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लोकसभा चुनाव 2019: भाजपा की छवि गढ़ते अमित शाह ने रचा ये चक्रव्यूह, नहीं भेद पाएगा विपक्ष का महागठबंधन

लोकसभा चुनाव 2019 की रणभेरी भले ही औपचारिक रूप से अभी नहीं बजी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने ढंग से तैयारियां शुरू कर दी हैं। अमित शाह भारतीय जनता पार्टी को उबारने के लिए जनता के बीच संदेश लेकर जार रहे हैं।

लोकसभा चुनाव 2019: भाजपा की छवि गढ़ते अमित शाह ने रचा ये चक्रव्यूह, नहीं भेद पाएगा विपक्ष का महागठबंधन
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लोकसभा चुनाव 2019 की रणभेरी भले ही औपचारिक रूप से अभी नहीं बजी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने ढंग से तैयारियां शुरू कर दी हैं। आजादी के बाद 71 साल के इतिहास को देखें तो चुनावी तैयारियां एक जैसी ही होती रही हैं। सत्ताधारी दल अपने कार्यों का गुणगान करते रहे हैं तो विपक्षी दल उसकी बखिया उधेड़ते रहे हैं।

इसके साथ ही दोनों अपने पारंपरिक मतदाता समूह को बचाए रखने की कोशिश करते रहे हैं, वहीं नए लक्षित मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करते रहे हैं। कहना न होगा कि इस बार भी देश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों की तरफ से ऐसा ही हो रहा है।

भाजपा ने इससे अलग भी राह अख्तियार की है। गरीबों और किसानों की बात करने वाले देश में भाजपा का यह नवाचार एक तरह से जोखिम लेने जैसा ही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ‘संपर्क से समर्थन' अभियान पर निकल पड़े हैं।

जिस समय अमित शाह मुंबई में मशहूर उद्योगपति रतन टाटा और फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित से मिल रहे थे, ठीक उसी वक्त उनके विरोधी कांग्रेस अध्यक्ष मध्य प्रदेश के मंदसौर के किसानों से मिल रहे थे। जैसा कि अक्सर होता है,

सत्ताधारी राजनीतिक दलों की मुलाकातों का छिद्रान्वेषण होता है, शाह के कदमों की भी बखिया उधेड़ी जानी शुरू हो चुकी है। वहीं राहुल गांधी के कदमों को तारीफ भरे सुर मिल रहे हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया से कुछ सवाल उठते हैं।

बेशक सरकार चलाने की वजह से सत्ताधारी दल की जवाबदेही ज्यादा होती है। उस पर दुनिया की निगाह होती है। वहीं विपक्ष इस हमले से बच निकलता है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम से कुछ सवाल जरूर उठते हैं।

सवाल यह कि आखिर अमित शाह जैसे नायाब विचार देश की सबसे पुरानी पार्टी के नेता या उसके सलाहकार क्यों नहीं ला पाते, ताकि जनता उनके साथ जुड़ सके। याद कीजिए, 2012-13 को, तब राहुल गांधी ने अचानक से दलित बस्तियों का दौरा करना शुरू कर दिया था,

रात को खेत-खलिहान में दलितों के घर जाकर खाने-पीने लगे थे और इस तरह से वे दलितों से जुड़ने और अपनी पार्टी के तरफ उन्हें खींचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पहले 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को खास फायदा नहीं हुआ,

2018 के विधानसभा चुनावों में वह उत्तर प्रदेश में दहाई से इकाई के अंकों पर पहुंच गई और इसी तरह 2014 के लोकसभा चुनावों में भी पार्टी सिमट गई। दलित उससे जुड़े नहीं। हालांकि उनका आइडिया अलग था।

आखिर इतने सारे कदमों के बावजूद दलित कांग्रेस से क्यों नहीं जुड़ पाए। इस सवाल का जवाब उसका लंबे वक्त तक सत्ता में रहना है और उसके बावजूद दलितों की हालत में बहुत बदलाव न हो पाना है।

बदलाव तो दलितों और पिछड़ों की बात करने वाली पार्टियों के राज में भी बहुत नहीं हुआ, सिवा इसके कि माया और मुलायम जैसे लोगों ने उनमें राजनीतिक चेतना पैदा की, लेकिन यह जागरूकता उनके सामुदायिक विकास के लिए बड़ा सोपान नहीं साबित हो पाई।

इसका असर यह हुआ कि यह समुदाय ठीक अल्पसंख्यक समुदायों की तरह थोक वोट का बैंक मात्र बनकर रह गया। इन संदर्भों में देखें तो अमित शाह का संपर्क से समर्थन अभियान नायाब है और वह लोगों से जुड़ने की अलग कोशिश नजर आता है।

