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भारत बंद: जानिए पेट्रोल-डीजल की कीमत के चार हिस्से किस-किस में बंटते हैं

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से कांग्रेस ने जो भारत बंद का ऐलान किया है। उसका असर देश भर में देखने को मिल रहा है।

भारत बंद: जानिए पेट्रोल-डीजल की कीमत के चार हिस्से किस-किस में बंटते हैं
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10 सितंबर 2018 सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने भारत बंद की घोषणा, पेट्रोल, डीजल के लगातार महंगे होते जाने के खिलाफ है। विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस का यह जिम्मा है कि वह उस मुद्दे को उछाले, जो सरकार के लिए परेशानी का सबब बने। पर तथ्य यह बताते हैं कि पेट्रोल-डीजल के जो भाव हाल में बढ़े हैं, उसमें सरकार की नहीं, अंतरराष्ट्रीय कारकों की भूमिका है।

कच्चे तेल के भाव हाल के वक्त में तेजी से ऊपर गए हैं। कच्चे तेल के भावों में सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं काम करता, राजनीति भी काम करती है। आर्गनाइजेशन आफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज यान तेल निर्यातक देशों के संगठनों की राजनीति भी इस उठापटक के लिए जिम्मेदार है। एक समय में कच्चे तेल के भाव करीब 60 डालर प्रति बैरल तक गए थे, अब यह अस्सी डालर प्रति बैरल के करीब जाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

ओपेक चाहेगा कि यह भाव लगातार ऊपर चढ़ें, तेल आयातक देश चाहेंगे कि कच्चे तेल के भाव लगातार नीचे आएं। भारत सरकार इसमें कुछ ज्यादा नहीं कर सकती। भारत सरकार यह कर सकती है कि वह तेल आयात के अपने स्त्रोतों को लगातार बढ़ाए ताकि किसी एक देश या संगठन पर उसकी निर्भरता न्यूनतम हो। हाल के समय के कच्चे तेल के भावों में लगातार तेजी की वजह यह है कि तेल उत्पादक देशों में समस्याएं चल रही हैं।

महत्वपूर्ण तेल उत्पादक वेनेजुएला गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है। महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध ठोंक रखे हैं। ईरान पर प्रतिबंध का मतलब है कि ईरान का कच्चा तेल बाजार में बिकने के लिए आसानी से न आ पाएगा। कोई भी आपूर्ति बाधित होने का मतलब यह है कि कीमतें ऊपर का रुख करेंगी। कच्चे तेल के बाजार में यही हो रहा है।

भारत में चूंकि उपभोक्ता कीमतों पेट्रोल और डीजल की ग्लोबल कीमतों से जुड़ी हैं, इसलिए उनके भाव भी लगातार बढ़ रहे हैं। पेट्रोल और डीजल की जो कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उसके मोटे तौर पर चार हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा लागत यानी जिस पेट्रोल की लागत, दूसरा हिस्सा केंद्र सरकार का हिस्सा यानी केंद्र सरकार द्वारा लिया जाने वाला कर, तीसरा हिस्सा राज्य सरकार द्वारा लिया जाने वाला कर।

चौथा हिस्सा डीलर का कमीशन यानी जिस पेट्रोल पंप से पेट्रोल लिया जा रहा है, उसका हिस्सा। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली में पेट्रोल के भाव लगभग अस्सी रुपये प्रति लीटर हैं तो इसमें से लागत का हिस्सा 38 रुपये 47 पैसे माना जाए। केंद्र सरकार अपना कर करीब 20 रुपये 72 पैसे ले जाती है। राज्य सरकार अपना हिस्सा करीब 17 रुपये ले जाती है। करीब तीन रुपये 84 पैसे डीलर का कमीशन हो जाता है।

मोटे तौर पर माना जा सकता है कि हम बतौर उपभोक्ता जो कीमत दे रहे हैं डीजल का या पेट्रोल की, उसका करीब आधा हिस्सा राज्य और केंद्र सरकार बतौर कर ले जाती हैं। केंद्र या राज्य सरकार अगर अपने करों में कटौती को तैयार होती हैं, तो इसका एक मतलब यह है कि राज्य सरकारों के अपने संसाधन कम होंगे। इस बात के लिए आम तौर पर राज्य सरकारें तैयार नहीं होती हैं।

