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106 साल पुराने कावेरी जल विवाद से जुड़ा है कर्नाटक और तमिलनाडु

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कर्नाटक में बढ़ा विवाद बुलाया बंद

106 साल पुराने कावेरी जल विवाद से जुड़ा है कर्नाटक और तमिलनाडु
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नई दिल्ली. कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक तमिलनाडु के लिये कावेरी नदी का पानी छोड़े जाने के बाद से ही कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जंग और तेज हो गई है। कावेरी जल विवाद को लेकर आज कर्नाटक को बंद किया गया है। बंद सुरक्षा के मद्देनजर बेंगलुरू में 16 हजार से ज्यादा पुलिस के जवानों तैनात किया गया है और बंद का असर पूरे कर्नाटक पर देखा जा रहा है।
बता दें कि कोर्ट ने सोमवार को कर्नाटक को निर्देश दिया था कि तमिलनाडु के किसानों की दिक्कतें दूर करने के लिए वह अगले 10 दिन अपने पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को 15000 क्यूसेक पानी रोजाना छोड़े। कावेरी जल विवाद अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है। यह विवाद 1910 से शुरू होता है जब दोनों राज्यों ने कावेरी पर बांध बनाने की योजना बनाई।
इसके पहले 1892 में ब्रिटिश राज की मध्यस्थता में मैसूर राज्य और चेन्नई प्रेसीडेन्सी पानी के बंटवारे को लेकर सहमत हो गए थे। लेकिन 1924 में अंग्रेजों की मध्यस्थता में फिर समझौता हुआ। यह समझौता दोनों राज्यों के कृषि क्षेत्र को लेकर हुआ था। यह समझौता अगले 50 सालों तक के लिए था। लेकिन बाद में विवाद में केरल और पुडुचेरी भी शामिल हो गए जिससे यह और मुश्किल हो गया।
तो वही 1972 में गठित एक कमेटी की रिपोर्ट के बाद 1976 में कावेरी जल विवाद के सभी चार दावेदारों के बीच एग्रीमेंट किया गया, जिसकी घोषणा संसद में हुई। इसके बावजूद विवाद जारी रहा। 1986 में तमिलनाडु ने अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) के तहत केंद्र सरकार से एक ट्रिब्यूनल की मांग की। 1990 में ट्रिब्यूनल का गठन हो गया। ट्रिब्यूनल ने फैसला किया कि कर्नाटक की ओर से कावेरी जल का तय हिस्सा तमिलनाडु को मिलेगा। 2007 में ट्रिब्यूनल ने अपना अंतिम निर्णय दिया और कहा कि 1892 और 1924 के समझौते को बरकरार रखा जाए।
फिलहाल, इस मुद्दे को सुलाझाने के लिए अब तक 25 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन परिणाम कुछ भी नहीं निकला है। यह विवाद सबसे ज्यादा बारिश कम होने के वक्त आता है जब किसानों को कृषि के लिए पानी ज्यादा चाहिए होता है लेकिन अभी भी इस विवाद को सुलझाने में केंद्र, राज्य और सुप्रीम कोर्ट भी लगी हुई है।
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