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बजट 2018-19: जेटली कर रहे हैं मोदी सरकार का 5वां बजट, जानिए क्या है आपके लिए खास

बजट 2018-19: वित्त मंत्री अरुण जेटली मोदी सरकार का पांचवा बजट ऐसे समय पेश कर रहे हैं, जब अगले आम चुनाव (मार्च-अप्रैल 2019) में चौदह महीने ही बचे हैं।

बजट 2018-19: जेटली कर रहे हैं मोदी सरकार का 5वां बजट, जानिए क्या है आपके लिए खास

वित्त मंत्री अरुण जेटली मोदी सरकार का पांचवा बजट ऐसे समय पेश कर रहे हैं, जब अगले आम चुनाव (मार्च-अप्रैल 2019) में चौदह महीने ही बचे हैं। उनकी कठिनाई यह है कि इस सरकार से हर वर्ग की अपेक्षाएं बेहिसाब हैं, जिन्हें पूरा करना बहुत बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल में साफ कर चुके हैं कि उनकी सरकार लोक लुभावन घोषणाओं में भरोसा नहीं करती है।

उनका इशारा पूर्ववर्ती सरकारों की तरफ था, जो चुनाव में लाभ उठाने के लिए ऐसी-ऐसी घोषणाएं करती थी, जिनसे खजाने का दम निकल जाता था और आने वाली सरकार को उसकी कीमत चुकानी पड़ती थी। सरकार के लिए तसल्ली की बात यही है कि करीब चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी आमतौर पर लोगों का भरोसा प्रधानमंत्री में बना हुआ है। ऐसा हाल में आए कई सर्वे बताते हैं।

2017 में सात राज्यों में चुनाव हुए हैं, जिनमें से छह में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनी हैं। यह तथ्य मोदी और जेटली को भले ही आश्वस्त करता हो परंतु उन्हें पता है कि आर्थिक सुधारों को जारी रखते हुए भी उन्हें कुछ क्षेत्रों की चिंता करनी ही है। समाज के कई ऐसे वर्ग हैं, जिनके कल्याण, विकास और खुशहाली के लिए कदम उठाना जरूरी है।

सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि वह हर साल एक करोड़ रोजगार मुहैया कराने का वादा पूरा करने में विफल रही है। किसानों की खुदकुशी का मसला संसद के भीतर और बाहर जेरे बहस रहता ही है। गांव-गरीब को लेकर जो चिंता पिछले बजटों में दिखाई दी थी, उसे मोदी सरकार के इस बजट में निश्चित रूप से आगे बढ़ाया जाएगा। आखिर सरकार को 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाने ही हैं।

पिछला बजट विमुद्रीकरण (नोटबंदी) की छत्रछाया में आया था। तब पेश किए गए आर्थिक सर्वे में कहा गया था कि इतने बड़े फैसले के चलते विकास की गति को थोड़ा सा झटका लग सकता है, जो बाद में लगा भी परंतु इतना असर नहीं हुआ कि अर्थव्यवस्था पटरी से ही उतर जाए। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और विकास की गति व आर्थिक स्थितियों पर निगाह रखने वाली एजेंसियों का भरोसा भारतीय अर्थव्यवस्था में बना रहा।

इसके तुरंत बाद मोदी सरकार ने आर्थिक सुधार का अब तक का सबसे बड़ा एक और फैसला किया, जीएसटी को लागू करने का। यह बजट जीएसटी लागू किए जाने के बाद आ रहा है। सर्वविदित है कि जीएसटी का अच्छा और बुरा असर अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई दिया है। खासकर व्यापारी वर्ग में इसे लागू करने के तौर-तरीकों को लेकर असंतोष देखा गया है तो उपभोक्ता बहुत सी रोजमर्रा की चीजों को अठारह और अठाईस प्रतिशत के स्लैब में रखे जाने से नाराज रहे हैं।

जीएसटी काउंसिल हालांकि इनमें से बहुत सी चीजों को निचले स्लैब में लाने का फैसला कर चुकी है परंतु कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल लगातार इस पर सरकार की घेराबंदी किए हुए हैं। गुजरात के हाल के चुनाव जीएसटी के साइड इफैक्ट जानने का मौका था और कहा जा सकता है कि मोदी सरकार भले ही कुछ कम अंकों के साथ, परंतु पास हो गई है।

