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Happy Republic Day 2019 Essay : 26 जनवरी के लिए सबसे बेस्ट ''गणतंत्र दिवस पर निबंध'' हिंदी में

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Happy Republic Day 2019 Essay : 26 जनवरी के लिए सबसे बेस्ट गणतंत्र दिवस पर निबंध हिंदी में
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Happy Republic Day 2019 Essay

26 जनवरी (26 January) के लिए गणतंत्र दिवस पर निबंध 2019 (Republic Day Essay 2019) की तैयारी करनी है तो हरिभूमि गणतंत्र दिवस 2019 (Republic Day 2019) के अवसर पर आया है लेखक 'शाहिद ए चैधरी' द्वारा लिखित हिंदी में गणतंत्र दिवस पर निबंध 2019 हिंदी में (Republic Day Essay in Hindi 2019) और स्कूल में 26 जनवरी (26 January) के लिए गणतंत्र दिवस पर निबंध हिंदी में (Republic Day Essay in Hindi 2019) लिखने के लिए सबसे बेस्ट गणतंत्र दिवस पर निबंध (Gantantra Diwas Par Nibandh), यह निबंध गूगल पर भी तेजी से ट्रेंड कर रहा है अगर आपको भी गणतंत्र दिवस पर निबंध (Gantantra Diwas Par Nibandh) लिखना है तो हरिभूमि आपके लिए लाया है लेखक 'शाहिद ए चैधरी' द्वारा लिखित गणतंत्र दिवस पर निबंध, जो आपके लिए कारगर साबित हो सकता है...

Happy Republic Day 2019 / 26 January / Republic Day Essay In Hindi

गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

Happy Republic Day 2019 / 26 January / Republic Day Essay In Hindi

गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

कुछ साल पहले की बात है-सात वर्ष की शाहनूर अचानक अपने घर से लापता हो गई। लखनऊ में इंदिरानगर के निकट लवकुश बस्ती की रहने वाली शाहनूर को उसके पिता मुहम्मद फुरकान अंसारी व माता शहीदुन अंसारी ने आस पड़ोस में तलाश किया। लगभग एक घंटे बाद शाहनूर सिटी मोंटेसरी स्कूल के बाहर बैठी हुई उन्हें मिली। उससे जब वहां आने की वजह पूछी गई तो उसने कहा कि वह भी इस स्कूल में पढ़ना चाहती है। अंसारी परिवार लगभग 19 साल पहले बाराबंकी से लखनऊ रोजगार की तलाश में आया था। इंदिरानगर लखनऊ की पहली नियोजित काॅलोनी है और इसी पाॅश काॅलोनी में लवकुश बस्ती है। लेकिन इन दोनों यानी इंदिरानगर व बस्ती में जमीन आसमान का सा अंतर है। इंदिरानगर में शानदार, देखने दिखाने लायक मकान हैं, जबकि नाले के किनारे पर बसी लवकुश बस्ती में वन बेडरूम वाले मकान हैं, जिनमें रहने वाले एक सामुदायिक शौचालय को शेयर करते हैं और इस बस्ती में एक मस्जिद है, जिसका निर्माण कार्य चल रहा है।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

उस दिन शाहनूर ने अपनी इस दबी इच्छा का इजहार कर दिया था कि वह भी उस काॅलोनी के सम्पन्न लोगों के बच्चों के लिए बने उस स्कूल में पढ़ने की इच्छुक है। उसने उस अदृश्य रेखा को लांघा था जो लवकुश बस्ती और इंदिरानगर को विभाजित करती है। फुरकान व शहीदुन को रोते बिलखते हुए अपनी बेटी तो मिल गयी, लेकिन शाहनूर के सवाल ने उन्हें बेचैन कर दिया-‘सिटी मोंटेसरी स्कूल में मैं पढ़ने के लिए कब जाऊंगी?’ उसका अकसर यह सवाल होता था। फुरकान व शहीदुन के तीनों बच्चे शाहनूर, इमरान और कायनात रोजाना सुबह दूसरे बच्चों को स्कूल जाता हुआ देखते हैं, उनका भी मन यूनिफाॅर्म पहनकर, बैग कंधे पर टांगकर, स्कूल जाने का होता है। लेकिन कबाड़ी का काम करने वाले फुरकान के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपने बच्चों के सपनों को साकार कर सके। उसके पास जो रद्दी आती है उससे उसके बच्चे तस्वीरों वाली पुस्तकें निकालकर घर के सामने के गुलमोहर पेड़े के नीचे बैठकर दिनभर उन्हें देखते रहते हैं।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

