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जानें पकौड़ा बेचने वाले धीरूभाई अंबानी की रोचक कहानी

देश के सबसे बड़े उद्योग घराने अंबानी की शुरुआत करने वाले धीरू भाई अंबानी का आज जन्मदिन है। धीरूभाई केवल एक उद्योगपति ही नहीं हैं। वह एक ऐसे उद्योगपति रहे हैं जिनकी कहानियां आज भी लोगों को सुनाई जाती है। जब भी कोई नया बिजनेस शुरू करने की सोचता है तो कई लोग उसे डराते हैं कि नुकसान हो जाएगा या डूब जाएगा। लेकिन खुद को साहस देने के लिए लोग धूरूभाई अंबानी की उदाहरण देते हैं। धीरूभाई कहते थे कि जो लोग सपने देखने की ताकत रखते हैं वही उनको पूरा कर सकते हैं। धीरूभाई का पूरा नाम धीरजलाल हीरालाल अंबानी था। 1966 में उन्होंने रिलायंस टैक्सटाइल्स की स्थापना की थी। शुरुआत में उन्होंने 300 रुपये के वेतन पर काम शुरु किया था। बाद में वह अपनी मेहनत से अरबपति बने। आइए जानते हैं क्या रही है धीरूभाई अंबानी की कहानी।

जानें पकौड़ा बेचने वाले धीरूभाई अंबानी की रोचक कहानी

देश के सबसे बड़े उद्योग घराने अंबानी (Ambani) की शुरुआत करने वाले धीरू भाई अंबानी (Dhirubhai Ambani) का आज जन्मदिन (Birthday) है। धीरूभाई केवल एक उद्योगपति ही नहीं हैं। वह एक ऐसे उद्योगपति रहे हैं जिनकी कहानियां आज भी लोगों को सुनाई जाती है। जब भी कोई नया बिजनेस शुरू करने की सोचता है तो कई लोग उसे डराते हैं कि नुकसान हो जाएगा या डूब जाएगा। लेकिन खुद को साहस देने के लिए लोग धीरूभाई अंबानी का उदाहरण देते हैं। धीरूभाई कहते थे कि जो लोग सपने देखने की ताकत रखते हैं वही उनको पूरा कर सकते हैं। धीरूभाई का पूरा नाम धीरजलाल हीरालाल अंबानी था। 1966 में उन्होंने रिलायंस टैक्सटाइल्स की स्थापना की थी। शुरुआत में उन्होंने 300 रुपये के वेतन पर काम शुरु किया था। बाद में वह अपनी मेहनत से अरबपति बने। आइए जानते हैं क्या रही है धीरूभाई अंबानी की कहानी।


शुरुआती जीवन

धीरूभाई अंबानी का जन्म 28 दिसंबर 1932 को गुजरात के जूनागढ़ के चोरवाड़ में हुआ था। वही जूनागढ़ जो कभी भारत से अलग रहना चाहता था। उनके पिता का नाम हीरालाल अंबानी और माता का नाम जमनाबेन था। धीरूभाई के पिता शिक्षक थे। धीरूभाई के चार भाई-बहन थे। धीरूभाई का शुरुआती जीवन काफी कष्टमय था। काफी बड़ा परिवार होने के कारण उन्हें कई बार आर्थिक समस्याएं आती रहीं। जिस कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

पकौड़ा बेचा

धीरूभाई ने पढ़ाई छोड़ने के बाद फल और नाश्ता बेचना शुरू किया। लेकिन कुछ ज्यादा फायदा नहीं मिला। जिसके बाद उन्होंने गांव के एक धार्मिक स्थल के करीब पकौड़ा बेचना शुरु कर दिया। लेकिन यह काम पर्यटकों पर निर्भर था। साल के कुछ दिन यह काम अच्छा चलता था। जबकि साल में कुछ दिन धंधा पूरी तरह मंदा रहता था। शुरुआत के दो बिजनेस में मिले नुकसान के कारण उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।

यमन के पेट्रोलपंप पर तेल भरा

धीरू भाई अंबानी रे बड़े भाई यमन में नौकरी करते थे। पिता की सलाह के बाद धीरूभाई भी यमन चले गए। वहां पर उन्होंने 300 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर नौकरी करना शुरु किया। महज दो सालों में वह अपनी योग्यता के चलते प्रबंधक पद तक पहुंच गया।

इसके बाद धीरूभाई का मन नौकरी में कम और व्यापार में ज्यादा लगने लगा। धीरूभाई ने उस हरएक संभावना पर विचार किया।जिससे वह एक सफल बिजनेसमैन बन सकते हैं। बिजनेस के प्रति उनमें किस तरह जुनून था उसका अंदाजा एक वाकिए से लगाया जा सकता है।

जिस कंपनी में वह काम करते थे वहां के कर्मचारी जिस होटल पर चाय पीते थे वहां चाय 25 पैसे में मिलती थी। लेकिन धीरूभाई वहां चाय नहीं पीते थे। वो एक ऐसी जगह जाकर चाय पीते थे जहां चाय 1 रुपये की मिलती थी। खुद धीरूभाई ने इसका कारण बताया था।

