Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

हैप्पी न्यू ईयर 2019: कम बजट में ज्यादा मजा दे गईं ये फिल्में

वर्षांत आते ही अलग-अलग क्षेत्रों की तरह ही सिल्वर स्क्रीन (Silver Screen) पर क्या कुछ पूरे वर्ष में खास हुआ, इसका आकलन करने में फिल्म क्रिटिक और ट्रेड एनालिस्ट जुट जाते हैं। लेकिन आमतौर पर इस आकलन का कांटा बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर ही आकर टिक जाता है। इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं। फिल्म का निर्माण, लाखों- करोड़ की इंडस्ट्री (Bollywood) में एक प्रोडक्ट की तरह ही किया जाता है। जाहिर है ऐसे में उसी प्रोडक्ट की ज्यादा चर्चा होगी, जिसने ज्यादा मुनाफा दिलाया।

हैप्पी न्यू ईयर 2019: कम बजट में ज्यादा मजा दे गईं ये फिल्में
X
वर्षांत आते ही अलग-अलग क्षेत्रों की तरह ही सिल्वर स्क्रीन (Silver Screen) पर क्या कुछ पूरे वर्ष में खास हुआ, इसका आकलन करने में फिल्म क्रिटिक और ट्रेड एनालिस्ट जुट जाते हैं। लेकिन आमतौर पर इस आकलन का कांटा बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर ही आकर टिक जाता है। इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं। फिल्म का निर्माण, लाखों- करोड़ की इंडस्ट्री (Bollywood) में एक प्रोडक्ट की तरह ही किया जाता है। जाहिर है ऐसे में उसी प्रोडक्ट की ज्यादा चर्चा होगी, जिसने ज्यादा मुनाफा दिलाया। लेकिन सवाल है, क्या सिनेमा (Cinema) को केवल ‘इंडस्ट्री प्रोडक्ट’ मान लेना या उसकी सफलता को केवल उसके द्वारा की गई कमाई के आधार पर तय करना, सही नजरिया है? हमें याद रखना होगा कि इंडस्ट्री प्रोडक्ट से पहले कला का ऐसा सशक्त माध्यम भी है, जो समाज की सचाइयों को न केवल पर्दे पर उतारता है, साथ ही उसको मनोरंजन के साथ संदेश भी देता है। ऐसे में जरूरी है कि साल भर की फिल्मों का आकलन करते समय इस बात पर भी गौर किया जाए कि कौन सी ऐसी फिल्में आईं, जिनके कंटेंट ने कला के स्तर पर सिनेमा में कुछ नया जोड़ा, उसे एक नया आयाम दिया? कौन-सी फिल्में ऐसी आईं, जिसमें समाज की किसी कड़वी सच्चाई को उजागर किया गया या जिसने इंसानी संवेदनाओं के किसी अनछुए या मार्मिक पहलू को उजागर किया?

आर्ट पर हावी रहा एंटरटेनमेंट

बात अगर वर्ष 2018 में रिलीज हुई हिंदी फिल्मों की करें तो पहले नजर टिकती है साल की ब्लॉक बस्टर साबित हुई फिल्मों के कंटेंट पर। बिजनेस के लेवल पर इस साल की सफल फिल्मों में सबसे पहले जिन फिल्मों का नाम आता है, उनमें शामिल हैं- ‘संजू, पद्मावत, रेस-3, ठग्स ऑफ हिंदोस्तान, 2.0’ और ‘बागी-2’।
कला के लिहाज से यह पक्ष दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाना चाहिए कि सिनेप्रेमियों की प्राथमिकता में मनोरंजन ही सर्वोपरि बना हुआ है, भले ही उस मनोरंजन का वास्तविक जीवन और दुनिया से कोई नाता हो या न हो। हालांकि ‘संजू’ (Sanju) और ‘पद्मावत’ (Padmavat) का कंटेंट वास्तविक जीवन और इतिहास से प्रेरित रहा, इसलिए इन्हें वास्तविकता से पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता।
लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि इन्हें देखकर साबित हो गया कि इनके फिल्मकारों के लिए रियालिटी और आर्टिस्टिक वैल्यू से ज्यादा एंटरटेनमेंट मैटीरियल ही इंपॉर्टेंट रहा। इसके चलते इनकी भव्यता, कलाकारों की एक्टिंग-डांस, कैमरे की तकनीक के नीचे सिनेमाई एलीमेंट कहीं दब कर रह गया।