शिक्षा के लिए अपने बच्चों में इस जज्बे को देखकर फुरकार ने एक गैर सरकारी संगठन भारत अभयोदय फाउंडेशन से सम्पर्क किया, जिसने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के समक्ष अर्जी डाली कि शिक्षा के अधिकार के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को आरक्षण सुविधा दी गयी है उसके तहत फुरकान के तीनों बच्चों को सिटी मोंटेसरी स्कूल की इंदिरानगर शाखा में प्रवेश दिलाया जाये। लेकिन स्कूल द्वारा न सिर्फ इन बच्चों की बल्कि 28 अन्य बच्चों के प्रवेश की अर्जी को ठुकरा दिया। अब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ शाखा में विचाराधीन है। शाहनूर की तरह ऐसे गरीब बच्चों की देशभर में कमी नहीं है जो शिक्षा के अधिकार कानून के तहत प्राइवेट स्कूलों में अच्छी शिक्षा पाने के लिए इंतजार कर रहे हैं। अगर उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो 2014-15 में पूरे राज्य में सिर्फ 54 आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग कोटा के तहत बच्चों को प्रवेश मिल सका। इसके अगले वर्ष यह संख्या बढ़कर 3500 तो अवश्य हो गयी, लेकिन विशाल जनसंख्या वाले देश में यह अब भी न के बराबर ही है।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 21(अ) के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा के अधिकार का प्रावधान है और शिक्षा के अधिकार कानून के तहत प्राइवेट स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए निर्धारित की गई है, लेकिन इन प्रावधानों को सख्ती से लागू नहीं किया जाता है, जिससे शिक्षा दर में आशानुरूप सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। मानवाधिकारों, समता का अधिकार, सम्मान, प्रगति, तथा अन्य मौलिक अधिकारों से संबंधित संविधान में जो अन्य प्रावधान हैं उनकी स्थिति भी गणतंत्र के 66वें वर्ष में इससे कुछ भिन्न नहीं है। गौरतलब है कि भारतीय संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान का गठन किया गया, 1935 के भारत सरकार कानून की जगह। लेकिन संविधान को स्वीकार करने व लागू करने की तिथि 26 जनवरी 1950 को माना गया क्योंकि 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस ने 26 जनवरी को ही पूर्ण स्वराज का नारा बुलंद किया था। अतः 1950 से हर साल 26 जनवरी को ही गणतंत्र दिवस मनाया जाता है।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

देश में नागरिकों को मौलिक अधिकारों के साथ सम्मान से जीवनयापन करने में संविधान के महत्व से न इंकार किया जा सकता है और न ही इसे कम करके देखा जा सकता है। संविधान के तहत जहां सभी नागरिकों की बुनियादी जिम्मेदारियां हैं वहीं उन्हें बहुत से अधिकार भी मिले हुए हैं, जिनसे उनके लिए बराबरी व सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने की राहें खुलती हैं। मसलन, अनुच्छेद 19(1) (ए) के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का प्रावधान है, अनुच्छेद 15 व 25 के तहत सभी नागरिकों को अपनी पसंद के धर्म को अपनाने व उसके अनुसार पूजा पाठ आदि करने का हक है, अनुच्छेद 23 व 24 के तहत सभी नागरिकों को शोषण से सुरक्षित रहने का अधिकार है और अनुच्छेद 14 से 18 तक सभी नागरिकों के लिए समता का अधिकार है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 32 से 35 तक सभी नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है कि अगर उन्हें प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन होता है तो संवैधानिक उपचार उपलब्ध हैं और भारत के सुप्रीम कोर्ट के पास यह शक्ति है कि वह लोगों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करे।

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दरअसल, अनुच्छेद 32 न सिर्फ हमारे संविधान की आत्मा है बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद भी है। इस अनुच्छेद के तहत यह प्रावधान है कि अगर किसी व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है तो कोई भी नागरिक लिखित याचिका के जरिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में राहत के लिए दस्तक दे सकता है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनेक मुद्दे उठाए गए हैं जैसे किसी को गैर कानूनी ढंग से हिरासत में लेना (जो जीवन व स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है), प्राकृतिक व मानव निर्मित आपदाओं के पीड़ितों को उचित मुआवजा दिलवाना, पर्यावरण प्रदूषण को रोकना और जनहित याचिकाओं की व्यवस्था को गठित करना जिस मामले में व्यक्ति यह दावा करता है कि उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है तो वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अनुच्छेद 32 के तहत दर्ज की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के पास न केवल मौलिक अधिकार के उल्लंघन को रोकने का अधिकार है बल्कि वह उल्लंघन की स्थिति में राहत व उपचार भी प्रदान कर सकता है।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

