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कर्नाटक में चल रहा सियासी नाटक, बोम्मई केस के आधार पर भाजपा बनाएगी सरकार!

बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट आदेश दे चुका है कि बहुमत का फैसला राजनिवास में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए। आमतौर पर राज्यपाल इस निर्देश का पालन करते हुए सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता देते आए हैं। इस आधार पर भाजपा को मौका मिल सकता है। दूसरा विकल्प उनके पास चुनाव बाद बने नए गठबंधन को सरकार बनाने का मौका देने का है।

कर्नाटक में चल रहा सियासी नाटक, बोम्मई केस के आधार पर भाजपा बनाएगी सरकार!
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कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं। यहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत तो नहीं मिला है, एक्जिट पोल में जैसे अनुमान लगाए गए थे, लेकिन जनादेश स्पष्ट रूप से भाजपा के पक्ष में है और सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ है। इस विस चुनाव में कांग्रेस ने जनता में अपना विश्वास खो दिया है। सूबे में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है औह बहुमत के नजदीक है।

भाजपा का वोट प्रतिशत भी बढ़ा है और सीट भी दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है। भाजपा को 2013 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में 40 सीटें मिली थीं, इस बार कांटा सौ से ऊपर है। राज्य में भाजपा के सबसे बडी पार्टी बनकर उभरने से साफ है कि जनता ने कांग्रेस को नकार दिया है। 2013 में कर्नाटक की कुल 224 विस सीटों में से कांग्रेस को 122 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार वह 80 से भी नीचे चली गई है।

इसका मलतब स्पष्ट है कि कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस के खिलाफ जनादेश दिया है। तीसरी बड़ी पार्टी के रूप में पूर्व पीएम एचडी देवेगोड़ा की पार्टी जनता दल सेकुलर (जेडीएस) उभरी है, जिसे भी 40 से कम सीटें मिली हैं। सीटों के गणित का यही संदेश है कि कर्नाटक ने भाजपा में अपना विश्वास जताया है। लेकिन कांग्रेस जिस तरह बैक डोर से जेडीएस के साथ सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रही है,

वह उसकी लगातार पराजय की खीझ भी दिखाती है और वह जनादेश के साथ खिलवाड़ भी कर रही है, जबकि दोनों दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े हैं। हाल के वर्षों में देखा जा रहा है कि देश में येनकेन प्रकारेण सरकार बना लेने का चलन बढ़ा है। लोकतंत्र में यह चलन जनादेश के विरुद्ध है। मणिपुर और गोवा के बाद अब कर्नाटक में जनादेश के उलट आंकड़ों के सहारे सरकार बनाने की कोशिश हो रही है।

देश में लोकतंत्र की भलाई के लिए जनादेश का सम्मान करने की आवश्यकता है। हालांकि सरकार बनाने का दावा भाजपा और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन दोनों ने किया है। भाजपा ने जहां सबसे बड़ी पार्टी होने के आधार पर दावा पेश किया है, वहीं कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने बहुमत होने के आधार पर दावा पेश किया है। कर्नाटक में अब गेंद राज्यपाल वजूभाई वाला के पाले में है।

इससे पहले सबसे बड़ी पार्टी को भी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जा चुका है और चुनाव पूर्व व चुनाव बाद सबसे बड़े गठबंधन को भी। राज्यपाल के समक्ष सभी तरह के उदाहरण हैं। कर्नाटक के ही पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार का एक अहम मामला कर्नाटक के संदर्भ में एक नजीर बन सकता है। बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट आदेश दे चुका है कि बहुमत का फैसला राजनिवास में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए।

आमतौर पर राज्यपाल इस निर्देश का पालन करते हुए सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता देते आए हैं। इस आधार पर भाजपा को मौका मिल सकता है। दूसरा विकल्प उनके पास चुनाव बाद बने नए गठबंधन को सरकार बनाने का मौका देने का है। हाल में गोवा, मेघालय और मणिपुर विधानसभा चुनाव में ऐसा हो चुका है, जब सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद चुनाव बाद बने गठबंधन को सरकार बनाने के न्योता मिला था।

इस आधार पर जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन को मौका मिल सकता है। राज्यपाल क्या फैसला करते हैं या तो आने वाले एक दो दिन में पता चलेगा, लेकिन उन्हें ऐसा फैसला करना चाहिए, जिसमें जनादेश का सम्मान हो रहा हो। लोकतंत्र में पीछे अगर कुछ गलत हुआ है तो वह नजीर नहीं बन सकता है। हमें हमेशा सुधार की तरफ देखना चाहिए।

कर्नाटक में सरकार किसी की भी बने, लेकिन इस चुनाव ने साबित किया है कि चार साल बाद भी पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है और भाजपा का विजयरथ जारी है। 2019 में भाजपा, राजग के सामने कोई चुनौती नहीं है। इसके विपरीत राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कर्नाटक में पहला चुनाव था, वे यहां भी हार का सिलसिला नहीं रोक पाए।

अब राहुल के खाते में 26 से अधिक चुनाव हो चुके हैं, जिनमें कांग्रेस को हार मिली है। इस नतीजे के बाद विपक्षी खेमे में राहुल के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा है और 2019 की कांग्रेस की राह और मुश्किल हो गई है। इस नतीजे ने फेडरल फ्रंट जैसी तीसरे विकल्प की संभावना को भी धूमिल कर दिया है।

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