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गुजरात चुनाव परिणाम 2017: राहुल गांधी के 132 साल पुरानी कमान संभालने के पीछे ये था राज

गुजरात चुनाव परिणाम 2017 से पहले नेहरू गांधी परिवार के सैंतालीस वर्षीय राहुल गांधी ने एक सौ बत्तीस साल पुरानी कांग्रेस की कमान संभाल ली है तो यह किसी के लिए आश्चर्य का विषय नहीं है।

गुजरात चुनाव परिणाम 2017: राहुल गांधी के 132 साल पुरानी कमान संभालने के पीछे ये था राज

नेहरू गांधी परिवार के सैंतालीस वर्षीय राहुल गांधी ने एक सौ बत्तीस साल पुरानी कांग्रेस की कमान संभाल ली है तो यह किसी के लिए आश्चर्य का विषय नहीं है। वे इस परिवार से छठे सदस्य हैं, जो कांग्रेस के प्रमुख बने हैं। उनसे पहले उनके परनाना मोतीलाल नेहरू, नाना जवाहरलाल नेहरू, दादी इंदिरा गांधी, पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी अध्यक्ष रह चुके हैं।

बेशक कांग्रेस की अगुआई में स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया, परंतु आजादी के उपरांत गांधी जी चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए,परंतु ऐसा हो नहीं सका। इसके भी कुछ कारण थे। बतौर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की कमान संभाली। उनके बाद कुछ समय तक लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, जो इस परिवार से बाहर के थे, परंतु उनके आकस्मिक निधन के बाद नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बन गई।

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तब कांग्रेस में पहली बार विरोध के स्वर उठे। पार्टी दो फाड़ भी हुई, परंतु 1971 की जंग और पाकिस्तान के विभाजन के फलस्वरूप बने बांग्लादेश की घटना ने कांग्रेस की उस अंदरूनी कलह को दबा दिया। इंदिरा गांधी की काम-काज की शैली कैसी थी, इसका पता आपातकाल थोपे जाने और नागरिक अधिकारों को लंबित कर बड़े पैमाने पर लोगों की गिरफ्तारी और नसबंदी कराए जाने के अभियानों से लग जाता है।

1977 में वह बुरी तरह हारी, परंतु उनके विकल्प के तौर पर केंद्र की सत्ता में जो लोग आए, उनकी आपसी सिर फुटौव्वल ने 1980 में इंदिरा की वापसी सुनिश्चित कर दी। स्वर्ण मंदिर में आपरेशन ब्लू स्टार के बाद 1984 में किन हालात में उनकी हत्या हुई, यह अलग विषय है, परंतु इसके बाद हुए आम चुनाव में उनके पुत्र राजीव गांधी को सहानुभूति के चलते बहुत बड़ा जनादेश मिला, जिसे वह संभाल नहीं सके।

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बोफोर्स घोटाला, पंजाब-असम समझौतों की विफलता और श्रीलंका में शांति सेना भेजे जाने को लेकर वह विवादों में घिरे। कांग्रेस में एक बार फिर विद्रोह हुआ। वीपी सिंह के नेतृत्व में कई नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी। जनता दल बना और 1989 में राजीव गांधी की भी करारी शिकस्त हुई। 1991 में फिर मध्यावधि चुनाव की नौबत आई, लेकिन राजीव गांधी तमिलनाडु के श्रीपेरूम्बदूर में तमिल आतंकवादियों के आत्मघाती हमले का शिकार हो गए।

उनके बाद पीपी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने, जो नेहरू गांधी परिवार से बाहर के थे। बीच में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही, परंतु 2004 में फिर दूसरों के समर्थन से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की वापसी हुई, जो दूसरे कार्यकाल मिलने के कारण 2014 तक रहे। नरेंद्र मोदी की अगुआई में जब 2014 में चुनाव हुए तो कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा को 283 सीटें हासिल हुई।

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श्री मोदी ने देश की कमान संभाली और उसके बाद जितने भी राज्यों में चुनाव हुए, पंजाब जैसे अपवाद छोड़ दें तो हर जगह कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी अथवा हार का सामना करना पड़ा। सोनिया गांधी 1998 से लगातार कांग्रेस की अध्यक्ष बनी हुई थी, परंतु उनकी सरपरस्ती में पार्टी को एक बार भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ। राहुल गांधी 2007 में महासचिव बना दिए गए थे।

2013 में उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया था और पिछले तीन-चार साल से कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान एक तरह से वही संभाले हुए हैं। इस बीच कांग्रेस करीब पच्चीस छोटे-बड़े चुनाव हारी है। इसके बावजूद राहुल गांधी को ही कांग्रेस की कमान सौंपी गई है तो इसकी एक-मात्र वजह उनका नेहरू-गांधी खानदान से होना ही है।

वह ऐसे समय पार्टी प्रमुख बनाए गए हैं, जब नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर है और कांग्रेस एक-एक कर राज्यों से भी सिमटती जा रही है। जाहिर है, उनके सामने फिर से लोगों का भरोसा हासिल करने की बहुत बड़ी चुनौती है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाते हैं तो 132 साल पुरानी यह ऐतिहासिक पार्टी अपनी प्रासंगिकता खो देगी।

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