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भारत के मुरीद थे ''फिदेल कास्त्रो'', चाहते थे भारत में पैदा होना

फिदेल कास्त्रो ने कहा था कि ताउम्र नेहरू के एहसान को नहीं भूल सकता

भारत के मुरीद थे फिदेल कास्त्रो, चाहते थे भारत में पैदा होना
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हवाना. क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री फिदेल कास्त्रो का शनिवार को निधन हो गया। 90 वर्षीय कास्त्रो लंबे समय से बीमार चल रहे थे। साल 2008 में फिदेल कास्त्रो ने स्वेच्छा से राष्ट्रपति पद छोड़ दिया था। लेकिन वह क्यूबा कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने हुए थे। कास्त्रो 1959 से दिसंबर 1976 तक क्यूबा के प्रधानमंत्री और फिर क्यूबा की राज्य परिषद के अध्यक्ष (राष्ट्रपति) रहे थे। फिदेल एक क्रांतिकारी नेता थे।
फिदेल कास्त्रो का भारत से बहुत गहरा रिश्ता था। इतिहासकारों के मुताबिक कास्त्रो को भारत से असीम प्रेम और स्नेह था। वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बहुत प्रवाभित थे और उनके बारे में कहते थे कि वह उनका एहसान कभी नहीं भूल सकते हैं।
भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने बताया कि, जब मैं कास्त्रो से मिला तो उन्होंने मुझसे कहा, "क्या आप को पता है कि जब मैं न्यूयार्क के उस होटल में रुका तो सबसे पहले मुझसे मिलने कौन आया? महान जवाहरलाल नेहरू। कास्त्रो ने बताया कि, मेरी उम्र उस समय 34 साल थी। मेरे पास अंतरराष्ट्रीय राजनीति का कोई तजुर्बा नहीं था। नेहरू ने मेरा हौसला बढ़ाया जिसकी वजह से मुझमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास जगा। मैं ताउम्र नेहरू के उस एहसान को नहीं भूल सकता।" नेहरू और फ़िदेल की उस मुलाक़ात के बाद भारत के लिए उनके मन में जो सम्मान और स्नेह पैदा हुआ उसमें कभी कमी नहीं आई।
नटवरसिंह कहते हैं कि, मैं उनसे 1960 में संयुक्त राष्ट्र संघ की 15वीं वर्षगांठ पर मिला था। जब दुनिया भर के बड़े नेता न्यूयॉर्क में सम्मलेन में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। फ़िदेल कास्त्रो न्यूयार्क पहुंचे उन्हें कोई होटल भी उन्हें अपने यहां रखने के लिए तैयार नहीं हुआ था। एक दिन तो वो क्यूबा के दूतावास में रहे लेकिन अगले दिन उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव डैग हैमरशोल्ड से कहा था कि मेरे और मेरे प्रतिनिधिमंडल के रहने का इंतज़ाम करें वर्ना मैं संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के प्रांगण में तंबू डाल कर वहां रहने लगूंगा। हालांकि अगले दिन न्यूयार्क का टेरेसा होटल उन्हें अपने यहाँ रखने के लिए तैयार हो गया था।
नटवर कहते हैं, "उस सम्मेलन में सुबह के सत्र में फ़िदेल कास्त्रो अध्यक्ष थे. उसके बाद इंदिरा गांधी अध्यक्ष बन गईं थीं। नटवर आगे बताते हैं, "कास्त्रो साहब अगले दिन हमसे मिलने आए और उन्होंने फ़ोन कर यासर अराफ़ात को भी बुला लिया। उन्होंने अराफ़ात से पूछा आप इंदिरा गाँधी को अपना दोस्त मानते हैं कि नहीं। अराफ़ात ने कहा, दोस्त नहीं... वो मेरी बड़ी बहन हैं। इस पर कास्त्रो ने तपाक से कहा तो फिर छोटे भाई की तरह बर्ताव करो और सम्मेलन में भाग लो।" अराफ़ात इंदिरा गांधी और फ़िदेल को मना नहीं कर पाए और शाम के सत्र में भाग लेने के लिए पहुंच गए।
नटवरसिंह आगे बताते है कि, इस सम्मेलन के उस दृश्य को कौन भूल सकता है जब फ़िदेल कास्त्रो ने विज्ञान भवन के मंच पर ही सरेआम इंदिरा गाँधी को गले लगा लिया था. मशहूर पत्रकार सईद नक़वी कहते हैं, "इंदिरा गांधी को फ़िदेल ने सीने से लगा लिया था। वो लजाई शर्माई दुल्हन बन गईं। फिदेल इंदिरा को नेहरू की बेटी के रूप में देखते थे।"
फिदेल के बारे में कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी बताते हैं कि, "कास्त्रो हमसे सवाल पर सवाल किए जा रहे थे। भारत कितना कोयला पैदा करता है? वहां कितना लोहा पैदा होता है? तब से जब भी मैं क्यूबा जाता हूँ, भारत की आर्थिक स्थिति के बारे में आँकड़ों की हैंडबुक हमेशा अपनी जेब में रखता हूं।" येचुरी बताते हैं, "फ़िदेल हमें विदा करने के लिए आए थे। मुझे याद है मेरे कंधे पर एक बैग लटका हुआ था। फ़िदेल हमेशा की तरह अपनी सैनिक यूनिफ़ार्म मे थे। उनकी वर्दी से एक पिस्तौल लटकी हुई थी। उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरे बैग में क्या है? मैंने जवाब दिया कुछ किताबें हैं, फ़िदेल बोले तुम तो आ गए लेकिन मेरे सामने कोई बैग ले कर नहीं आता। पता नहीं इसमें क्या रखा हो?
