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ट्रंप-किम का एग्रीमेंट: परमाणु युद्ध का खतरा चिरकाल के लिए टला

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच ऐतिहासिक वार्ता से उम्मीद के अनुरूप कोरियाई प्रायद्वीप में शांति का मार्ग प्रशस्त हुआ है और विश्व पर मंडरा रहा परमाणु युद्ध का खतरा चिरकाल के लिए टला है। किम पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण करने पर राजी हुए हैं तो ट्रंप उत्तर कोरिया को विशेष सुरक्षा गारंटी देने पर सहमत हुए हैं।

ट्रंप-किम का एग्रीमेंट: परमाणु युद्ध का खतरा चिरकाल के लिए टला

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच ऐतिहासिक वार्ता से उम्मीद के अनुरूप कोरियाई प्रायद्वीप में शांति का मार्ग प्रशस्त हुआ है और विश्व पर मंडरा रहा परमाणु युद्ध का खतरा चिरकाल के लिए टला है। किम पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण करने पर राजी हुए हैं तो ट्रंप उत्तर कोरिया को विशेष सुरक्षा गारंटी देने पर सहमत हुए हैं।

दोनों देशों ने लगभग 68 साल की तल्खी को पीछे छोड़ शांति व विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया है। विश्व के लिए यह अविस्मरणीय क्षण है। ट्रंप उत्तर कोरिया के साथ करार कर अमेरिकी इतिहास में कामयाब राष्ट्रपति के रूप में भी दर्ज हो गए, क्योंकि 65 साल में 12 अमेरिकी राष्ट्रपति उत्तर कोरिया के मसले पर नाकाम रहे थे।

जिस तरह ट्रंप और किम पिछले कुछ समय से जिस दुश्मनी भरे लहजे में बात कर रहे थे और एक-दूसरे के लिए सनकी, पागल, बूढ़ा, रॉकेटमैन जैसे आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करने से जरा भी परहेज नहीं कर रहे थे, उससे लगता था कि उत्तर कोरिया कभी भी विश्व पर परमाणु विनाश थोप सकता है, लेकिन पिछले छह माह में परिस्थिति ऐसी बदली कि अमेरिका और उत्तर कोरिया वार्ता पर सहमत हुए।

इन देशों ने उत्तर कोरिया के लिए चीन से की अपील

यूएस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन के बाद जापान, दक्षिण कोरिया व वियतनाम यात्रा के दौरान ट्रंप ने चीन से अपील की कि वह उत्तर कोरिया को समझाए। चूंकि अमेरिका जानता है कि शीत युद्ध के दौर से ही उत्तर कोरिया चीन के खेमे में है और उत्तर कोरिया के आत्मविश्वास के पीछे भी ड्रैगन ही है, इसलिए ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से कहा कि वह किम जोंग उन को भरोसे में लें और उन्हें बार-बार परमाणु परीक्षण से रोकें।

ऐसे टला अमेरिका उत्तर कोरिया का युद्ध

अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से भी कूटनीतिक पहल की अपील की। उसके बाद किम चीन गए, शी से मिले और दो बार दक्षिण कोरिया गए व वहां के राष्ट्रपति मून जे इन से मिले। अलग होने के बाद से ही उत्तर और दक्षिण कोरिया के नेताओं ने एक-दूसरे की सीमा नहीं लांघी थी। किम का दक्षिण कोरिया जाना ऐतिहासिक माना गया। इससे दोनों देशों के बीच जमी दुश्मनी की बर्फ पिघली।

अमेरिका से उत्तर कोरिया की दोस्ती के तीन फायदे

दक्षिण कोरिया और चीन ने किम और ट्रंप के बीच मुलाकात करवाने में अहम भूमिका निभाई। इस वार्ता से अमेरिका, उत्तर कोरिया के अलावा चीन, दक्षिण कोरिया समेत सभी जिम्मेदार देशों के हित जुड़े हैं। अमेरिका ने उत्तर कोरिया को परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए राजी कर एक तो विश्व में अपनी बादशाहत साबित की, दूसरी उसने चीन को दुनिया में खुद के सिरमौर होने का संदेश दिया, तीसरा उसने उत्तर कोरिया को अपने पाले में किया और चौथा वह दुनिया पर मंडरा रहे विश्वयुद्ध के खतरे को टालने में सफल हुआ।

क्यों शुरू हुआ विश्व युद्ध का खतरा

उत्तर कोरिया के लगातार परमाणु परीक्षण, इंटरकंटिनेंटल मिसाइल टेस्ट और किम के गैर जिम्मेदाराना बयानों के चलते विश्वयुद्ध का खतरा उत्पन्न हो गया था। उत्तर कोरिया 33 साल में 150 मिसाइल और 6 परमाणु परीक्षण कर चुका है। इनमें से 89 मिसाइल और 6 परमाणु टेस्ट किम ने अपने 7 साल के शासन में किए हैं।

दरअसल ट्रंप प्रशासन दक्षिण कोरिया से 50 हजार से अधिक अमेरिकी सैनिक की वापसी चाहता है, इसके लिए उस क्षेत्र में परमाणु खतरे को खत्म करना जरूरी था। इस वार्ता के सफल होने से चीन और दक्षिण कोरिया के साथ भारत और जापान ने भी राहत की सांस ली है।

अमेरिका उत्तर कोरिया की दोस्ती में चीन की बड़ी भूमिका

चीन की कोशिश है कि उत्तर कोरिया शांत हो जाए तो दक्षिण कोरिया से अमेरिकी सैनिक की भी वापसी हो जाएगी, जिससे उसकी सीमा पर तैनात यूएस फौज दूर हो जाएगी। दक्षिण कोरिया से अमेरिका के मधुर संबंध के चलते चीन को अपनी सीमा पर हमेशा अमेरिकी फौज चुभती है।

शक्ति संतुलन के लिए ही चीन उत्तर कोरिया को अपने नियंत्रण रखे हुए है। दक्षिण कोरिया भी अपने यहां से अमेरिकी फौज की वापसी चाहता है, इसलिए उत्तर कोरिया से शांति व दोस्ती की हर संभव कोशिश कर रहा है। जापान व भारत भी कोरियाई प्रायद्वीप में शांति चाहते हैं और परमाणु हथियार के खतरे को मिटाना चाहते हैं। इस वार्ता को सफल माना जा सकता है।

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