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अमेरिका की गद्दारी देख कर चीन ने लॉन्च किया अपना GPS सिस्टम, जानिए कैसे करता है काम

चाइना ने अपना खुद का नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी जीपीएस (GPS) ''बायडू'' (BeiDou) लॉन्च किया है। यह चीन के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस जीपीएस के सहारे चीन पूरी दुनिया पर नजर रख सकता है। भारत के पास भी अपना जीपीएस है।

अमेरिका की गद्दारी देख कर चीन ने लॉन्च किया अपना GPS सिस्टम, जानिए कैसे करता है काम
चाइना ने अपना खुद का नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी जीपीएस (GPS) 'बायडू' (BeiDou) लॉन्च किया है। यह चीन के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस जीपीएस के सहारे चीन पूरी दुनिया पर नजर रख सकता है। भारत के पास भी अपना जीपीएस है।
जिसका नाम नाविक (NavIC) है। लेकिन चीन और भारत के नेविगेशन सिस्टम में अंतर है। भारत का नेविगेशन सिस्टम एक निश्चित स्थान के लिए स्थापित किया गया है। यह चीन, पाकिस्तान अफगानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्से तक नजर रख सकता है। जबकि चीन का बायडू अब पूरी दुनिया पर निगाह रख सकता है।

किन देशों के पास है अपना जीपीएस

अमेरिकी सेना ने 1973 में जीपीएस सिस्टम को लांच किया था। 1995 आते-आते यह सिस्टम पूरी तरह से काम करने लगा। उसके बाद रूस ने 1982 में अपना नेवीगेशन सिस्टम 'ग्लोनास' (Glonass) लांच किया। उसके बाद यूरोप ने 2011 में अपना नेवीगेशन सिस्टम गैलीलियो (galileo) लांच किया।

अब 2018 में चीन ने अपना BDS यानी बायडू सिस्टम लांच किया है। बायडू का मतलब होता है बिग डिपर (Big Dipper)। बिग डिपर (Big Dipper) सितारों का समूह है जिसे हम हिंदी में 'सप्तऋषि' कहते हैं। अब यह नाम इस लिए चुना गया क्योंकि जब दुनिया में सैटेलाइट की सुविधा नहीं थी तब समुद्रों के नाविक सप्तऋषि सितारे को देख कर रास्ता पता लगाते थे।

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उस समय यह सितारे ही नेवीगेशन का काम करते थे। चीन को अपना नेवीगेशन सिस्टम लांच करने की जरूरत इस लिए पड़ी क्योंकि अभी दुनिया भर में अधिकतम देश अमेरिका से जीपीएस की सुविधा ले रहे हैं। चीन भी अमेरिका से सुविधा लेता रहा है लेकिन उसे डर है कि अमेरिका कभी भी इस सिस्टम को बंद कर सकता है। जिससे काफी नुकसान हो सकता है।

भारत के नेविगेशन सैटेलाइट 'नाविक की रेंज'।

जीपीएस क्या है

what is GPS? जीपीएस जिसका पूरा नाम Global Positioning System (GPS) है का इस्तेमाल नेवीगेशन के लिए यानी रास्ता ढूंढने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल हर उस चीज की स्थिति जानने के लिए किया जाता है जो इससे जुड़ा है। जैसे गाड़ियां, मोबाइल, विमान आदि चीजें।

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सबसे पहले इसे अमेरिकी सेना ने इसे अपने डिफेंस के लिए स्थापित किया था। लेकिन बाद में 27 अप्रैल 1995 को इसे सार्वजनिक कर दिया गया। जिसको आज सभी देश इस्तेमाल में लेते हैं। गूगल मैप के सहारे रास्ता खोजने के लिए भी हम जीपीएस इस्तेमाल करते हैं। या जब कोई चीज ऑर्डर करते हैं तब भी हम जीपीएस से पता करते हैं कि हमारा सामान कहां पहुंचा।

जीपीएस कैसे काम करता है

जीपीएस सैटालाइटों का एक पूरा समूह है। इसमें कमसे कम 50 सैटेलाइट होते हैं। जो पृथवी के चारो ओर फैले होते हैं। जीपीएस नेटवर्क जमीन पर लगातार भेजता रहता है। ठीक उसी तरह जैसे एक टॉर्च होता तो छोटा है। लेकिन रोशनी काफी बड़ी फैलाता है ।जीपीएस सैटेलाइट भी ठीक वैसे ही काम करता है।

वह अंतरिक्ष से जमीन पर सभी डिवाइस से जुड़ा रहता है। अब यह आखिर हमारे मोबाइल फोन से कैसे जुड़ता है? जब भी हम अपने मोबाइल से जीपीएस ऑन करते हैं तो हमारा मोबाइल 4 सैटेलाइट के साथ कनेक्ट होता है। चारो सैटेलाइट हमारे मोबाइल से अलग-अलग जानकारी लेते हैं और फिर हमारी एकदम सही लोकेशन देते हैं।

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सही लोकेशन हमारी स्पीड पर भी निर्भर करता है। कई बार ज्यादा तेज गाड़ी चलाते समय जीपीएस का संपर्क टूट जाता है। अब एक सवाल यह भी उठता है कि क्या चीन ने 50 सैटेलाइट लांच किया। तो ऐसा नहीं है। चीन ने एक ही दिन में इतने सैटेलाइट लांच नहीं किए हैं बल्कि एक-एक करके किया है।

जिसमें उसे कई साल लगे हैं। शुरुआत में उसने जब अपना नेवीगेशन सिस्टम लांच किया था तो वह बस चीन तक ही सीमित था। बाद में उसने कई और सैटेलाइट लांच किए जिसके बाद चीन का नेविगेशन सिस्टम भारत और पाकिस्तान समेत कई देशों तक पहुंच गया। अभी तक चीन ने 33 सैटेलाइट से अपना बायडू सिस्टम बनाया है। आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है।

अमेरिका की गद्दारी के कारण चीन लाया बेयडू (BeiDou)

अपना नेवीगेशन सिस्टम बायडू लाने के पीछे चीन का एक और डर था। वह था अमेरिका से गद्दारी का। जी हां। अमेरिका से गद्दारी हो सकती है इस डर से चीन ने अपना अलग नेविगेशन सिस्टम लांच किया। क्योंकि अमेरिका पहले गद्दारी कर चुका है, लेकिन चीन के साथ नहीं बल्कि भारत के साथ।
कारगिल युद्ध के दौरान जब घुसपैठिए एलओसी (LOC) पार करके भारत में आ गए थे तब भारत ने अमेरिका से मदद मांगी थी। भारत ने अमेरिका से कहा था कि सैटेलाइट में लगे कैमरों से फोटो खींच कर घुसपैठियों की लोकेशन बता दे। जिसके लिए अमेरिका ने साफ मना कर दिया था।
उस समय हमने युद्ध भी जीत लिया और अमेरिका के दोगलेपन का पता भी चल गया। जिसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ठान लिया कि भारत का अपना नेवीगेशन सिस्टम होना चाहिए। आखिर वैज्ञानिकों ने कई साल की मेहनत के बाद नाविक नेवीगेशन सिस्टम दिया।
अमेरिका ने भारत को युद्ध के दौरान मदद नहीं की थी यह देख कर चीन भी सतर्क हो गया। उन्हें इस बात का डर होने लगा कि अमेरिका कभी भी इस सिस्टम को चीन की जरूरत आने पर बंद कर सकता है।
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