदंग बजाया जाता है। ननदोई या किसी और मेहमान के आने पर उन्हें रंग डालकर ही विदा किया जाता है। होली नजदीक आते-आते इधर महिलाओं की टोली में फागुन के गीत गाए जाते हैं, उधर पुरुषों की टोली में जबर्दस्त फागुनी गुलाल उड़ता है। लोकगीतों में होली की एक तरफ तो मनोरम छवि प्रस्तुत की गई है और दूसरी तरफ मर्यादाओं को तोड़ती ठिठोली। फगुआ के बहाने छेड़छाड़, ताने-उलाहनों की पिचकारियां चलती हैं। यह ऐसी मस्ती वाला पर्व है कि कुछ समय के लिए सबका बचपना लौट आता है।

समझें निहित संदेश

यह खेदजनक है कि जीवन की व्यस्तताओं, आपा-धापी, अंतर्मुखता और आधुनिक सोच के चलते बहुत से लोग इतने अनोखे और रंगीन पर्व को मनाना पसंद नहीं करते। एक समय था, जब घरों में सुबह से ही गुझिया, पापड़, दही-वड़े, नमकपारे तल कर रख दिए जाते थे। दिन भर मेहमानों के आने-जाने का तांता लगा रहता था। लोग प्रसन्न-उल्लसित भाव से होली मिलते थे। कोई रंगों से बचने, समयाभाव होने का बहाना नहीं करता था। रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मित्रों ही नहीं अंजान लोगों से रंग खेलना, उनके घर आना-जाना और पकवानों का आदान-प्रदान इस पर्व का अनिवार्य हिस्सा होता था। हर किसी को मेहमानों, सगे-संबंधियों का बेसब्री से इंतजार रहता था। यही नहीं हर कोई अपने घर से निकलकर दूसरों के घर जाने के लिए, बगैर किसी संकोच के लालायित रहता। दिल-खोलकर सबको गले लगाता, प्रेम से मिलता, नाचता-गाता और खुशियां मनाता था। लेकिन समय के साथ जीवनशैली में जो बदलाव आए हैं, उनसे हमारे त्योहार भी अछूते नहीं रह पाए हैं।

यही वजह है कि होली अब भी आती है लेकिन हमारा मन, आत्मीय रंगों की बौछार से भीग नहीं पाता। बस, कुछ हो-हल्ला होता है। एक दिन का औपचारिक शोर-शराबा भी। लेकिन इन सब में वो माधुर्य, वो मिठास और वो रंगीनियत नजर नहीं आती, जो गुजरे जमाने के फगुआ में होती थी। आज लोग अपने बंद घरों में, फ्लैटों में बैठे रहते हैं। कोई टीवी देखने में, कोई मोबाइल पर तो कोई सोशल मीडिया में खोया रहता है और होली कब आकर बीत जाती है, पता ही नहीं चलता। कहीं कोई आत्मीयता का आदान-प्रदान नहीं, मेल-मिलाप नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब इस रंगोत्सव को मनाने के पीछे निहित उदात्त संदेश को न सिर्फ आत्मसात करें साथ ही अपने साथ के लोगों को भी इससे जुड़ने के लिए प्रेरित करें। यह पर्व हमें अवसर देता है कि हम अपनों ही नहीं परायों से भी सारे गिले-शिकवे भुलाकर अपने गले लगा लें। प्यार के रंग में सबको ऐसे सराबोर कर दें कि मन में किसी के प्रति कटुता या वैमनस्यता का कोई भी बेरंग अवशेष न रह पाए। तभी होली मनाने का असली आनंद है, तभी इसका मनाना सफल भी होगा।

पौराणिक कथाओं में रंग पर्व

हमारे पौराणिक ग्रंथों में होली को लोक का पर्व कहा गया है। पौराणिक साहित्य के अनुसार एक तरफ कृष्ण-राधा और अन्य गोपियों के साथ ब्रज में रास रचाते हुए होली खेलते हैं, तो दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी अवध में उल्लास के इस महाआयोजन में शामिल होने से स्वयं को रोक नहीं पाते।

राम के हाथे कनक पिचकारी, लक्ष्मण हाथे अबीरा, अवध में होली खेलें रघुबीरा

उधर दुनिया के संहारक भगवान शिव के होली खेलने का तरीका उनकी ही तरह अद्भुत है। वे भस्म की होली खेलते हैं-खेलें मसाने में होली दिगंबर/खेलें मसाने में होली। होली मनाने के पीछे सबसे ज्यादा लोक प्रचलित पौराणिक कथा हिरण्यकश्यप और भक्त प्रह्लाद की है। सर्वशक्तिमान होने के अभिमान से भरा हिरण्यकश्यप और उसके कर्मों में उसकी सहयोगी उसकी बहन होलिका दोनों ही अहंकार के प्रतीक हैं। दोनों को ही अपनी शक्ति पर बहुत अहंकार था और दोनों का ही अंत हुआ। आज हिरण्यकश्यप और उसकी बहन नहीं हैं। लेकिन फिर भी फाल्गुन पूर्णिमा की रात हम सब होलिका दहन करते हैं। आज भी होलिका दहन, अपने अहंकार को जलाकर राख करने की प्रेरणा देता है। जब तक हम अहं से मुक्त नहीं होंगे, तब तक उत्सव का आनंद कैसे ले पाएंगे। इस पर्व का तो असल उद्देश्य ही है, ‘मैं’ की भावना को ‘हम’ में परिवर्तित कर देना। अपनी खुशी में दूसरे को शामिल करना। दूसरे की खुशी में खुद शामिल हो जाना।

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