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दावोस: विश्व आर्थिक मंच पर क्यों जुट रहे हैं ट्रंप-मोदी समेत दुनिया के अरबपति

दावोस में विश्व आर्थिक मंच के शिखर सम्मेलन में अमेरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनिया के अरबपतियों की मुलाक़ात होगी।

दावोस: विश्व आर्थिक मंच पर क्यों जुट रहे हैं ट्रंप-मोदी समेत दुनिया के अरबपति

दावोस में विश्व आर्थिक मंच के शिखर सम्मेलन का आगाज हो गया है। स्विट्जरलैंड के इस खूबसूरत बर्फीले शहर में हो रहे इस सम्मेलन की खास बात है कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें वैश्विक नेता के रूप में हिस्सा ले रहे हैं। 1996 के बाद वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं, तो इसमें शिरकत कर रहे हैं। 1996 में तत्कालीन पीएम एचडी देवगौड़ा ने वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की बैठक में भाग लिया था।

उस वक्त वे भारत की मजबूत तस्वीर पेश नहीं कर पाए थे। उस वक्त परिस्थतियां भी अलग थीं, लेकिन अभी विश्व में भारत की तस्वीर बदली हुई है। समूचा विश्व भारत को मजबूती से उभरते सशक्त राष्ट्र के रूप में देख रहा है। विश्व में भारत की बढ़ती ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस दफा डब्ल्यूईएफ सम्मेलन का उद्घाटन संबोधन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।

यह भारत के लिए गौरवपूर्ण अवसर है। 1971 में गठित डब्ल्यूईएफ विश्व का ऐसा स्वीकार्य मंच बन गया है, जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था की नीतियां व उसके एजेंडे निर्धारित होने लगे हैं। जर्मनी एकीकरण, नेल्सन मंडेला व तत्कालीन दक्षिण अफ्रीकी श्वेत राष्ट्रपति डे क्लार्क का मिलन, दक्षिण-उत्तर कोरिया के राष्ट्र प्रमुखों की पहली बैठक, इजराइल-फिलिस्तीन करार, यूनान-तुर्की शांति समझौता आदि विश्व में बदलाव लाने वाले अहम पड़ाव हैं, जिनका गवाह डब्ल्यूईएफ सम्मेलन बना है।

विश्व की अर्थव्यवस्था, राजनीति और कारोबार की दिशा तय करने के मकसद से स्विट्जरलैंड के प्रोफेसर क्लाउस श्वाब द्वारा स्थापित डब्ल्यूईएफ के मंच पर अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण संबंधी अनेक नीतियों पर अहम निर्णय हुए हैं। दावोस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास दुनिया के सामने भारतीय अर्थव्यवस्था की खूबियों-उपलब्धियों, यहां निवेश की संभावनाओं और भारत सरकार की उदार आर्थिक नीतियों को रखने और न्यू इंडिया की तस्वीर पेश करने का सुनहरा अवसर होगा।

पीएम ने कहा भी है कि ‘दावोस में मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ भारत के भविष्य के संबंधों के बारे में अपनी राय रखूंगा। दरअसल विभिन्न मतों व नीतियों से बंटे हुए संसार के साझे भविष्य के सृजन में डब्ल्यूईएफ एक मजबूत मंच है। पीएम कह सकते हैं कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भागीदार साबित हो सकता है, अन्य देश इसमें सहभागिता निभाएं।

वे भारत में व्यापार को आसान बनाने, भ्रष्टाचार और कालाधन कम करने, टैक्स प्रणाली सरल बनाने और देश के सतत विकास के लिए उठाए गए जरूरी कदमों की चर्चा भी कर सकते हैं। साथ ही वे वैश्विक आतंकवाद को खत्म करने, अस्थिर अर्थव्यवस्था, साइबर खतरे और सामाजिक विषमताओं को समाप्त करने के लिए वैश्विक सहयोग पर भी चर्चा कर सकते हैं।

पीएम मोदी के संबोधन पर दुनिया की नजरें होंगी, लेकिन वे अगर भारत को वैश्विक नेतृत्व देने में सक्षम राष्ट्र के रूप में पेश कर पाएं तो यह और अच्छा होगा। दावोस जैसे मंच भारत के इस लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में अहम साबित हो सकते हैं। विश्व में समावेशी विकास का लक्ष्य अभी भी कोसों दूर है और वर्तमान आर्थिक मॉडल के चलते अमीर व गरीब के बीच खाई बढ़ी है।

यहां तक कि विश्व की 80 फीसदी पूंजी पर एक फीसदी आबादी का कब्जा हो गया है। इन आर्थिक विषमताओं को दूर करने की दिशा में नई समावेशी आर्थिक नीतियों को अपनाने की जरूरत है। ऐसे में डब्ल्यूईएफ को श्रम आधारित अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा में विश्व मत बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। इस सम्मेलन की सफलता भी इसी बात पर निर्भर करेगी।

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