ऐसा आदेश जारी करने के जरिये किया जाता है। मसलन, लोगों को सेवाएं व लाभ उपलब्ध कराने में सरकार की भूमिका को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरडी शेट्टी बनाम अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट प्राधिकरण (1979) में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अनुच्छेद 32 का प्रयोग मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए किया जा सकता है, भले ही मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कार्यकारिणी की सक्रियता/असक्रियता के कारण हो या विधायिका की वजह से। इसी तरह 1984 में सुप्रीम कोर्ट ने उन बंधुआ मजदूरों का मामला उठाया जिन्हें फरीदाबाद की पत्थर खदानों में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। यह मामला शिकायत के तौरपर एक गैर सरकारी संगठन द्वारा सुप्रीम कोर्ट को भेजे गये पत्र के आधार पर उठाया गया। इस मामले ने ही देश में जनहित याचिका (पीआईएल) की नींव रखी।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत जैसे देश में जहंा इतनी गरीबी, अज्ञानता, शोषण है, प्रक्रिया के किसी भी कट्टर फाॅर्मूले पर जोर देना मौलिक अधिकारों को आम आदमी की पहुंच से दूर करना होगा। इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर आम आदमी के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप करता रहा है, जिसकी एक लम्बी सूची है, जिसे यहां देना जगह के अभाव में संभव नहीं है, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत को गणतंत्र बने हुए 66 वर्ष हो गये हैं, फिर भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन अब तक क्यों हो रहा है? दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में नववर्ष (2016) का स्वागत करने के लिए अनेक टीवी चैनलों पर हास्य व मनोरंजन के कार्यक्रम प्रसारित किये गये थे, जिनमें से एक में हास्य कलाकार किकू शारदा को इस तरह दिखाया गया था कि वह चमकदार काॅस्ट्यूम पहने हुए बाइक पर सवार होकर स्टेज पर प्रवेश करते हैं, तकरीबन वैसे ही जैसे डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत रामरहीम सिंह ने अपनी फिल्म ‘एमएसजीः मैसेंजर ऑफ गाॅड’ में किया था।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

यह बात डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों को अपने गुरु का अपमान लगी और उन्होंने हरियाणा के विभिन्न पुलिस थानों में किकू शारदा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295ए के तहत मुकदमें दर्ज करा दिये कि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है। यह कहना कठिन है कि डेरा सच्चा सौदा को किस धर्म की श्रेणी में रखा जाए। लेकिन हरियाणा पुलिस ने शारदा व 8 अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया। बाद में शारदा को जमानत तो अवश्य मिल गयी, लेकिन यह प्रश्न फिर भी बना रहा कि यह गिरफ्तारी कहीं इस ‘उपकार’ के बदले में तो नहीं हुई कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में गुरमीत सिंह ने बीजेपी का समर्थन किया था, जो अब सत्तारूढ़ है? बहरहाल, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले में गुरमीत सिंह को अच्छी तरह से मालूम होगा क्योंकि 2008 में गुरूगोविंद सिंह की वेशभूषा में जनता के समक्ष आये थे तो इससे अकालतख्त की धार्मिक भावनाओं को बहुत ‘ठेस’ पहुंची थी,

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

जिससे पंजाब व हरियाणा में डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों और सिखों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। यह विवाद आठ वर्ष तक चला, लेकिन अब भी शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक समिति के सदस्यों के बीच इसको लेकर विवाद है कि कुछ लोग गुरूमीत सिंह की पिछले साल की माफी को स्वीकार करते हैं और कुछ नहीं करते, जिसकी वजह से अकालतख्त के पंच प्यारों को निष्कासित भी किया गया। यद्यपि पाकिस्तान की तरह हमारे देश में ईशनिंदा कानून नहीं है, लेकिन जब धर्म की बात आती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगाने के लिए प्रावधान अवश्य हैं, जैसे आईपीसी की धारा 153ए का उद्देश्य धर्मों के बीच टकराव व बदगुमानी को रोकना है और धारा 295ए के जरिए धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहंुचाने की व्यवस्था है। लेकिन जब इन दोनों धाराओं को लागू होते हुए देखते हैं तो पुलिस में शिकायतें दूसरों को धमकाकर चुप कराने के लिए ज्यादा होती हैं बजाए वास्तव में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

किकू शारदा की गिरफ्तारी के जरिए भी कलाकारों व काॅमेडियनों को यह संदेश पहुंचाना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं वहंा समाप्त हो जाती हैं जहां गुरूओं और बाबाओं से उस बात का संबंध हो। दूसरे शब्दों में धर्म या धर्मगुरूओं पर टिप्पणियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से जबरन अलग रखने का प्रयास है। जब 2013 में एक पत्रिका के कवर पर क्रिकेटर एमएस धोनी को भगवान विष्णु के रूप में दिखाया गया तो अनेक पुलिस थानों में मुकदमें दर्ज कर दिये गये। कैथलिक चर्च को इस बात से परेशानी है कि ‘ऐग्निस ऑफ गाॅड’ नाटक में एक युवा नन को ऐसी मां के रूप में क्यों दिखाया गया जिसके नवजात शिशु का निधन हो जाता है। बौद्ध धर्मानुयायियों को इस बात से नाराजगी है कि अभिनेत्री राखी सावंत बाथ टब में हैं और सामने बुद्ध की प्रतिमा रखी हुई है। मुस्लिमों को इस बात से तकलीफ है कि अखिल हिंदू महासभा के कमलेश तिवारी पैगम्बर के बारे में विवादित टिप्पणियंा करते हैं। तिवारी जेल में है फिर भी हिंसक प्रदर्शन जारी हैं।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