सिंसियर ऑडियंस की पसंद

इन ब्लॉक बस्टर्स से कुछ कम कमाई करने वाली लेकिन अपने भीतर सार्थकता को संजोने वाली कुछ फिल्मों ने इस वर्ष जरूर सिनेमा में कला तत्व खोजने वाले दर्शकों को थोड़ा सुकून दिया। इस लिहाज से ‘हिचकी’, ‘बधाई हो’ और ‘राजी’ ने जिस तरह से कला और व्यवसाय के बीच संतुलन स्थापित किया। उससे यह भी साबित होता है कि दर्शकों के एक वर्ग को अच्छे-खराब की परख है, वे मनोरंजन के साथ कुछ सार्थक देखने की चाहत रखते हैं। फिल्म ‘हिचकी’ में एक साथ दो बिंदुओं को प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारा गया।

अपनी शारीरिक असामान्यता को मात देते हुए कैसे एक टीचर अपने जुनून और प्रतिभा के बल पर नक्कारे समझे जा चुके छात्रों को शानदार सफलता दिलवाती है। इस चरित्र को रानी मुखर्जी ने सहज तरीके से निभाया। यह फिल्म हमारी शिक्षा प्रणाली में मौजूद विसंगतियों को उजागर करने के साथ तथाकथित शिक्षित समाज की असंवेदनशीलता और दोगली छवि को भी सामने लाती है। यानी, इस फिल्म में कहने के लिए बहुत कुछ ऐसा था, जिसने सभ्य समाज को एक बार सोचने पर विवश जरूर किया।

‘बधाई हो’ फिल्म में हालांकि एंटरटेनमेंट की पैकेजिंग काफी टाइट थी लेकिन उस पैकेजिंग में भी पारिवारिक जीवन और आपसी संबंधों की असहजता को सहज ढंग से दिखाया गया। इसे हम अपने आस-पास के किसी परिवार से आसानी से जोड़ सकते हैं। भले ही इसमें कोई बड़ा संदेश नहीं दिया गया, केवल रोजमर्रा के जीवन में सामने आने वाली अनपेक्षित स्थिति को ही पर्दे पर उतारा गया लेकिन इसमें एक सरलता दिखी। यही नहीं इसमें पिछली पीढ़ी और आज की पीढ़ी की सोच, जीवनशैली का द्वंद्व और महानगरीय जीवन जीने वाले आम इंसान की तमाम दबावों को सहती मानसिकता का भी बारीक विश्लेषण किया गया।

अब बात ‘राजी’ की। यह फिल्म सत्य घटना पर आधारित है। यही बात इसकी यूएसपी इसलिए साबित हुई, क्योंकि फिल्म की लीड कैरेक्टर सेहमत युवा है, जो आसानी से आज की जेनरेशन से जुड़ सकती है। भले ही इसकी कहानी कई दशक पुरानी हो चुकी है लेकिन हाई पेइंग करियर की चाहत और ग्लैमर की चकाचौंध में खोती जा रही यंग जेनरेशन को यह फिल्म याद दिलाती है कि उनका कुछ दायित्व अपने देश, अपनी जन्मभूमि के लिए भी होता है और जिसे निभाने के लिए जान की बाजी लगाने का जज्बा उनमें बरकरार रहना चाहिए। हालांकि मेघना गुलजार के निर्देशन और आलिया भट्ट के अभिनय ने इस फिल्म को प्रभावी बनाया लेकिन वास्तव में इस फिल्म का कंटेंट ही इसका रियल हीरो साबित हुआ।