विश्व की जितनी भी जानी-मानी वित्तीय एजेंसियां और आकलन करने वाली संस्थाएं हैं, उन सबने विमुद्रीकरण और जीएसटी लागू करने के मोदी सरकार के फैसले को साहसिक बताते हुए न केवल मुक्त कंठ से प्रशंसा की है वरन यह उम्मीद भी जताई है कि आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके बहुत शानदार प्रभाव देखने को मिलेंगे।

बहरहाल, यह तो भविष्य की बात है। आज की बात करें तो वित्त मंत्री मौजूदा मोदी सरकार का अंतिम पूर्ण बजट पेश करने वाले हैं और सबकी अटैची पर निगाहें उन पर टिकी हुई है कि उससे क्या निकलता है। प्रधानमंत्री के इस स्पष्टीकरण के बाद कि भले ही सामने चुनाव हैं, परंतु उनकी सरकार लोकलुभावनी घोषणाओं से परहेज करेगी, इसकी बहुत कम उम्मीद है कि वह चुनावी बजट प्रस्तुत करेंगे। हां, कुछ क्षेत्रों पर जरूर मोदी सरकार इस बार भी मेहरबान रहेगी।

जिस तरह पिछले बजट में खेती-किसान-गरीब पर खास तौर से ध्यान दिया गया था, उसे इस साल भी जारी रखा जाएगा। प्रधानमंत्री जानते हैं कि कृषि क्षेत्र पर ध्यान देने से जहां किसानों की दशा सुधारने में मदद मिलेगी, वहीं उनका 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प भी पूरा हो सकेगा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कृषि क्षेत्र में ही नए रोजगार सृजन की सर्वाधिक संभावना है।

गरीबों के लिए मोदी सरकार की पहले से ही उज्जवला और घर-घर बिजली पहुंचाने की योजनाएं चल रही हैं, जिसके तहत वह गरीबी की रेखा से नीचे के पांच करोड़ परिवारों में गैस कनेक्शन और चार करोड़ घरों में बिजली कनेक्शन देने के काम में लगे हैं। गरीबों के लिए इसी तरह की कोई और नई योजना सरकार ला सकती है। 2022 तक सबको घर देने की योजना पर भी काम हो रहा है।

बेरोजगार नौजवानों के खाली हाथों को काम देने के लिए हालांकि पहले से ही मुद्रा योजना के तहत उनकी सरकार ब्याजमुक्त ऋण उपलब्ध करा रही है। इस बजट में कौशल विकास को गति देने के लिए और उपायों का ऐलान हो सकता है। मध्य वर्ग, खासकर नौकरीपेशा की हर बजट से यही उम्मीद होती है कि उसके हाथ में कुछ रकम बची रहे। यानी इनकम टैक्स में कुछ छूट मिल जाए।

आर्थिक विशेषज्ञों का भी यही मानना रहा है कि यदि इस वर्ग को टैक्स स्लैब में राहत दी जाती है तो इससे जो रकम उनके हाथ में बचेगी वह अंततः घूम फिरकर बाजार में ही आएगी। इससे विकास दर बढ़ाने में मदद मिलेगी। पिछले बजट में जेटली ने अमीरों पर सरचार्ज लगाया था और गरीबों, किसानों को राहतें दी थीं। बुनियादी ढांचे के तेज विकास के लिए उपाय किए थे, जो अब रंग लाते हुए दिख भी रहे हैं।

चाहे सड़कों (हाईवे) का निर्माण हो या रेलवे लाइन के दोहरीकरण, विद्युतीकरण की योजनाए इन पर दोगुनी गति से काम हो रहा है, जिसने परोक्ष रूप से आर्थिक विकास दर को स्थिर बनाए रखने में अहम रोल अदा किया है। सरहदों पर और देश के भीतर के सुरक्षा खतरों को देखते हुए सरकारें हमेशा ही रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी करती आई हैं। पिछले रक्षा बजट में मोदी सरकार ने दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की थी और हमारा रक्षा बजट 2 लाख 74 हजार करोड़ हो गया था।

चीन, पाक से खतरे के मद्देनजर अपनी रक्षा-सुरक्षा तैयारियों को गति देने के लिए निश्चित ही वित्त मंत्री इसमें इस बार कुछ और बढोत्तरी करेंगे। जीएसटी लागू करने में आई दिक्कतों की वजह से व्यापारियों के एक वर्ग में काफी निराशा देखी गई है।

वित्त मंत्री की नजर में वह वर्ग जरूर होगा। इसके अलावा यह भी देखना होगा कि मोदी सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए परंपरागत तरीके अपनाती है अथवा इन पर फोकस करते हुए पिछली सरकारों और बजटों के उलट ज्यादा आवंटन करती है।

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