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भीमा कोरेगांव हिंसा: जातीय राजनीति बनी देश के लिए नासूर

भीमा कोरेगांव हिंसा ने ये साफ़ जाहिर कर दिया है कि जातीय राजनीति हमारे देश में नासूर बनती जा रही है। विभिन्न जातीयों को वोट बैंक के लिए लामबंद करना। उसे बहुत मामूली बात पर उकसाना।

भीमा कोरेगांव हिंसा: जातीय राजनीति बनी देश के लिए नासूर

जातीय राजनीति हमारे देश में नासूर बनती जा रही है। विभिन्न जातीयों को वोट बैंक के लिए लामबंद करना। उसे बहुत मामूली बात पर उकसाना। तिल का ताड़ बना देना। जाति विशेष को हिंसा के रास्ते पर धकेलना और उस पर घिनौनी राजनीति करके वोट जुटाने का जुगाड़ करना आज के कुछ नेताओं की प्रवृत्ति बनती जा रही है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

देश ने राजस्थान में हिंसक गूर्जर आंदोलन देखा है। हरियाणा में जाट आंदोलन को हिंसक होते देखा है। महाराष्ट्र में मराठों का सड़कों पर कूच देखा है, जिसमें लाखों की भीड़ थी परंतु उसने अनुशासित तरीके से खामोशी से अपनी बात सत्ता-प्रतिष्ठान तक पहुंचाई। पिछड़ों का उभार देखा है। दलितों के उत्पीड़न के सवाल पर उनकी अलग-अलग राज्यों में लामबंदी देखी है।

विभिन्न राज्यों में जातियों को सीढ़ी बनाकर किस तरह कुछ लोग विधानसभाओं और संसद तक पहुंचकर अपने निजी हितों को साधने की कोशिश करते हैं, यह भी देखा है। ऐसे-ऐसे सवाल उठाकर विभिन्न जातियों को आंदोलित किया जाता है, जो आमतौर पर व्यवहारिक और कानून सम्मत नहीं होते हैं। सत्तारूढ़ दल जब इस प्रकार के हिंसक-अहिंसक आंदोलन के दबाव में आकर उन मांगों को मानने के ऐलान कर देती हैं,

तो वह फैसले अक्सर कोर्ट कचहरी में नहीं टिक पाते। ऐसे में चीजें और पेचीदा होने लगती हैं। कई बार दूसरी जातियों के नेता किसी जाति विशेष के बारे में अनर्गल बातें करके समाज में एक अलग तरह का तनाव और टकराव पैदा कर देते हैं। आजकल मीडिया का फैलाव कुछ इतना हो गया है कि कोई कुछ भी कहे और करे, उसे बिना किसी काट-छांट के ज्यों का त्यों दिखा दिया जाता है।

समाज पर उसका किस तरह का प्रभाव पड़ेगा, इसकी चिंता तक नहीं की जाती और अक्सर इसके बुरे प्रभाव पड़ते हैं। हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, धारा 144 और कई बार कर्फ्यू तक की नौबत आ जाती है। आजकल एक नई प्रवृत्ति सरकारों में देखी जा रही है। कहीं जरा सा तनाव हो जाए या टकराव वगैरा हो जाए तो तुरंत इंटरनेट को बंद कर दिया जाता है।

यह इस नाम पर किया जाता है कि सोशल मीडिया के जरिए कुछ तत्व अफवाहें फैलाकर हालात को और बिगाड़ने की कोशिश कर सकते हैं परंतु ऐसा करने से कितने उपभोक्ताओं, नागरिकों, और कारोबारियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, इसका आकलन नहीं किया जाता। अफसोस की बात यह है कि कुछ समय पहले तक भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां जातीय हिंसा पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से परहेज करती थी परंतु इधर संसद,

विधानसभाओं के भीतर और बाहर वही बढ़-चढ़कर इसे हवा देने पर आमादा दिखती हैं। न्यूज चैनलों पर आयोजित बहसों का मकसद इस प्रवृत्ति की निंदा के बजाय इसे और तूल देने वाला दिखाई देता है। ऐसे लोगों को विचार रखने के लिए बुला लिया जाता है, जो अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और समझदारी के बजाय अक्सर उकसाने वाली बातें करके माहौल को और खराब कर जाते हैं।

भला किसी जाति का गौरव बसें जलाने, आगजनी, तोड़फोड़ करने, सड़कें-रेल मार्ग बाधित करने और मीडियाकर्मियों से बदसलूकी करने से कैसे बढ़ जाता है, यह समझ से बाहर की बात है। समय-समय पर जातियों के स्वाभिमान के नाम पर फैलाई जाने वाली हिंसा पर अदालतों का बहुत कड़ा रुख रहा है परंतु जब देश और प्रदेशों की अहम राजनीतिक पार्टियां ही इस तरह के हिंसक आंदोलनों को शह देती हुई पाई जाएं तो समझा जा सकता है कि इसे रोकना कितना चुनौतीपूर्ण है।

महाराष्ट्र के कुछ शहरों में पिछले तीन दिन से जो कुछ हो रहा है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके पीछे जो भी लोग अथवा संगठन हैं, उन्हें बेनकाब करना जरूरी है ताकि इस तरह की प्रवृत्ति को बढ़ने से रोका जा सके। यह सबके सोचने का विषय है कि चंद वोटों की खातिर राजनीतिक दल आखिर समाज और देश का कितना नुकसान करेंगे। अगर इसी तरह जातियों और सम्प्रदायों को लड़ाया जाता रहा तो किस तरह का देश बनेगा, इस पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।

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