कट्टरपंथी हिंदुओं को शिकायत है कि सरकार अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिमों का तुष्टिकरण करती है। जिसके लिए उन पुस्तकों (सेटेनिक वर्सिस आदि) पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है जो धार्मिक भावनाओं को भड़काती हैं। धार्मिक भावनाओं को भड़काने और दंगा फैलाने के लिए दोषी लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर कई तरह से रोक लगायी जाती है यहां तक कि धर्म के खिलाफ बोलने और लिखने वालों को भी मौत की नींद सुला दिया जाता है। एमएम कालबुर्गी, गोविंद पंसारे जैसी शख्सितों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का वास्तविक मायनों में इस्तेमाल करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इससे डरकर एक लेखक ने लेखन से ही अवकाश ग्रहण कर लिया और एक तर्कशास्त्री मुकदमों की धमकियों से डरकर विदेश में शरण लेने के लिए मजबूर हो गया। दबाव में आकर पेंग्विन इंडिया ने 2014 में वंेडी डोनिगर की पुस्तक ‘द हिंदूजः एन आॅल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को बाजार से वापस मंगाकर पल्प करने पर सहमति दे दी। कुल मिलाकर धीरे धीरे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमसे छिनती चली जा रही है। अब सवाल यह है कि ऐसे में क्या किया जाये?

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध्ा लगाने से कुछ भी हासिल नहीं होता। ऐसा करने से न तो विचार सीमित होता है, न विचार की आलोचना हो पाती है और न ही विचार पर बहस हो पाती है। इससे सिर्फ इतना होता है कि लोगों से उनकी स्वतंत्र सोच को, उनकी आत्मा की आवाज को और जो वह हैं वह बने रहने की क्षमता को छीन लिया जाता है। हम बोलते हैं क्योंकि बोलना हमारा स्वभाव है। बोलने की स्वतंत्रता पर जो पाबंदियां लगायी जाती हैं वह अप्राकृतिक हैं। लेकिन भीड़ की भावना का क्या किया जाये? दरअसल, जरूरत इस बात की है कि धर्म और राजनीति के बीच एक विभाजन रेखा खींची जानी चाहिए। खद्दरधारी नेता तो यह काम करने वाले नहीं हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को ही इसमें पहल करनी होगी, उन धाराओं को निरस्त करके जो फिल्मों, डाॅक्यूमेंट्री, पुस्तकों आदि पर प्रतिबंध लगाने और मुखर अवाजों को धमकाने का औजार बन गयी हैं। कानूनी धाराओं को रद्द करने के बावजूद कट्टरपंथियों की धमकियाँ जो अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता को दबाती हैं, तो फिर भी बची रहेंगी, लेकिन 295ए को रद्द करने से कम से कम कोई पुलिस पर दबाव डालकर किकू शारदा जैसे काॅमेडियनों को गिरफ्तार तो नहीं करा सकेगा।

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गणतंत्र दिवस 2019 / 26 जनवरी / गणतंत्र दिवस पर निबंध' हिंदी में

शुरूआत के लिए इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर अगर इतना ही हो जाए तो कोई बुरी बात नहीं है। 26 जनवरी 1950 को हमें संविधान और सवैधानिक प्रवाधान के तहत यह अधिकार दिया गया कि हम आजादी के साथ जी सकें, बराबरी के साथ जी सकें, अपने अधिकारों का स्वेच्छा से इस्तेमाल कर सकें। बिना इसके आजादी या अधिकार का कोई अर्थ ही नहीं है। एक मृत व्यक्ति की न जिम्मेदारियंा होती हैं, न कोई अधिकार। एक मृत व्यक्ति कोई कहानियंा भी नहीं सुनाता है और अगर किसी जीवित व्यक्ति से कहानी सुनाने, अपने मन व दिल की बात कहने का अध्ािकार ही छीन लिया जाये तो वह जिंदा कहंा रहता है? इसलिए इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह प्रण होना चाहिए कि हम अपने और अपने साथी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होने देंगे, उनकी सुरक्षा के लिए दृढ़ सकंल्प करेंगे। जाहिर है इसके लिए पहली कसौटी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।

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