उन्होंने कहा था कि जहां 1 रुपये की चाय मिलती थी। उस होटल पर बड़े-बड़े व्यापारी आते थे। मैं वहां जाता था ताकि बिजनेस के बारे में जान सकूं। यमन में काम करते हुए धीरूभाई कई और देशों में भी जाते रहे। कुछ समय बाद यमन अपनी आजादी के लिए लड़ने लगा।

जिसकी वजह से वहां भारतीयों के लिए व्यवसाय करना मुश्किल हो गया। भारतीयों के लिए सारे दरवाजे बंद हो गए। धीरूभाई भारत लौट आए और 1950 में अपने चचेरे भाई चम्पकलाल दमानी के साथ वह मसालों और पॉलिएस्टर धागे का आयात निर्यात करने लगे।

दूसरे देशों में अपनी बनाई गई पहचान का उन्होंने बखूबी इस्तेमाल किया और मासालों के व्यापार से अच्छा खासा पैसा बनाया। कहा जाता है कि अंबानी ऐसे व्यापारी थे जो हर चीज को बेंच सकते थे। एक वाकिया बड़ा ही मशहूर है। कि उन्होंने एकबार अरब के शेख को मिट्टी तक बेंच दी थी।

कहा जाता है कि अरब के एक शेख को अपने बगीचे में गुलाब के लिए अच्छी क्वालिटी की मिट्टी चाहिए थी। जिसे धीरूभाई अंबानी ने बेंचा था। रिलायंस कमर्शियल कारपोरेशन की शुरुआत मस्जिद बन्दर के नरसिम्हा स्ट्रीट एक छोटे कार्यालय में हुई थी।

यहीं से रिलायंस कंपनी की शुरुआत हुई थी। इस कंपनी की शुरुआत में धीरूभाई का लक्ष्य था कि मुनाफा ज्यादा न कमाया जाए बल्कि ज्यादा से ज्यादा उत्पादों का निर्माण किया जाए। 1965 में धीरूभाई और चम्पकलाल दमानी के बीच व्यावसायिक साझेदारी समाप्त हो गई।

दोनों का स्वभाव और व्यापार करने का तरीका एक दूसरे से अलग था। जिसके कारण यह साझेदारी ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल पाई। दमानी जहां फूंक-फूंक कर कदम रखते थे तो वहीं धीरुभाई जोखिम उठाते थे। इसके बाद धीरूभाई ने सूत के व्यापार में हाथ डाला।

जिसमें पहले के व्यापार की तुलना में नुकसान हो सकता था। लेकिन वो अपनी धुन के पक्के थे। उन्होंने इस व्यापार को एक छोटे स्टोर पर शुरू किया और जल्द ही अपनी काबिलियत के बल पर वह बॉम्बे सूत व्यापारी संगठन संगठन के संचालक बन गए।

अब तक धीरूभाई को कपड़े के व्यापार की अच्छी समझ हो गई थी। इस व्यवसाय में अच्छी समझ होने के बाद 1966 में उन्होंने अहमदाबाद के नैरोड़ा में एक कपड़ा मिल शुरु किया। यहाँ कपड़ा निर्माण पोलियस्टर के धागों से होता था।

धीरुभाई ने इस ब्रांड का नाम ‘विमल’ रखा जो कि उनके बड़े भाई रमणिकलाल अंबानी के बेटे, विमल अंबानी के नाम पर रखा गया था। विमल का प्रचार प्रसार इस तरह से किया गया कि यह ब्रांड घर-घर पहुंच गया। 1980 के दशक में धीरूभाई अंबानी पॉलिएस्टर फिलामेंट यार्न निर्माण का सरकार से लाइसेंस लेने में कामयाब हो गए।

जिसके बाद सफलता धीरुभाई के पैर चूमने लगी। उन्होंने कई और तरह के व्यापार शुरु किए। इसमें मुख्य रूप से पेट्रोरसायन, दूरसंचार, सूचना प्रोद्योगिकी, ऊर्जा, बिजली, फुटकर, कपड़ा, मूलभूत सुविधाओं की सेवा, पूंजी बाज़ार और प्रचालन-तंत्र शामिल थे। कुछ हजार रुपयों के साथ शुरु की गई रिलायंस कंपनी 2012 तक 85 हजार कर्मचारियों की कंपनी बन गई।

पारिवारिक जीवन

धीरूभाई अंबानी की शादी कोकिलाबेन के साथ हुई थी। उनकी चार संताने हैं। दो बेटे मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी। दो बेटियां नीना कोठारी और दीप्ति सल्गाओकर। अब अनिल अंबानी और मुकेश अंबानी की रिलायंस अलग-अलग हो चुकी है।

24 जून 2002 को दिल का दौरा पड़ने के कारण उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह उनका दूसरा दिल का दौरा था। 1986 में उन्हें पहले भी दिल का दौरा पड़ चुका था। जिसमें उनका दाया हाथ लकवाग्रस्त हो गया था। 6 जुलाई 2002 को 69 साल की उम्र में धीरुभाई अंबानी का निधन हो गया।

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