दर्शकों को भाया जिनका कंटेंट

इस वर्ष कुछ ऐसी फिल्में भी दर्शकों ने पसंद कीं, जो कंटेंट के स्तर पर बिल्कुल नई थीं, साथ ही इन्होंने अपने निर्माता को अच्छा मुनाफा भी कमा कर दिया। इस वर्ग में ‘पैडमैन’, ‘सुई धागा’, ‘वीरे दी वेडिंग’, ‘परमाणु’, ‘रेड’ और ‘102 नॉट आउट’ का नाम लिया जा सकता है। ‘पैडमैन’, ‘रेड’ और ‘परमाणु’ रियल स्टोरी पर बेस्ड थीं। इनमें ‘पैडमैन’ फिल्म ने अपने कंटेंट और उसमें मौजूद संदेश के चलते खासतौर पर हर वर्ग का ध्यान आकृष्ट किया।
महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े एक संवेदनशील मुद्दे को लेकर वर्षों पहले एक जुनूनी पुरुष अरुणाचलम मुरुगानंथम ने जो क्रांतिकारी प्रयास किया था, उसकी कहानी फिल्मी पर्दे के जरिए दर्शकों तक पहुंचाकर वास्तव में आर. बाल्की ने एक सराहनीय कार्य किया। कहने की जरूरत नहीं कि बाल्की जैसे संजीदा फिल्मकारों के ऐसे प्रयास से न केवल समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव आता है, साथ ही ऐसी फिल्में हमारी असंवेदनशीलता को झकझोरती भी हैं।
हालांकि कंटेंट के स्तर पर फिल्म ‘सुई धागा’ भी प्रयोगधर्मी फिल्म रही लेकिन कहानी के अनुरूप कलाकारों का चयन न किए जाने और नाटकीयता का अनुपात वास्तविकता पर हावी होने के कारण इस फिल्म ने अच्छी कलेक्शन तो की लेकिन वास्तविक सिनेप्रेमियों के मन पर अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में असफल रही। गुजराती नाटक पर आधारित उमेश शुक्ला के निर्देशन में बनी ‘102 नॉट आउट’ में अमिताभ और ऋषि कपूर जैसे दो बड़े और प्रतिभाशाली कलाकार थे।
हास्य भरे मनोरंजन के साथ यह फिल्म सरलता से यह संदेश देने में सफल होती है कि जीवन को उसके अंतिम क्षण तक जिंदादिली के साथ जीना चाहिए। हालांकि यह कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे इसके पहले फिल्मों में दिखाया नहीं गया लेकिन आज के तनावपूर्ण जीवनशैली के दौर में ऐसी फिल्में हमें आत्मविश्लेषण का मौका तो देती ही हैं।
‘परमाणु’ को इसलिए खास माना जा सकता है कि इसमें भारत के परमाणुशक्ति संपन्न होने को दुनिया के सामने दोबारा सिद्ध करने की दास्तान को प्रामाणिक ढंग से दिखाया गया। फिल्मों में पेट्रियॉटिज्म को अब नए-नए तरीके से पेश करने का जो चलन इधर बढ़ा है, उसे यह फिल्म एक कदम आगे ले जाती है।

इनके कंटेंट ने किया इंप्रेस

अब बात कुछ ऐसी फिल्मों की, जिन्होंने बहुत अच्छा बिजनेस नहीं किया, न ब्लॉक बस्टर साबित हुईं। उनमें से कुछ तो फ्लॉप भी रहीं और कुछ के तो रिलीज होने और सिनेमा हॉल से बाहर होने का तक पता नहीं चला तो फिर उनके लाइमलाइट में आने का सवाल ही नहीं था।

लेकिन इसमें शक नहीं कि कॉमर्शियली कमजोर होने के बावजूद इनके भीतर के सिनेमाई कंटेंट ने इनके होने को सार्थकता प्रदान की। इस वर्ग में सबसे पहले याद आती है अनुभव सिन्हा के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘मुल्क’। इसमें शक नहीं कि आज देश ही नहीं पूरी दुनिया में आतंकवाद एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है।

लेकिन इस समस्या से जुड़े कई पहलुओं पर अकसर हमारा ध्यान नहीं जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आतंक का संबंध एक वर्ग विशेष से जोड़कर ज्यादा देखा जाता है। इसके चलते कई बार निर्दोष और मासूम लोगों को भी इस का खामियाजा भुगतना पड़ता है।

‘मुल्क’ में इसी मानवीय गरिमा के चुटहिल होने और बगैर किसी अपराध के भी सामाजिक उपेक्षा झेलने वाले परिवार की पीड़ा को बखूबी पर्दे पर उतारा गया। आतंकवाद मानवता का दुश्मन है, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन इससे सीधे तौर पर न जुड़े लोगों या आतंकी के परिवार के साथ दुर्व्यवहार क्या अमानवीयता नहीं कहलाएगी?

इस ज्वलंत सवाल को ऋषि कपूर और तापसी पन्नू के किरदारों ने सशक्त ढंग से दर्शकों के सामने रखा। एक आतंकी की मानसिकता और किसी एजुकेटेड युवा के आतंकी बनने की प्रोसेस को फिल्म ‘ओमार्टा’ में दिखाने का प्रयास किया गया। इसमें राजकुमार राव जैसे मंझे हुए कलाकार और हंसल मेहता जैसे टैलेंटेड डायरेक्टर एक साथ रहे।

हालांकि फिल्म के कुछ सीन और डायलॉग्स ने टेरर मेंटेलिटी को उजागर करने का प्रयास किया लेकिन फिर भी यह फिल्म कहीं न कहीं आतंकियों के लिए सॉफ्ट कॉर्नर बनाने का प्रयास करती दिखी, जो एंटरटेनमेंट के नजरिए से तो स्वीकार किया जा सकता है लेकिन कला की निगाह से नहीं क्योंकि कला का पहला मकसद बेहतर और खूबसूरत दुनिया बनाने में सहयोग करना होता है।

