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Chipko Movement: ये है ''चिपको आंदोलन'' की सच्चाई, यूपी नहीं राजस्थान में हुई थी शुरुआत

दुनिया में सबसे ज्‍यादा इस्‍तेमाल किए जाने वाले सर्च इंजन गूगल ने आज (26 मार्च) को ‘चिपको आंदोलन’ की 45वीं सालगिरह पर डूडल बनाया है।

Chipko Movement: ये है चिपको आंदोलन की सच्चाई, यूपी नहीं राजस्थान में हुई थी शुरुआत
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दुनिया में सबसे ज्‍यादा इस्‍तेमाल किए जाने वाले सर्च इंजन गूगल ने आज (26 मार्च) को ‘चिपको आंदोलन’ की 45वीं सालगिरह पर डूडल बनाया है।

दरअसल, साल 1970 में 'चिपको आंदोलन' की शुरुआत पर्यावरण की रक्षा के लिए की गयी थी। पेड़ों की कटाई रोकने और उसकी रक्षा को लेकर भारत में चले इस आंदोलन को बेहद अहम माना जाता है।

इस आंदोलन के तहत, उस समय लोग पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उससे चिपक जाते थे। यह आंदोलन पूरे गांधीवादी तरह से चलाया गया, जिसकी चर्चा दुनियाभर में हुई।

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1970 में हुई शुरुआत

बता दें कि चिपको मूवमेंट की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले (तब उत्तर प्रदेश का भाग) से हुई थी। जब साल 1973 में वन विभाग के ठेकेदारों ने जंगलों के पेड़ों की कटाई शुरू कर दी थी तब चिपको आंदोलन ने जन्म लिया। इसी के बाद से यह राज्य के सभी पहाड़ी जिलों में फैल गया।

चिपको आंदोलन का इतिहास

लेकिन असल चिपको आंदोलन का इतिहास और पुराना है। इससे पहले 18वीं सदी में राजस्‍थान के बिश्‍नोई समाज के लोगों ने पेड़ों को गले लगाकर अवनीकरण का विरोध किया था। उस समय केहरी समूह के पेड़ों को बचाने के लिए अमृता देवी के नेतृत्‍व में 84 गांवों के 383 लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी।

इसके बाद जब इससे होने वाले बुरे प्रभावों का एहसास हुआ तो जोधपुर के महाराज के आदेश पर शुरू हुई पेड़ों की कटाई को रोक दिया गया और एक राजकीय आदेश जारी कर पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

दोबारा शुरु हुआ चिपको आंदोलन

इसके बाद आधुनिक भारत में, सन् 1973 में उत्‍तर प्रदेश के मंडल गांव में चिपको आंदोलन दोबारा शुरू हुआ। इस आंदोलन की खास बात यह थी कि इसमें स्त्रियों ने भारी संख्या में भाग लिया था।

चांद चंडी प्रसाद भट्ट और उनके NGO दशोली ग्राम स्‍वराज्‍य ने उत्तर प्रदेश में स्‍थानीय महिलाओं के एक ग्रुप के साथ मिलकर इस आंदोलन का नेतृत्‍व किया।

वहीं इस पहल में मशहूर पर्यावरणशास्‍त्री सुंदरलाल बहुगुणा ने भी साथ दिया और इंदिरा गांधी से उनकी अपील के बाद देश में पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। चिपको आंदोलन में धूम सिंह नेगी, गौरा देवी, बचनी देवी और सुदेशा देवी की बड़ी भूमिका रही।
सन् 1987 में इस आंदोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था।

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