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हैप्पी न्यू ईयर 2019: इस तरह से लोग मना रहे नए साल का जश्न, आप भी करें ट्राई

साल 2018 रफ्ता-रफ्ता अपने अंतिम सोपान पर पहुंच गया है। पूरी दुनिया में इसे अलविदा कहने और नए साल के स्वागत के लिए जोर-शोर से जश्न की तैयारियां हो रही हैं। पिछले दो दशकों में पूरी दुनिया के स्तर पर जो सांस्कृतिक बदलाव आया है, उसमें ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को लगभग पूरी दुनिया में लागू कर दिया है। लोग अपने-अपने अंदाज में न्यू ईयर मनाते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं कि कैसे लोग अपने नए साल को सेलिब्रेट करते हैं।

हैप्पी न्यू ईयर 2019: इस तरह से लोग मना रहे नए साल का जश्न, आप भी करें ट्राई
साल 2018 रफ्ता-रफ्ता अपने अंतिम सोपान पर पहुंच गया है। पूरी दुनिया में इसे अलविदा कहने और नए साल के स्वागत के लिए जोर-शोर से जश्न की तैयारियां हो रही हैं। पिछले दो दशकों में पूरी दुनिया के स्तर पर जो सांस्कृतिक बदलाव आया है, उसमें ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को लगभग पूरी दुनिया में लागू कर दिया है।
इसलिए अब उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिण ध्रुव तक नए साल का मतलब है 31 दिसंबर की रात 12 बजे के बाद शुरू होने वाला साल। जबकि अभी ढाई-तीन दशकों पहले तक दुनिया के तमाम देशों के अपने-अपने नए साल मनाए जाते थे। यूरोप, अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में चाहे फिर भी ग्रेग्रेरियन कैलेंडर यानी 31 दिसंबर से खत्म होने वाले साल को मान्यता मिल गई थी।
लेकिन एशियाई देशों में अभी हाल तक अपने-अपने साल मनाए जाते रहे हैं। लेकिन अब दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही अपने साल बचे हैं। निःसंदेह उनमें ज्यादातर एशिया के देश ही हैं। खासतौर पर चीन, जापान, कोरिया जैसे देशों में अभी भी अपने मूल सालों की शुरुआत पर जश्न मनाने की परंपरा है, नहीं तो लगभग पूरी दुनिया में एक जनवरी से ही नया साल शुरू होने लगा है।

बढ़ती है सेलिब्रेशन ट्रैवलिंग

पहले सरकारें भी इस तरह के जश्नों को लेकर संकोच में रहती थीं और न सिर्फ उनको प्रोत्साहित करने से बचती थीं बल्कि उनके साथ अपने किसी तरह की हिस्सेदारी भी दिखाने से वो बचा करती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब नए साल के जश्न को भरपूर ढंग से इंद्रधनुषी बनाने के लिए बहुत कुछ सुविधाएं सरकार द्वारा भी मुहैया कराई जाती हैं।
मसलन नए साल के दौरान बड़े पैमाने पर लोग देश के अंदर एक जगह से दूसरी जगह विशेषकर पर्यटन स्थलों की तरफ जाते हैं इसलिए पिछले कुछ सालों से लगातार भारतीय रेल नए साल के मौके पर रेलगाड़ियों के कई सौ अतिरिक्त फेरे लगाने की व्यवस्था करता है।
इस साल भी देश के हर कोने में रेलवे ने लोगों के आने जाने के लिए जो अतिरिक्त सुविधाएं मुहैया कराई हैं, उसके कारण आगामी 5 जनवरी 2019 तक 300 से ज्यादा रेलगाड़ियां चलेंगी।

हिल स्टेशंस पर जुटते हैं सैलानी

नए साल का जश्न अब सिर्फ व्यक्तिगत खुशी का सफर ही नहीं है बल्कि अच्छे-खासे कारोबार का जरिया भी है। आंकड़े बताते हैं कि साल भर में पहाड़ी इलाकों में जितने लोग सैर-सपाटे के लिए जाते हैं, उनमें 30 फीसदी से ज्यादा साल के अंत में नए साल का जश्न मनाने के लिए जाते हैं।

