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Holi 2019 : होली पर स्कूल काॅलेज की मस्ती को दें माॅडर्न टच

20 मार्च को होलिका दहन (Holika Dahan) है और 21 मार्च को होली का उत्सव मनाया जाएगा। होली में काॅलेज गोइंग छात्रा मोनिका हर साल होली के दिन सुबह उठते ही अपनी सहेलियों के घर पहुंच जाती है। सो रही अपनी सहेली के चेहरे पर चुपके से रंग लगाती है। जब तक उसे पता चलता है तब तक उसका चेहरा रंगीन हो चुका होता है।

Holi 2019 : होली पर स्कूल काॅलेज की मस्ती को दें माॅडर्न टच

20 मार्च को होलिका दहन (Holika Dahan) है और 21 मार्च को होली का उत्सव मनाया जाएगा। होली में काॅलेज गोइंग छात्रा मोनिका हर साल होली के दिन सुबह उठते ही अपनी सहेलियों के घर पहुंच जाती है। सो रही अपनी सहेली के चेहरे पर चुपके से रंग लगाती है। जब तक उसे पता चलता है तब तक उसका चेहरा रंगीन हो चुका होता है।

काॅस्टिंग अकाउंटिंग का छात्र राजा होली के दिन उठता है, अपनी मां के हाथ से गुजिया छीनता है और गुलाल का एक पैकेट उन पर डाल देता है। यह राजा की होली की शुरुआत होती है। इसके बाद हालंाकि वह अपने दोस्तों के साथ सड़कों पर आ जा रहे लोगों पर रंग डालता है तथा मासूम सा चेहरा बनाकर कहता है, बुरा न मानो होली है।

दीपशिखा हर साल रंगों से बचने की कोशिश करती है। मगर वह ऐसा कर नहीं पाती। दरअसल दीपशिखा के पड़ोस में रह रहा उसका बचपन का दोस्त आर्यन हर साल उसके कमरे में खिड़की के जरिये घुसकर उसे सिर से लेकर पांव तक होली के रंगों में नहला देता है।

कृष्णा हमेशा होली पर कुछ नया करने की सोचता है। इसलिए सुबह होते ही कृष्णा चैराहे पर खड़ा हो जाता है। वहां से आ जा रही सभी जानी पहचानी लड़कियों पर वह स्प्रे करता है। जब वह गुस्से से उसे मारने के लिए दौड़ती हैं तो उसके पास रखी कीचड़ और ग्रीस के मिक्सचर से भरी बाल्टी उन पर उड़ेल देता है।

होली के दिन दरअसल हर कोई अलग अलग किस्म से मस्ती करके इसे यादगार बनाने की कोशिश करता है। लेकिन देखा जाए तो सालों से होली पारंपरिक रूप से ही मनायी जा रही है। हालंाकि इसमें आधुनिकता भी काफी हदतक झलकती है। मगर वह पुरानी परंपराओं के ही पूरक बनकर उभरे हैं। यहां यह सवाल लाजिमी हो जाता है सालों बाद भी हमारे पास सेलिब्रेशन के नए तरीके क्यों नहीं?

भूमंडलीकरण के इस दौर में शायद ही कोई ऐसी चीज है जो बदली न हो। फैशन इंडस्ट्री में नए नए बदलाव आए हैं। ब्यूटी इंडस्ट्री, इंटीरियर डिजाइनिंग, कम्युनिकेशन के तौर तरीके, कामकाजी जीवनशैली, आॅफिस वर्क स्टाइल, खानपान यानी सब कुछ बदला है। ऐसे दौर में यह हैरान करने वाला तथ्य है कि सेलिब्रेशन में कुछ नयापन क्यों नहीं खोजा जा सका है? बात सिर्फ होली की नहीं है। हम किसी भी त्यौहार की तरफ नजर उठाकर देखें तो यही लगता है कि सेलिब्रेशन के पुराने तौर तरीकों से हम आज तक बाहर नहीं निकले हैं। खासकर युवावर्ग को बदलावों का सूत्रधार माना जाता है। लेकिन युवा में भी नएपन की खोज की ललक नहीं महसूस की जाती। हालंाकि आप यहां सवाल कर सकते हैं कि अगर होली है तो इसे रंगों से ही सेलिब्रेट किया जाएगा और दीवाली है तो बिना पटाखे और दीये इसका क्या महत्व है?

