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ऊंचे ऋण से बाजार प्रभावित:आरबीआई डिप्टी गवर्नर

सरकारी बांड के लिए अलग एजेंसी पर आरबीआई सहमत

ऊंचे ऋण से बाजार प्रभावित:आरबीआई डिप्टी गवर्नर
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नई दिल्ली. सार्वजनिक ऋण जुटाने के लिए नई एजेंसी के गठन पर रिजर्व बैंक की सरकार के साथ कोई असहमति नहीं है। यह बात सोमवार को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर एसएस मुंदड़ा ने कही। यह पूछने पर कि क्या सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी (पीडीएमए) के गठन के संबंध में सरकार और आरबीआई के बीच सारी असहमति दूर हो गई है, उन्होंने कहा ‘हम कहते रहे हैं कि कोई मतभेद है ही नहीं- तो इसे दूर करने का सवाल कहां पैदा होता है।’ मौद्रिक नीति समिति के गठन के संबंध में उन्होंने कहा कि सरकार के साथ बातचीत की प्रक्रिया चल रही है। मुंदड़ा ऐसोचैम द्वारा आयोजित एक समारोह के मौके पर बोल रहे थे। सरकार ने मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करने और इसके आधार पर मौद्रिक नीति तय करने के लिए एक मौद्रिक नीति समिति बनाने का प्रस्ताव किया है। राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने प्रस्तावित पीडीएमए को सरकार और केंद्रीय बैंक से स्वतंत्र रखने का समर्थन किया है।सरकार की ओर से बांड के जरिए जुटाए जाने वाले ऋण में बढोतरी से देश में कार्पोरेट ऋण बाजार की वृद्धि प्रभावित हो रही है। यह बात सोमवार को रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने कही।
गांधी ने यहां रेटिंग एजेंसी केयर द्वारा कार्पोरेट ऋण पर आयोजित एक सम्मेलन में कहा, ‘देश में सरकारी प्रतिभूतियों की भारी आपूर्ति से कार्पोरेट बांड बाजार की वृद्धि की बड़ी अड़चन है।’ कार्पोरेट ऋण बाजार की वृद्धि न हो पाने से जुड़े आंकड़े प्रस्तुत करते हुए गांधी ने कहा कि हर साल सिर्फ सरकारी ऋण ही निर्बाध बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा ‘यदि हम सरकारी बांड से तुलना करते हैं तो कार्पोरेट बांड बाजार बहुत छोटा है।’ उन्होंने कहा कि 2013 में बकाया सरकारी बांड सकल घरेलू उत्पाद के 49.1 प्रतिशत के बराबर थी। इसकी तुलना में बकाया कार्पोरेट बांड जीडीपी के 5.4 प्रतिशत के बराबर ही थे।

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