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हिन्दी दिवस 2017: यही हैं हिन्दी की बेकद्री के 5 बड़े कारण

हम देशवासी ही जाने-अनजाने ही कई तरीको से हिंदी भाषा को समृद्ध करने की बजाए नुकसान पहुंचा रहे हैं।

हिन्दी दिवस 2017: यही हैं हिन्दी की बेकद्री के 5 बड़े कारण
हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हर साल हिंदी दिवस मनाया जाता है। लेकिन, अब इसका असर अब बेअसर होता जा रहा है। हम देशवासी ही जाने-अनजाने ही कई तरीको से हिंदी भाषा को समृद्ध करने की बजाए नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हिंदी राजभाषा होते हुए भी अंग्रेजी के पैरों तले रौंदी जा रही है। इसके लिए समाज और सरकार भी बराबर की जिम्मेदार है। ये हैं हिंदी की बेकद्री के पांच बड़े कारण:-

हिंदी के प्रति बदलता नजरिया

आज समाज का हिंदी के प्रति नजरिया बदलता जा रहा है। अंग्रेजी बोलने वालों सम्मान की नजर से देखा जाता है, जबकि हिंदी बोलने वाले को दकियानूसी। यही मानसिकता राष्ट्रभाषा हिंदी को नुकसान भी पहुंचा रही है।
हालात यह है कि आज हर अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना चाहता है। सभी को लगता है कि अंग्रेजी में ही सुनहरा भविष्य छिपा है। लोगों को समझना चाहिए कि अंग्रेजी सीखने में कोई बुराई नहीं, लेकिन हिंदी को लेकर हीनभावना पालना भी ठीक नहीं है।

अंग्रेजीदां हुई शिक्षा व्यवस्था

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था भी अंग्रेजी में होनी शुरू हो गई है। यह आलम पहले प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों में देखने को मिल रहा था, लेकिन अब सरकारी स्कूल भी इस दिशा में मुड़ गए हैं।
यहां संभलने की जरूरत है कि अंग्रेजी की हवा में कहीं हिंदी न पीछे छूट जाए। खास बात यह है कि स्कूल और कॉलेजों में प्रोफेशनल कोर्सेस की पढ़ाई भी अंग्रेजी में ही होती है। ऐसे में हिंदी का नुकसान होना लाजिमी है।

नौकरशाही में अंग्रेजी का दबदबा

राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3(3) के तहत आने वाले सभी दस्तावेजों को हिंदी और अंग्रेजी दोनों में ही जारी करना जरूरी है। लेकिन, ऐसा सरकारी दफ्तरों में देखने को नहीं मिलता है। यहां पर नौकरशाही अंग्रेजी को ही बढ़ावा देती नजर आ रही है।
खास बात यह है कि प्रशासनिक सेवाओं की नियुक्तियों में भी अंग्रेजी जानकारों को तव्वजों दी जा रही है। ऐसे में हिंदी खुद ही दरकिनार हो रही है।

साहित्य और शोध में अंग्रेजी

हिंदी की दुर्गति में एक बड़ा कारण यह भी देखने को मिल रहा है कि पहले के मुकाबले साहित्य और शोध में हिंदी कम होती जा रही है। हिंदी की किताबों का भी टोटा साफ नजर आने लगा है। शोध के लिए अब अंग्रेजी किताबों का सहारा लिया जा रहा है।
अच्छी विषय-वस्तुओं पर हिंदी के मुकाबले बेहतर अंग्रेजी साहित्य तैयार हो रहा है। जो हिंदी में किताबें आ रही हैं, वो मौलिक नहीं हैं या फिर वो अंग्रेजी से अनुदित हैं। जब हिंदी में बेहतर और मौलिक किताबें नहीं होंगी तो उसका पाठक वर्ग कैसे लंबे समय तक टिक पाएगा।

बाजारवाद से अंग्रेजी हुई हावी

हिंदी को पीछे धकेलने में देश में बढ़ता बाजारबाद भी जिम्मेदार है। यहां भी हम अपने ऑफिस, शॉपिंग मॉल, दुकानों में किसी न किसी तरह अंग्रेजी को ही तव्वजो देते हैं। होर्डिंग, बैनर और पोस्टर अब हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही दिए जा रहे हैं।
खास बात यह है कि इंटरनेट की भाषा भी अंग्रेजी ही देखने को मिल रही है। बहुत कम लोग हिंदी में संदेश देते नजर आएंगे। वहीं, चीन की बात करें तो वहां चीनी भाषा को हर जगह प्राथमिकता दी जाती है। उनके सभी उत्पाद भी चाइनीज से पटे होते हैं।
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