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Holi Essay 2019: होली पर सबसे बेहतरीन निबंध

होली की महिमा का गुणगान या बखान करना किसी के लिए संभव नहीं। रंगीली, रसीली और नशीली इस होली का शुभागमन होते ही सबका मन बल्लियों उछलने लगता है, जैसे बरसात की शुरुआत होते ही मेंढक फूले नहीं समाते हैं। यदि सभी पर्व पावन हैं तो यह पर्व बड़ा पावनतम है। म

Holi Essay 2019: होली पर सबसे बेहतरीन निबंध

होली की महिमा का गुणगान या बखान करना किसी के लिए संभव नहीं। रंगीली, रसीली और नशीली इस होली का शुभागमन होते ही सबका मन बल्लियों उछलने लगता है, जैसे बरसात की शुरुआत होते ही मेंढक फूले नहीं समाते हैं।

यदि सभी पर्व पावन हैं तो यह पर्व बड़ा पावनतम है। मनोरंजन एवं नंगपन के बीच की खाई कहीं भी दिखाई नहीं देती है। पूरी ईमानदारी के साथ अपनी दमित इच्छाओं को एक्सपोज करना अति प्रशंसनीय है। हुड़दंगलीला से बढ़कर कोई लीला नहीं है। साल भर गले पड़ने वाला भी गले से लगाता है।

जो लोग होली के रंगमंच पर इन सांस्कृतिक हुड़दंगी प्रस्तुतियों के सौ टंच मनोरंजन को मर्यादा भंजन कहते हैं, वास्वत में वे होलिका-दहन की तरह ईर्ष्या दहन के शिकार रहते हैं। फुल सेटिसफेक्शन वाले एक्शन उन्हें फूटी आंखों भी नहीं सुहाते हैं।

वर्तमान युग, धर्मयुग नहीं बल्कि गर्म युग है। संस्कारों की एक्सपायरी डेट द एंड की ओर है। झूठ आज का सच है। इसलिए विकृति को ही संस्कृति मान लेना चाहिए। होली के इस पुनीत पर्व की पृष्ठभूमि में जाने की आवश्यकता नहीं है।

बस इतना भर फोकस में रखना है कि बुरा न मानो होली है। इस तर्ज पर उपद्रव, छेड़खानी, रंग के साथ हुड़दंग और वाइन पर क्वाइन फूंकना ही ऐसे त्योहार का भरपूर मजा लूटना है। मन को रंगने का जमाना रवाना हो गया। अब केवल सब को रंगने का चलन है, जो हमारे मॉडर्न कल्चर का प्रतिफल है।

रोल मॉडल के बढ़िया विकल्प रोड मॉडल हैं। हुरियारों की टोलियां और बोलियां आशातीत रोचक प्रतीत होती हैं। हर नाके पर ढोल-ढमाके अंदर फुरफुरी पैदा कर देते हैं। लोक-लाज को रौंदते हुए गालियों के संग नालियों का सदुपयोग हमारे खास हर्षोल्लास का प्रदर्शन शानदार कहलाता है।

मुखौटों, विदूषकों और स्वांगों की भरमार के साथ रंग-गुलाल की बहार मर्यादा का लबादा उतारने में वो खुशी होती है, जो खुशी सांप को अपनी पुरानी केंचुल उतारने में होती है। जब रंगबाजी का जुनून रहता है, तो मनमौजी जेठ भी अपनी अनुज-वधू को मौजी कहता है।

पियो और पीने दो की एक्टिविटी से सेलिब्रिटी का एंज्वॉयमेंट सौ पर्सेंट रहता है। टुन्नावस्था के धुंआधार सुख को सिर्फ भुक्तभोगी ही जानते हैं। ‘एक तू न मिली सारी दुनिया मिले भी तो क्या है, तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त, पी ले पी ले ओ मोरे राजा’ गांव और शहर में ये लहर जाम के खूबसूरत अंजाम भी दखाती है।

धुत्तावस्था वहां तक पहुंचाती है, जहां सूरज की किरण तक नहीं पहुंच पाती है। पीने से बढ़कर सोमरस उड़ेलने का आनंद ऐसे पावन पर्व के अवसर में न मिलेगा तो भला कब मिलेगा! समझदार सीनियर सिटीजन तो होली की ठिठोली से यह शो करने से नहीं चूकते हैं कि अभी तो हम जवान हैं।

रसरंग के प्रसंग के अलावा कुछ बातों में होली बड़ी अलबेली और अकेली है। इसीलिए इसके सामने तो कई त्योहार फीके हैं। आदमी हुड़दंगियों की पकड़ में जब आता है, वो रंगीले सत्कार का शिकार हो जाता है। दारू और भांग के इंप्रेशन से डिप्रेशन की ऐसी-तैसी होने लगती है। टेंशन की भी हवा निकलना स्वाभाविक है।

इस त्योहार के कुछ साइड इफेक्ट भी होते हैं, लेकिन वे नजरअंदाज करने लायक हैं। ज्यादा मनचले भौंरे दुर्मति के कारण दुर्गति प्राप्त कर लेते हैं। मार-धाड़ वाले दंगल के बाद अस्पताल में कंप्लीट रेस्ट के अच्छे दिन देखने को मिल जाते हैं। लोग अपनी असलियत पर उतर आते हैं। बस्ती-बस्ती में मस्ती की इन करतूतों से इस उत्सव को चार चांद लगते नजर आते हैं।

हैप्पी होली के आलम में उपाधियों से विभूषित किया जाना भी बड़ा प्रासंगिक लगता है। चोर, मूर्ख, चार सौ बीस, गर्दभराज, धूर्त, उल्लू, लंपट आदि की पदवियां प्रदान कर अंदर के भड़ास बड़े मजे से निकाली जाती है। केवल इस दिन मसखरी के नाम पर खरी कहने का स्वर्ण अवसर मिलता है।

आलू, बैगन, टमाटर से लेकर जूतों की मालाओं से भी स्वागत वंदन और अभिनंदन के प्रिय कार्यक्रम गुलमोहर से ज्यादा मनोहर लगते हैं। लोग अपनी असली औकात में आकर बेहद खुश दिखते हैं। स्वांग के स्तर पर अलंकृत होने से मन के तार झंकृत होते हैं। इस रंग-बिरंगी होली में कहीं मूर्ख कवि-सम्मेलन और सम्मान-समारोह के अंतर्गत महानुभावों को भी आईना दिखाने का आनंद प्राप्त किया जाता है।

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