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भीमा कोरेगांव विवाद : सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अमित शाह ने किया स्वागत, जानें पूरा मामला

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि वह शहरी नक्सली मामले पर अपना रूख साफ करे।

भीमा कोरेगांव विवाद : सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अमित शाह ने किया स्वागत, जानें पूरा मामला
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महाराष्ट्र पुलिस द्वारा कोरेगांव-भीमा मामले में कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को चुनौती देने, उनकी तुरंत रिहाई और जांच के लिए एसआईटी के गठन के लिये दायर याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसमें हस्तक्षेप करने और एसआईटी के गठन दोनों से इनकार कर दिया।
वहीं इस फैसले के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि वह शहरी नक्सली मामले पर अपना रुख साफ करे। इसके अलावा पीठ ने कार्यकर्ताओं की नजरबंदी चार सप्ताह के लिए बढ़ा दी है। कोरेगांव-भीमा हिंसा और उसके बाद के घटनाक्रम कुछ इस प्रकार हैं।

जानें कब हुई क्या कार्रवाई

31 दिसंबर, 2017 को कोरेगांव-भीमा युद्ध की 200वीं वर्षगांठ के अवसर पर पुणे के पास शनिवाड़ा में एक गोष्ठी ऐलगार परिषद का आयोजन गया। उसके बाद एक जनवरी, 2018 को कोरेगांव-भीमा के निकट सणसवाडी के पास दो समूहों के बीच जातीय हिंसा में एक व्यक्ति की मौत।
जिसे बाद पूरे राज्य में दलितों का प्रदर्शन हुआ। छह जून, 2018 को पुणे पुलिस ने दलित कार्यकर्ता सुधीर धावले, नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के संकाय प्रमुख शोमा सेन, कार्यकर्ता महेश राउत और राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए काम करने वाली समिति से जुड़ी केरल निवासी रोना विल्सन को गिरफ्तार किया।
जिसके बाद 28 अगस्त, 2018 को महाराष्ट्र पुलिस ने तेलगू कवि वरवर राव को हैदराबाद, कार्यकर्ताओं वेर्नन गोंसाल्वेस और अरूण फरेरा को मुंबई से, श्रमिक संघ कार्यकर्ता सुधार भारद्वाज को फरीदाबाद से और अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को दिल्ली से गिरफ्तार किया। नवलखा ने अपनी गिरफ्तारी को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने माओवादियों के साथ संबंध के आरोप में गिरफ्तार नवलखा के अगले दिन सुनवाई होने तक दिल्ली से बाहर ले जाने पर रोक लगायी। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने भारद्वाज कर ट्रांजिट रिमांड पर रोक लगाई ।
फिर 29 अगस्त 2018 को महाराष्ट्र पुलिस ने प्राथमिकी सहित सभी दस्तावेजों की मराठी से अंग्रेजी में अनुदित प्रति दिल्ली उच्च न्यायालय में नवलखा के अधिवक्ता को सौंपी।
इतिहासकार रोमिला थापर और चार अन्य कार्यकर्ताओं ने पांच कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनकी तुरंत रिहाई और एसआईटी जांच की मांग की। न्यायालय ने सभी कार्यकर्ताओं को 6 सितंबर तक नजरबंद रखने को कहा गया।
उसके बाद 30 अगस्त 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत का आदेश आने तक नवलवा की गिरफ्तारी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई नहीं करने का निर्णय लिया।
पांच सितंबर 2018 महाराष्ट्र सरकार ने न्यायालय में दावा किया कि कार्यकर्ताओं को उनके असहमति वाले विचारों के कारण गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के साथ संबंध के पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया गया है। 6 सितंबर, 2018 न्यायालय ने कार्यकर्ताओं के नजरबंदी की अवधि 12 सितंबर तक बढ़ाई।
इसके बाद 12 सितंबर 2018 को सुनवाई के दौरान न्यायालय नजरबंदी की अवधि 19 सितंबर तक बढ़ाई। 17 सितंबर, 2018 न्यायालय ने कार्यकर्ताओं की नजरबंदी की अवधि 19 सितंबर तक बढ़ाते हुए कहा कि वह विचार करेगी कि इनकी गिरफ्तारी के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य है या नहीं।
फिर न्यायालय ने नजरबंदी की अवधि 20 सितंबर तक करते हुए कहा कि गिरफ्तारी पर पैनी नजर से विचार करेगी। 20 सितंबर, 2018 को न्यायालय ने याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा।
28 सितंबर, 2018 को न्यायालय ने 2:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि वह गिरफ्तारी में हस्तक्षेप नहीं करेगा और जांच के लिए एसआईटी के गठन से भी इंकार किया।

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