Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

CBI बनाम CBI मामला/ हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सुनाई पड़ी गूंज

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच तकरार को लेकर पिछले करीब ढाई महीने तक कानूनी लड़ाई निचली अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक देखने को मिली।

CBI बनाम CBI मामला/ हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सुनाई पड़ी गूंज

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच तकरार को लेकर पिछले करीब ढाई महीने तक कानूनी लड़ाई निचली अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक देखने को मिली। वर्मा और अस्थाना ने न सिर्फ शीर्ष अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, बल्कि दोनों गुटों के कुछ अधिकारियों ने अपने खिलाफ कानूनी और विभागीय कार्रवाई के मद्देनजर राहत के लिये भी अदालतों का रूख किया।

हालांकि, सीबीआई में शीर्ष दो अधिकारियों के बीच तकरार में सबसे ज्यादा नुकसान डीएसपी देवेंद्र कुमार को उठाना पड़ा। उन्हें एजेंसी ने अस्थाना के खिलाफ रिश्वतखोरी के आरोपों के सिलसिले में 22 अक्टूबर को गिरफ्तार किया था।
सीबीआई के उनकी जमानत याचिका का विरोध नहीं करने पर उन्हें 31 अक्टूबर को जमानत मिल गई थी। कुमार अस्थाना की टीम में थे। यह टीम मांस निर्यातक मोइन कुरैशी और हैदराबाद के कारोबारी सतीश सना बाबू के खिलाफ एक मामले की जांच कर रही थी।
सना मामले में गवाह था, जिसने आरोप लगाया था कि डीएसपी उससे रिश्वत की मांग कर रहे थे और मांग पूरी नहीं होने पर आरोपी के तौर पर उसे फंसाने की धमकी दी थी। कुमार के अतिरिक्त इस मामले में एक बिचौलिये मनोज प्रसाद को गिरफ्तार किया गया था। उसे दो महीने जेल में गुजारने पड़े। उसके बाद 18 दिसंबर को जमानत मिल गई क्योंकि एजेंसी 60 दिन के भीतर उसके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने में विफल रही।
प्राथमिकी में सह आरोपी अस्थाना ने अपने खिलाफ मामले को निरस्त करवाने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उस मामले में फैसला सुरक्षित है। कुमार और प्रसाद ने भी अपने खिलाफ प्राथमिकी रद्द करवाने के लिये उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उनकी भी याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित है।
जहां वर्मा ने उनकी शक्तियां छीनकर छुट्टी पर भेजे जाने के सीवीसी और केंद्र के 23 अक्टूबर के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, वहीं उनके कुछ कनिष्ठ अधिकारियों ने भी अदालत का रुख किया था। इन अधिकारियों का भी रातोंरात तबादला कर दिया गया था। वरिष्ठ अधिकारियों में से एक डीआईजी एम के सिन्हा ने निराधार आरोप लगाए थे। इसके लिये उन्हें शीर्ष अदालत ने कड़ी फटकार लगाई थी।
अस्थाना के खिलाफ मामले में शुरूआती जांच अधिकारी ए के बस्सी थे और उन्होंने देवेंद्र कुमार को गिरफ्तार किया था। हालांकि, एम नागेश्वर राव के अंतरिम सीबीआई प्रमुख बनने के कुछ ही घंटे बाद बस्सी का जनहित में पोर्ट ब्लेयर तबादला कर दिया गया था। उन्होंने भी अपने तबादले के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
आईपीएस अधिकारी सिन्हा कथित भ्रष्टाचार के मामले में अस्थाना की भूमिका की जांच करने वाले दल का हिस्सा थे। उन्होंने नागपुर तबादला किये जाने के आदेश को निरस्त करवाने के लिये न्यायालय का रुख किया था।
उनके अलावा सीबीआई के अतिरिक्त एसपी एस एस गुर्म ने भी मामले में खुद को पक्षकार बनाने के लिये उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
उन्होंने आरोप लगाया था कि अस्थाना अदालत के समक्ष चुनिंदा तथ्य रखकर उसे गुमराह कर रहे हैं। गुर्म का दिल्ली से जबलपुर तबादला कर दिया गया था। बाद में शिकायतकर्ता सतीश बाबू सना ने भी उच्च न्यायालय का रुख करके अनुरोध किया था कि इस मामले में उन्हें भी सुना जाए।
Share it
Top