निश्चित रूप से यह सवाल सौ फीसदी सही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम जब अपने त्यौहारों को सेलिब्रेट करेंगे तो उसमें पारंपरिक छाप अवश्य नजर आएगी। इसलिए यह सवाल लाजिमी है कि हम पुरानी चीजों के इस कदर समर्थक क्यों है? क्या हम अपनी संस्कृति में कुछ नया जोड़ या घटा नहीं सकते या फिर हमारे दिल में अपनी त्यौहारों के प्रति बदलाव न करने की जिद बनी है? यूं तो यह तथ्य जगजाहिर है कि सामान्य रूप से हम बदलाव के पक्षधर नजर नहीं आते। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में आए परिवर्तन इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमें बदलाव भाते हैं। लेकिन देखा जाए तो ये तमाम क्षेत्र विकासशील दौर से गुजर रहे थे। अतः इनमें बदलाव से हमें हैरानी नहीं होती।

वास्तव में हम अपने सेलिब्रेशन स्टाइल का अब तक आधुनिकीकरण नहीं कर पाए हंै। यही वजह है कि सदियों से चली आ रही होली मनाने की परंपरा आज भी ज्यों की त्यों कायम है। हमने होली को मिठाइयों और रंगों तक ही सीमित रखा है। हम इसके इतर यह सोचने के लिए समर्थ नहीं है कि होली को जिंदादिली से जीने के लिए इससे परे भी कुछ नया सोचा जा सकता है। हां, हमें यह मानना होगा कि बधाई देने के तौर तरीकों में बदलाव अवश्य आए हैं। हालांकि यह माॅडर्न लाइफ की मांग है। अगर हम प्रत्यक्ष रूप से दूसरों को होली की बधाई देने जाते हैं तो ऐसा लगेगा जैसे हम तकनीकी युग में पिछड़े हुए हैं। इस वजह से बधाई देने हेतु हम कभी अपने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं तो कभी ई-मेल का या फिर सोशल नेटवर्किंग साइटों का।

होली में देखा जाए तो हिंदुस्तान में लगभग एक सी मिठाई बनती है। यही नहीं विदेशों में भी जहां जहां होली सेलिब्रेशन किया जाता है, वहां भी होली मनाने के तौर तरीके वही है जो परंपारगत रूप से यहा के रहने वाले लोग अपनाते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि भूमंडलीकरण के इस दौर से त्यौहार पूरी तरह अछूते हैं। हालांकि अब कोई त्यौहार किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रहा है। परिणामस्वरूप अब होली हो या दीवाली विश्व के हर कोने में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। नई मस्ती तलाशी जाती है मगर अंदाज आज भी वही पुराना है। असल में यह कहना चाहिए कि हम नए अंदाज से झिझकते हैं इसलिए पुरानों से खुद को चिपकाए रखने की पुरजोर कोशिश करते हैं।

असल में बात सिर्फ त्यौहारों की नहीं है। बात हमारे सेलिब्रेशन स्टाइल की है। हम मस्ती करने के नाम पर चार दोस्तों के संग बैठ जाते हैं, हाथ में वाइन या व्हिस्की की बोतल होती है। उसे गटक जाते हैं। यह मान लेते हैं कि सेलिब्रेशन का यही एकमात्र तरीका है। जरा सोचिए जब हर क्षेत्र में आधुनिकीकरण नजर आता है फिर सेलिब्रेशन में क्यों नहीं? मस्ती के अंदाज में कुछ फेरबदल की अब दरकार महसूस होने लगी है।

मस्ती को दें माॅडर्न टच

मस्ती करने के लिए मधुर संगीत सुनना, ड्रिंक करना और टेबल पर चढ़कर डांस करना अब पुराने तौर तरीकों का हिस्सा हो गया है। अब वक्त आ गया है कि मस्ती को भी माॅडर्न टच के सथ मेकओवर किया जाए। सवाल है इसके लिए क्या किया जा सकता है? नीचे दी जा रही टिप्स को आजमाएं और मस्ती को माॅडर्न बनाएं-

  • ई वल्र्ड में अपनी भागीदारी बढ़ाएं।
  • अजनबियों के साथ सेलिब्रेशन के बहाने तलाशें।
  • खास मौकों के अलावा बेमौके भी सेलिब्रेशन के बहाने तलाशे जा सकते हैं।
  • पारंपरिक रूप से त्यौहार सेलिब्रेट की करने की बजाय कल्पनाशीलता के साथ सेलिब्रेशन में नयापन तलाशा जा सकता है।
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