चूंकि वे सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष और अपने देश की राजनीति में गरीबों और किसानों की दुहाई देना राजनीतिक फैशन है, लिहाजा शाह की माधुरी दीक्षित या लता मंगेशकर जैसों से मुलाकात को बुजुर्ग मानसिकता की तरह देखा जा रहा है।

जिस देश में संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक अब भी 12.5 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे गुजर करने को मजबूर हो, उसकी सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष की संभ्रांत लोगों से मुलाकात पर सवाल उठेंगे ही,

लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा की तरफ से दलित बस्तियों में जाकर उनके साथ संपर्क करने, उनके साथ खाने-पीने का अभियान लंबे समय तक चलता रहा है। उज्जैन के कुंभ में तो खुद अमित शाह दलितों के साथ स्नान कर चुके हैं।

अमित शाह की नई कोशिश का यह मतलब नहीं है कि भाजपा दलितों-पिछड़ों से अलग जा रही है। गांधी ने बेशक सत्ता को सेवा के साधन के तौर पर स्वीकार नहीं किया हो, लेकिन वे भी मानते थे कि बिना स्वायत्त सत्ता के विकास नहीं किया जा सकता।

मौजूदा दौर में यह सोच कुछ और आगे बढ़ गई है। अब सत्ता ही सेवा का माध्यम बन चुकी है, इसलिए सत्ता, राजनीतिक साध्य भी बन गई है, इसलिए देश का हर दल आज सत्ता में आने की कोशिश में ही लगा रहता है या फिर सत्ता में है तो उसे बचाए रखने की कवायद में जुटा रहता है।

इसके चलते आज पूरी राजनीतिक हलचलें सत्ता केंद्रित हो चुकी हैं। एक नेता ने कहा था कि हम चुनाव लड़ते हैं, हारते हैं या जीतते हैं और फिर अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाते हैं। अमित शाह अगर माधुरी दीक्षित से मिल रहे हैं या रतन टाटा से मुलाकात कर रहे हैं

तो दरअसल वे नया काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि राजनीतिक तंत्र के लिए जरूरी बन चुकी कवायद को ही अपने नवाचार के जरिए आगे बढ़ा रहे हैं। जिसकी शुरुआत उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख दलवीर सिंह सुहाग और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप से मुलाकात के साथ की थी।

अमित शाह ने बेशक ऐसे लोगों से मुलाकात की है, जो गरीबों और असहायों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, लेकिन उनसे मुलाकात दुनिया, मीडिया और जनता का ध्यान जरूर खींचती है। इसकी वजह से आम संदेश यह जाता है कि पार्टी का नेता समाज के हर वर्ग के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहा है।

दलवीर सिंह सुहाग की छवि देश की सीमाओं की हिफाजत करने वाले की है तो सुभाष कश्यप को लोग संवैधानिक आचार संहिता के जानकार के तौर पर देखते हैं। रतन टाटा की छवि एक ऐसे उद्योगपति की है, जो बेईमानी से दूर देश हित में औद्योगिक कदम उठाता है।

लता मंगेशकर दलित हों या सवर्ण, गरीब हों या फिर ताकतवर, सबकी आदरणीय हैं। उनके कंठ से निकले बोल सबको एक समान रिझाते रहे हैं। माधुरी नौजवान दिलों की धड़कन रही हैं, जिसमें दलित, सवर्ण, कमजोर, ताकतवर सब वर्ग के युवा शामिल हैं।

अमित शाह की इन मुलाकातों से एक संदेश यह भी जा रहा है कि वे सत्ताधारी पार्टी के ऐसे अगुआ हैं, जिन्हें सहजता से किसी से मिलने से गुरेज नहीं है। अमित शाह की सामान्य छवि कठोर शख्सियत वाली है,

लेकिन याद कीजिए 26 मई 2014 को, मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के दौरान पीछे बैठे मुलायम सिंह यादव को खुद पकड़कर आगे ले जाते हुए वे दिखे थे। अमित शाह दरअसल उस छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं,

जो उनके लिए गढ़ी गई है, जिससे पार्टी को नुकसान हो सकता है। अब वे पार्टी को इससे उबारने की कोशिश में हैं, ताकि जनता के बीच भाजपा को लेकर संदेश जाए कि वह आम और खास सबके लिए सहज है और उस सहजता को एक और मौका मिलना चाहिए।

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