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नोटबंदी से टूटी नक्सलियों की कमर, जंगलों में दबे पैसे को निकालने पर खुफिया नजर

नक्सली राज्य से प्रति वर्ष डेढ़ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा तक की उगाही नक्सली करते रहे हैं।

नोटबंदी से टूटी नक्सलियों की कमर, जंगलों में दबे पैसे को निकालने पर खुफिया नजर
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नई दिल्ली. मोदी सरकार की कालेधन के खिलाफ नोटबंदी के एक फैसले ने कई ऐसे कलंक को निशाना बना लिया हे, जो देश की अर्थव्यवस्था के साथ जनता विरोधी गतिविधियों को दीमक लगता रहा था। यानि कालेधन के साथ भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी आर्थिक कमर तोड़ने का सबब भी बनता नजर आया है। देश में खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों की एक सप्ताह के दौरान आकलन रिपोर्ट इस बात की पुष्टि कर रही है कि मोदी सरकार ने जब से 500 और 1000 के नोट बंद करने का ऐलान किया है तो कालेधन के साथ आतंकियों, नक्सलियों और उग्रवादियों से लड़ने के फार्मूले का भी तर्क दिया गया। सरकार का यह फैसला इस तर्क की सार्थकता को साबित करता नजर आ रहा है।
जमीनों में गाड़े हुए हजारों करोड़ों
मसलन कश्मीर में अलगाववादी संगठनों के इशारे पर स्कूलों को फूंकने व पत्थरबाजी की घटनाओं पर अचानक रोक लगी है और सीमा पर भी आतंकवाद की गतिविधियों पर भी प्रभाव नजर आया है। खासकर देश के अंदर नक्सलवाद की गतिविधियों की तो इस फैसले ने आर्थिक कमर तोड़कर रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के जमीनों में गाड़े हुए हजारों करोड़ों में 500-100 के नोट डंप हो रहे हैं, जिनका कचरा होने के अलावा और कुछ नहीं होगा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित राजनांदगांव जिले में वर्ष 2014 के मार्च महीने में पकड़े गए नक्सलियों की निशानदेही पर जंगल में डंप किए गए एक गड्ढे से 29 लाख रुपये बरामद किए गए थे। वहीं पुलिस ने इस वर्ष मई महीने में गरियाबंद जिले में मुठभेड़ के बाद घटनास्थल से आठ लाख रूपए बरामद किए थे, जबकि जुलाई महीने में सुकमा जिले में नक्सलियों से एक लाख रुपये बरामद होने से सरकार की नोटबंदी के फैसला कारगर साबित होता नजर आ रहा है।
सबसे बड़ा आपरेशन
आतंकवाद व नक्सलवाद विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि सरकार के इस एक फैसले से कई राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर सीधा निशाना लगाया जा चुका है। सरकार का नक्सलवाद के खिलाफ यह एक ही फैसला ऐसा है जो पिछले कई दशकों से चलाए जा रहे नक्सल विरोधी अभियानों से कहीं ज्यादा कारगर साबित होगा। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे नक्सली गढ़ के जंगलों में नक्सलवादी संगठनों के पास बडे पैमाने पर करोड़ो की रकम मौजूद है, जिसे वे जंगलों में जमीन के भीतर गाड़कर रखते हैं। सूत्रों का यह भी कहना है कि सरकार के इस फैसले से आर्थिक रूप से पस्त होते नक्सलियों द्वारा हालांकि इस रकम को जंगलों से बाहर लाकर बचाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन ऐसी गतिविधियों पर खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजरें लगी हुई हैं।
उगाही की रकम
विशेषज्ञों के अनुसार नक्सलियों के पास यह धन विभिन्न जगहों से उगाही किए गए पैसों का ही हिस्सा है, जो पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों के रूप में ही एकत्रित किया गया होता है। देश में नक्सलवाद को लेकर पहले से ही ऐसी पुष्टि संबन्धित राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा की जाती रही है कि नक्सली राज्य से प्रति वर्ष डेढ़ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा तक की उगाही नक्सली करते रहे हैं। खासकर यह धनराशि खदानो, विभिन्न उद्योगों, तेंदूपत्ता और सड़क ठेकेदारों, परिवहन व्यवसायियों, लकड़ी व्यापारियों से और अन्य स्रोतों से उगाही का हिस्सा होता है। इस धन का इस्तेमाल नक्सली नेता अलग-अलग जगहों में अपनी गतिविधियों और हथियार की खरीदों पर खर्च करते हैं।
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