उसके जरिए अगर समाज की कोई विसंगति को दिखाया भी जाता है तो उसके पीछे उद्देश्य उस बुराई को मिटाना ही होता है। उस बुराई या कमी का महिमामंडन पूरी तरह अनुचित है। नंदिता दास का डायरेक्शन, नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसा कलाकार और कालजयी कथाकार सआदत हसन मंटो का किरदार।

ऐसे बेहतरीन संयोग से बनी ‘मंटो’ से शानदार फिल्म की अपेक्षा की गई थी। नवाज के अभिनय और नंदिता के डायरेक्शन में तो कोई कमी नहीं रही लेकिन इस फिल्म का कंटेंट और बेहतर हो सकता था। यह एक ऐसी क्लासिक मूवी बन सकती थी, जो हिंदी सिनेमा की धरोहर बनती लेकिन इसकी कहानी स्वत: प्रवाहित नहीं हो पाई।

इसमें बहुत कुछ समेटने की जल्दबाजी सी नजर आई। मंटो ने अपने जीवन में जिन तकलीफों को झेला, जिस मानसिक द्वंद्व के साथ वह जिए, उसे पर्दे पर उतारने की कोशिश तो बहुत की गई लेकिन स्क्रिप्ट की कमजोरी हर बार आड़े आई। प्रख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कई वर्ष पहले ही ‘मोहल्ला अस्सी’ बनाई थी, जो कुछ समय पहले ही रिलीज हो पाई। फिल्म का कंटेंट तो बहुत अच्छा और समकालीन समाज-राजनीति को कठघरे में खड़ा करता है।

लेकिन उसके फिल्मी रूपांतरण ने कई जगह बनारस की वास्तविक छवि को प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत नहीं किया। हालांकि इस फिल्म ने यह साबित किया कि आज भी कुछ प्रतिबद्ध फिल्मकार साहित्य को सिनेमा के पर्दे पर लाने का साहस करते हैं, जो निस्संदेह सराहनीय है।

इनके कंटेंट ने भी मन को छुआ

इस वर्ष रिलीज हुई ‘पिहू, बायोस्कोपवाला, पटाखा’ और ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ फिल्मों ने भी अपने अलग तरह के कंटेंट की वजह से सिनेमा को समाज की धड़कन और इंसानी संवेदना से जोड़ने का प्रयास किया। ‘पिहू’ में एक बच्ची के अपार्टमेंट में अकेले बंद हो जाने पर उसकी मानसिकता और गतिविधि को संजीदगी से कैमरे में कैद किया।
महानगरीय जीवनशैली की तस्वीर यह फिल्म हमें दिखाती है तो दो बहनों के आपसी प्रेम और तकरार की महीन बुनावट को विशाल भारद्वाज ने फिल्म ‘पटाखा’ में दिखाया। हालांकि यह एक मनोरंजन से भरपूर फिल्म है लेकिन कंटेंट के स्तर पर यह एकदम नई फिल्म है।
इसकी वजह यह रही कि यह फिल्म एक युवा हिंदी कथाकार चरणसिंह पथिक की कहानी पर आधारित है। विशाल पहले भी साहित्य को सिनेमाई भाषा में बयां करने का जोखिम उठाते रहे हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी ‘काबुलीवाला’ से प्रेरित देब मेधेकर के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘बायोस्कोपवाला’ में इंसानी रिश्तों के जुड़ाव को नए संदर्भों में खूबसूरती से दिखाया गया।
आज के प्योर कॉमर्शियल दौर में ऐसी फिल्मों का आना सुकून देता है लेकिन उन्हें पर्याप्त दर्शक न मिलना निराश भी करता है। ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ फिल्म में एक जरूरी विषय को उठाया गया। सरकारी-प्रशासनिक लापरवाही से आम आदमी को किस तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ता है, इसे फिल्म में दिखाया गया।
हालांकि इस फिल्म की स्क्रिप्ट को और भी सशक्त बनाया जा सकता था। इन फिल्मों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कम ही सही लेकिन अभी भी हिंदी सिनेमा ने कला से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई है। कुछ फिल्मकार सिनेमा के इस महत्वपूर्ण दायित्व को निभाने के लिए भरसक प्रयास करते रहते हैं, भले ही उन्हें कॉमर्शियली नुकसान उठाना पड़े। यह शुभ संकेत माना जा सकता है।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top