अगर इंटरनेट के मौजूद आंकड़ों को सही मानें तो 2019 के जश्न की तैयारियां करीब-करीब पूरी हो चुकी हैं। जिनका मतलब यह है कि 95 फीसदी से ज्यादा पर्यटन क्षेत्रों में मौजूद होटलों और दूसरी रिहाइश की जगहें फुल हो चुकी हैं।

96 फीसदी से ज्यादा फ्लाइट्स बुक हो चुकी हैं और सेलिब्रिटीज की बात करें तो करीब करीब 100 फीसदी सेलिब्रिटीज अलग-अलग जगहों में जाकर परफॉर्म करने के लिए बुक हो चुके हैं।

धार्मिक स्थलों पर उमड़ते हैं लोग

गोवा, पचमढ़ी, आईजोल और उत्तराखंड के कई पर्यटन क्षेत्र नए साल में सबसे ज्यादा डिमांड में रहते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ हिल स्टेशन, समुद्र तट, और बड़े महानगर ही इन दिनों डिमांड में हों। आंकड़े बताते हैं कि धार्मिक स्थल भी नए साल के जश्न का बहुत तेजी से हिस्सा बन रहे हैं।
अमृतसर स्थित गोल्डन टैंपल में साल के आखिरी दिन और नए साल के पहले दिन करीब 5 लाख लोग पहुंचते हैं। इसी तरह पुरी, मथुरा, वैष्णो देवी और पूर्व में पुरी और कोलकाता के काली मंदिर में भी बहुत बड़े पैमाने पर लोग नए साल में पहुंचते हैं ताकि साल की अच्छी शुरुआत हो सके।
दक्षिण भारत में यह परंपरा उत्तर भारत से भी ज्यादा लोकप्रिय है। माना जाता है कि सबसे ज्यादा दक्षिण भारत के लोग ही नए साल की शुरुआत, भगवान के दर्शन से करते हैं। तिरुपति बालाजी मंदिर इसमें सबसे प्रमुख है और मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर में बहुत ज्यादा भीड़ नए साल में होती है।

अलग-अलग अंदाज

यूं तो अब नए साल का जश्न करीब-करीब पूरी दुनिया में एक जैसा मनाया जाने लगा है। अधिकतर लोग जाते हुए साल की रात खूब खाते-पीते हैं और नाचते-गाते, हुड़दंग मचाते नए साल की शुरुआत करते हैं। लेकिन भारत और तमाम एशियाई देशों में इस परंपरा को भी अपने ढंग से कस्टमाइज कर लिया गया है और इसमें तमाम नई चीजें जुड़ गई हैं।
जैसे नए साल पर शिरडी के साईं बाबा की यात्रा करने वाले लोग, कुछ न कुछ सोने की वस्तु खरीदने की कोशिश करते हैं। यह भी माना जाता है कि नए साल में देश के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों में सबसे ज्यादा सोने का चढ़ावा चढ़ता है।
बहरहाल, अगर पर्यटकों की नजर से देखें तो नए साल के मौके पर 56 लाख से ज्यादा भारतीय या तो कहीं दूसरी जगह जाकर या अपने शहर में रहते हुए भी वर्षांत के जश्न का हिस्सा बनते हैं, इस लिहाज से देखा जाए तो यह सबसे बड़े जश्न के रूप में उभर रहा है।

सब करते हैं एंज्वॉय

अपने देश भारत में तो पिछले दो दशकों में जबरदस्त बदलाव आया है। 80 और 90 के दशक में नव वर्ष की पूर्व संध्या पर कुछ महानगरों में नए साल का विरोध करने वाले कुछ समूह सक्रिय हो जाते थे। लेकिन अब कहीं भी ऐसे प्रदर्शनों का कोई वजूद नहीं बचा, बचना भी नहीं चाहिए आखिरकार दिन-रात के तनाव से गुजरने वाले आज के दौर के लोगों की दिनचर्या में खुशी के लम्हे कभी-कभार ही आते हैं। लब्बोलुआब यह कि भारत में भी पिछले एक दशक में नए साल के जश्न की गहमा-गहमी बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ी है।

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