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व्यंग्य: आस्तीन के दोस्त

मुझ नासमझ को उन्होंने दसवीं के सरकारी स्कूल के बच्चे की तरह समझाते कहा ,‘ यार! पाजामे में आस्तीन के दोस्त घुस गए हैं।

व्यंग्य: आस्तीन के दोस्त
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मुझ नासमझ को उन्होंने दसवीं के सरकारी स्कूल के बच्चे की तरह समझाते कहा ,‘ यार! पाजामे में आस्तीन के दोस्त घुस गए हैं। इतना तो पता चल रहा है कि वे आस्तीन में ही हैं, पर हैं किस ओर, यह पता नहीं चल रहा ’, वे मेरे पाजामे को घूरने लगे तो मुझे अपने पाजामे के भीतर भी कुछ सरसराहट सी महसूस हुई। ‘ पर दोस्त! आस्तीन में दोस्त नहीं, सदियों से सांप रहते आए हैं।

दोस्तों की जगह दिल में होती है, आस्तीनों में नहीं। तुम कहो तो अपना दिल चीर कर दिखा दूं कि मेरा दिल दोस्तों से किस तरह लबालब भरा है,’ मैंने उनके बेस्वाद जीवन में स्वाद लाने की कोषिष करते उनके मुंह से फुफकारने वाले मुहावरे को तनिक ठीक करने की कोशिश की तो वे खजियाते बोले,‘ आस्तीन में सांप रहा करते थे जब रहा करते थे दोस्त! आज सांप आस्तीन में नहीं रहते।

क्योंकि अब उनकी जगह दोस्तों ने हथिया ली है। पर रहने दे, अपने को भ्रम में ही रख। जीने के लिए बेहतर रहेगा। कभी कभी भ्रम में जीना भी आनंद देता है। पर मेरी एक बात याद रखना, दोस्तों को लेकर जब भ्रम टूटते हैं न तो मत पूछ क्या होता है। इसलिए मत चीर अपना दिल! बहुत पीड़ा होगी जब उसमें से दोस्त के बदले गोश्त भी न निकलेगा,’ कह वे व्यास हुए तो मैं परेशान! अरे दोस्तों को आस्तीन में रहने की क्या जरूरत भला?

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सांपों की जगह दोस्त कब से लेने लगे? दोस्त दोस्त होता है , सांप सांप। दोस्त सांप की जगह नहीं ले सकता। भले ही सांप दोस्त हो जाए, तो हो जाए। अभी मैं सोच ही रहा था कि अचानक मेरे आस्तीन में कुछ कुलबुलाने लगा। धीरे धीरे और कुलबुलाहट महसूस हुई। मेरी परेशानी देख वे मुस्कुराते बोले,‘ क्या बात है? क्यों खुजला रहे हो?’ ‘लग रहा है मेरी आस्तीन में भी कोई है,’मैंने दुविधा में डूबते उतरते कहा तो वे वैसे ही मुस्कुराते बोले,‘ क्या हो सकता है?

कम से कम सांप तो नहीं हो सकता। लगे शर्त?’ ‘ नहीं, सांप ही होगा। मेरे दोस्त मेरे दिल में रहते हैं। वे मेरे दोस्त होने के चलते मेरा बुरा कदापि नहीं कर सकते। मुझे अपने दोस्तों पर खुदा से अधिक विश्वास है,’ मैंने आस्तीन के आगे सगर्व खड़े होते कहा तो वे बोले,‘ मत इतना गरूर कर अपने दोस्तों पर? यहां जब भी किसी का गरूर तोड़ा है तो दोस्तों ने ही तोड़ा है। आज का दोस्त अपने अहं के चलते कुछ भी कर सकता है।

अपने स्वार्थ के लिए उसकी करनी और कथनी में दिनरात का नहीं, दिनोंरातों का अंतर हो गया है।’‘ मतलब??’ ‘चल देख मेरे सामने, आस्तीन में क्या खा रहा है तुमने?’ मैंने चोरी से देखा तो सच्ची को मेरा खास दोस्त मेरी आस्तीन में छुपकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था। मेरी मुस्कुराहटें सरका रहा था। मेरा दोस्त होने के चलते अपने बौने कद को बेकार में ऊंचा उठाने के गिचपिचे अहं में मुझे धीरे धीरे गिरा रहा था।

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मैंने महसूसा तो मेरा चेहरा फक्क! उस वक्त चाहकर भी आस्तीन का दोस्त न आस्तीन से निकालते बन रहा था न रखते। एकाएक दोस्त हाथ झाड़ता आस्तीन से मुस्कुराता निकला और मेरे गले ऐसे लगा ज्यों वह मेरी आस्तीन से नहीं अपितु मेरे दिल से निकला हो तो उसे देख झाड़ियों में दुबके सांपों के जोड़े में से एक ने दूसरे के कान में पलटियां खाते कहा,‘ ले मेरे दोस्त! अब आदमी की आस्तीन भी गई।‘

अच्छा ही हुआ। अब हम मुहावरा फ्री तो हुए मेरे दोस्त! बेकार में युगों से बदनाम हो रहे थे। अब इस बदनामी से मुक्ति तो मिली। कम्बख्त आस्तीन में रह कोई रहा था और उसकी सारी करनी सिर हमारे,’ दूसरे सांप ने भगवान को हाथ जोड़ते चैन की मुस्कुराती सांस ली और अपने दोस्त के बार-बार गले लगता रहा।’

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