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Goa Liberation Day: गोवा को जब भारत ने पुर्तगाल से आजाद कराया था

आज गोवा लिबरेशन डे है। आज ही के दिन 1961 में भारत ने समु्द्र के किनारे बसे सुंदर राज्य गोवा (Goa) को अपने अधीन कर लिया था। लेकिन अब यहां सोचने वाली बात यह है कि हमारा देश तो 1947 में अंग्रेजों के शासन से आजाद हो गया था। लेकिन गोवा 1961 में भारत का हिस्सा कैसे बना तो हम आपको बता रहे हैं गोवा आज भारत के नक्शे में कैसे आया।

Goa Liberation Day: गोवा को जब भारत ने पुर्तगाल से आजाद कराया था
आज गोवा लिबरेशन डे है। आज ही के दिन 1961 में भारत ने समु्द्र के किनारे बसे सुंदर राज्य गोवा (Goa) को अपने अधीन कर लिया था। लेकिन अब यहां सोचने वाली बात यह है कि हमारा देश तो 1947 में अंग्रेजों के शासन से आजाद हो गया था। लेकिन गोवा 1961 में भारत का हिस्सा कैसे बना तो हम आपको बता रहे हैं गोवा आज भारत के नक्शे में कैसे आया।
आजादी के बाद सरदार पटेल ने सभी रियासतों को जोड़ कर राज्य का रूप दिया। उन्होंने चाहा कि गोवा भी भारत में मिल जाए। लेकिन गोवा भारत में नहीं मिला। वो इसलिए क्योंकि 1510 से गोवा और दमन एवं दीव में पुर्तागालियों का औपनिवेशिक शासन था।
जिसके बाद भारत ने ऑपरेशन विजय के तहत सैन्य ऑपरेशन को अंजाम दिया। जिसके 36 घंटे के भीतर ही गोवा भारत का हिस्सा बन गया। इसी वजह से हर साल 19 दिसंबर को गोवा मुक्ति दिवस मनाया जाता है। 30 मई 1987 को गोवा को अलग राज्य का दर्जा मिल गया। जबकि दमन एव दीव को केंद्रशासित क्षेत्र बनाया गया।

पुर्तगालियों का गोवा

पुर्तगालियों ने सन् 1510 में बीजापुर के सुल्तान युसूफ आदिल शाह को हराकर वेल्हा गोवा यानी कि पुराना गोवा पर कब्जा कर लिया और अपनी स्थाई कॉलोनी बना ली। 1843 में उन्होंने पणजी को राजधानी घोषित किया। पुर्तगालियों की नीतियां अंग्रेजों से ज्यादा उदार थीं।
गोवा के कुलीन तंत्र को पुर्तगाल से कुछ विशेष अधिकार मिले हुए थे। उनमें से एक अधिकार 19वीं सदी की शुरुआत में मिला। जिसके तहत गोवा में संपत्ति कर देने वाले लोग पुर्तगाली संसद में गोवा का प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान कर सकते हैं।

गोवा मुक्ति आंदोलन

1910 में पुर्तगाल में राजशाही खत्म हो गई। जिसके कारण पुर्तगाल की सभी औपनिवेशिक कॉलोनियों को लगा कि उनको स्व-शासन का अधिकार मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहीं से गोवा की में आजादी की मशाल जली। 1920 में डॉ त्रिस्ताव ब्रंगेजा कुन्हा के नेतृत्व में गोवा आजादी मांगने लगा। इसी लिए उन्हें गोवा राष्ट्रवाद का जनक भी कहा जाता है।

1946 में समाजवाद के प्रणेता डॉ राम मनोहर लोहिया गोवा गए। वहां पर गोवा की आजादी को लेकर चर्चा हुई। लोहिया ने वहां पर सविनय अवज्ञा आंदोलन किया। गोवा 435 सालों में पहली बार आजादी के लिए आवाज उठा रहा था।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि गोवा में पुर्तगाल की सरकार ने हर तरह की जनसभा पर पाबंदी लगा रखी थी। बाद में लोहिया को गोवा से बाहर निकाल दिया गया। 27 फरवरी 1950 को भारत सरकार ने पुर्तगाल से भारत में मौजूद कॉलोनियों के संबंध में बातचीत करने को कहा।
लेकिन पुर्तगाल ने इसके लिए साफ इंकार कर दिया। पुर्तगाल का कहना था कि गोवा उसकी कॉलोनी नहीं है बल्कि महानगरीय पुर्तगाल का हिस्सा है। इसलिए इसे भारत को नहीं दिया जा सकता। इसके चलते भारत के पुर्तगाल के साथ कूटनीतिक संबंध खराब हो गए।
1954 में गोवा से भारत के विभिन्न हिस्सों में जाने के लिए वीजा लगने लगा। इसी बीच गोवा में पुर्तगाल के खिलाफ आंदोलन तेज हो गया। 1954 में दादर और नागर हवेली के कई ऐंक्‍लेव्‍स पर भारतीयों ने अपना कब्जा स्थापित कर लिया।
त्तकालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि पुर्तगाल की गोवा में मौजूदगी को सरकार बर्दाश्‍त नहीं कर सकती है। लेकिन पुर्तगाल की सरकार अपनी बात पर अड़ी रही। 18 दिसंबर 1961 को भारत ने गोवा, दमन और दीव में अपनी सेना भेज दी।
36 घंटे के भीतर ही सेना, थल सेना, वायु सेना के हमले से पुर्तगाल की सरकार परेशान हो गई। जिसके बाद पुर्तगाल के गवर्नर जनरल वसालो इ सिल्‍वा ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया जिसके बाद गोवा 451 साल की गुलामी से आजाद हो गया।
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