तो कुल मिलाकर मसला यह आ जाता है कि बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उपभोक्ता को ही उठाना होता है। समझने की बात यह है कि पेट्रोल और डीजल की कीमत लगभग हर आइटम में समाहित होती है क्योंकि परिवहन लागत लगभग हर आइटम में शामिल होती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का एक आशय यह है कि तमाम दूसरी वस्तुएं भी महंगी होंगी।

स्मार्टफोन बाजार की सबसे बड़ी कंपनी ने घोषणा की है कि उसके कई फोनों की कीमतों में इजाफा हो जाएगा। गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं जैसे टूथपेस्ट, साबुन, वाशिंग पाउडर बनाने वाली कई कंपनियों ने संकेत दिए हैं कि कई आइटमों की कीमत में बढ़ोत्तरी हो सकती है। तमाम अनिश्चितताओं के चलते डालर के मुकाबले गिरता भारतीय रुपया भी सरकार के लिए परेशानियां पेश कर रहा है।

एक डालर के बदले 71-72 रुपये तक मिलने लगे, इसे रुपये की ऐतिहासिक नीचाई कह सकते हैं। यानी एक डालर के मुकाबले ज्यादा खड़ा करने के लिए ज्यादा रुपयों की दरकार होगी। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में भीषण उठापटक मची हुई है। तुर्की की मुद्रा लीरा की गिरावट के चलते अनिश्चितता पैदा हो गई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा होती है, उसका एक परिणाम यह होता कि डालर मजबूत हो जाता है।

डालर के मुकाबले रुपया जनवरी से अब तक करीब दस प्रतिशत गिर चुका है। इसका मतलब यह हुआ कि जिन आइटमों का भुगतान भारत को डालर की शक्ल में करना होता है, उनके लिए ज्यादा खर्च करने होंगे। यानी कुल मिलाकर आयात महंगे होंगे। भारत कच्चे तेल के आयात में बहुत डालर खर्च करता है कच्चा तेल महंगा होगा तो देश में तेल से जुड़े तमाम उत्पाद महंगे होंगे।

लैपटाप, मोबाइल के बड़े हिस्से आयात होते हैं यानी लैपटाप और मोबाइल भी महंगे होंगे। हां निर्यातकों का बहुत फायदा होगा, 100 डालर का निर्यात करके निर्यातक पहले 6400 रुपये कमाता था, अब बैठे बिठाये उसे 7200 रुपये मिल जायेंगे। पर कुल मिलाकर निर्यातकों का फायदा होगा पर समूची अर्थव्यवस्था निर्यातक नहीं है। महंगाई का दंश अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ेगा।

गिरते रुपये को संभालने का एक तरीका यह है कि रिजर्व बैंक बाजार में डालर डाले यानी डालर की आपूर्ति बढ़ाये। पर डालर बाजार में डालने का एक आशय यह भी है कि भारत के विदेशी मुद्रा कोष के डालर भंडार में कमी होगी। 17 अगस्त 2018 को विदेशी मुद्रा कोष करीब 400 अरब डालर पर था। रिजर्व बैंक बाजार में डालर की आपूर्ति बढ़ा तो सकता है पर इससे उसका अपना विदेशी मुद्रा कोष गिरता है।

अंतत निर्यात को बढ़ना होगा और आयात को नियंत्रित करना होगा। सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। राज्य सरकारों के हाथ भी बंधे हुए हैं। केंद्र और राज्य सरकारें अपने अपने हिस्से के कर पेट्रोल और डीजल पर कुछ कम करके संदेश दे सकती हैं कि उन्हे महंगाई के मसले पर उपभोक्ता की चिंता है। देर सवेर सरकारों को ऐसा ही करना होगा। वरना संदेश यह जायेगा कि सरकार चिंता नहीं कर रही है।

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