येचुरी कहते हैं, "मैंने कहा आपके पास तो पिस्तौल है। अगर कोई आप पर हमला करे तो आप उस पर इसे चला सकते हो। तब फ़िदेल ने मुस्कराते हुए कहा था ये राज़ समझ लो आज। ये पिस्तौल हमने अपने दुश्मनों को डराने के लिए रखी है। लेकिन इस पिस्तौल में गोली कभी नहीं होती।"
इसी तरह 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब क्यूबा की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई तो भारत के कम्यूनिस्ट नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने क्यूबा को दस हज़ार टन गेहूं भिजवाया था। सोवियत संघ बिखर गया था। क्यूबा की स्थिति बहुत गंभीर थी क्योंकि उनकी पूरी अर्थव्यवस्था सोवियत संघ पर निर्भर थी। क्यूबा के ऊपर प्रतिबंध लगा हुआ था जिसके कारण वो अपना सामान दुनिया में कहीं और नहीं भेज सकते थे। उस समय उनके पास न नहाने के लिए साबुन था और न ही खाने के लिए गेहूं।" कामरेड सुरजीत ने लोगों से अनाज जमा किया और पैसे जमा किए। उनके प्रयासों से पंजाब की मंडियों से एक विशेष ट्रेन कोलकाता बंदरगाह भेजी गई। सरकार ने 10 हजार टन गेहूं दिया। उसके साथ दस हज़ार साबुन भी भेजे गए। इस मदद पर फ़िदेल कास्त्रो ने ख़ास तौर से सुरजीत को बुलवाया और कहा कि कुछ दिनों तक सुरजीत सोप और सुरजीत ब्रेड से क्यूबा ज़िंदा रहेगा।"
केंद्र में मंत्री और दो राज्यों की राज्यपाल रहीं मारग्रेट ने बताया कि, "एक बार खाने के बाद फिदेल ने मुझसे पूछा कि आपका वज़न कितना है? मैंने कहा मैं आपको क्यों बताऊं? फ़िदेल ज़ोर से हंसे और अगले ही क्षण उन्होंने मेरी कमर पर हाथ रखते हुए कहा मैं तुमको उठा कर बता सकता हूँ कि तुम्हारा वज़न कितना है।" अल्वा आगे कहती हैं, "मैं आपकी सोच से कहीं ज्यादा भारी हूं। तो उन्होंने मुझे ज़मीन से एक फ़ुट ऊपर उठा लिया। फिर वो ज़ोर से हंस कर बोले, अब मुझे मालूम है तुम्हारा वज़न कितना है। और मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया।"
मार्ग्रेट अल्वा बताती हैं कि, "एक दूसरी मुलाक़ात में फ़िदेल ने मुझसे पूछा अगर स्पेनिश लोग क्यूबा में न होकर भारत में होते, तो इतिहास क्या होता? मैंने छूटते ही जवाब दिया, फ़िदेल कास्त्रो एक भारतीय होते। ये सुनकर फ़िदेल ने ठहाका लगाया, ज़ोर से मेज़ को थपथपाया और बोले, ये मेरे लिए खुशकिस्मती की बात होती! भारत एक महान देश है।"
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