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चुनावी व्यंग्य : ये पांव हमें दे दे ठाकुर...

वे तीन जने थे। चुनावी टाइम के नेता टाइप के। एक के हाथ में प्लास्टिक का फटा तसला था तो दूसरे के हाथों में सड़े पानी का जग। तीसरे ने कांधे पर मैला कुचैला तौलिया लटकाया था।

चुनावी व्यंग्य : ये पांव हमें दे दे ठाकुर...
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वे तीन जने थे। चुनावी टाइम के नेता टाइप के। एक के हाथ में प्लास्टिक का फटा तसला था तो दूसरे के हाथों में सड़े पानी का जग। तीसरे ने कांधे पर मैला कुचैला तौलिया लटकाया था। तीनों एक स्वर में बकिया रहे थे,‘पांव धुलवा लो!

फटे गंदे पांव धुलवा लो! पांव धुलवा हमारी नैया पार लगवा दो। उन्हें देखकर साफ लग रहा था कि वे चुनावी फायदे के लिए खास किस्म के पांव धुलवाने निकले थे ताकि उनके धुलवाए पांवों पर कालिख फेर सकें।

मेरे सामने आते ही पहले ने मेरे पांवों की ओर ताकते सानुनय पूछा कि कहो दोस्त! तुम्हारे पांव किसके पांव हैं? ‘मेरे पांव केवल मेरे हैं।’ मैंने उन तीनों से फटे जूतों में अपने पांव छिपाते कहा तो दूसरे ने पानी का जग संभालते पूछा, ‘क्या करते हो? सफाई करते हो?’ तो मैंने दोनों हाथ जोड़ कहा,‘बंधु! सफाई करने का मौका मुझे आज तक मिला ही कहां? ऊपर वाले साफ करने को कुछ छोड़ते ही नहीं।

मैं तो अब बस और तो सब कुछ करता हूं पर कम से कम हाथ पांव को लेकर राजनीति नहीं करता।’ मैंने सच कहा तो तीसरा कांधे पर रखा तौलिया संभालता बोला कि हो ही नहीं सकता! लगे शर्त। क्यों? पर मेरे पास शर्त लगाने को कुछ नहीं।’ मैंने अपने असली दयनीय स्थिति स्पष्ट की तो पहले ने प्लास्टिक का चमत्कारी तसला कसकर पकड़ते कहा,‘हो ही नहीं सकता।

इस देश में कोई कुछ करे या न करे पर राजनीति जमकर करता है। कहने के बाद वह फिर मुझे घूरने के बदले मेरे फटे जूतों में शर्म के मारे मुंह छिपाए मेरे फटे पांवों को घूरता रहा। काफी देर तक जब वह मेरे पावों के चेहरे को पहचान नहीं पाया तो उसने दूसरे से पूछा,‘क्या लगता है? ये पांव उनके धोए पांवों को मात दे सकते हैं?

तो दूसरे ने पहले की बात पर गौर देते अपना जग तसले वाले के पास पकड़ाते कुछ देर तक चिंतक का सा मुंह बनाने के बाद, बिन दिमाग का सिर खुजलाने के बाद फैसला देते कहा कि ये पांव लग तो वैसे जैसे ही रहे हैं पर...’ ‘पर क्या??’

कुछ श्योर नहीं कह सकता कि...’ ‘तो क्यों न जिसके पांव हैं, उसी से उसके पांवों का सच उगलवा लिया जाए?’ ‘देखो दोस्त! इस देश का गधे से गधा जीव भी सब कुछ बोल सकता है, पर सच सपने में भी नहीं बोल सकता। इस देश के जीव से सब कहने की उम्मीद करो तो करो, पर उससे सच कहने की उम्मीद कभी मत करो,’ लगा, उसे समाज की गहरी समझ थी। ‘तो??’ तीसरे ने अपने कांधे पर टांगे तौलिए से अपना नाक पोंछते उन दोनों दुविधाग्रस्तों से पूछा।

‘मतलब, हमें इस चुनावी सीजन में उनके पांव धोने का तोड़ नहीं मिलेगा?’ तसले वाला परेशान दिखा। ‘कोशिश तो कर लेते हैं। माई हार्ट फील दैट ये पांव उनके धोए पांवों से भी संजीदा हैं। इनको धोते ही मुझे तो लगता है जैसे तीनों लोकों के पांवों धोने का फल हमें मिल जाएगा।

‘सच?’ तसले वाला सुन गदगद हुआ,‘एक बार उंगली बस ईवीएम तक पहुंच जाए बाकी तो...’ मैं सब कुछ चुपचाप देखता, सुनता रहा। अपने फटे जूतों में अपने फटे पांव छुपाता उन्हें गुनता रहा। हद हो गई मित्रों! अब तो फटे जूतों तक से पांव बाहर तक निकालना दुष्कर हो गया... कि अचानक फटे जूते में से एक कटा फटा पांव जरा सांस लेने के लिए एकाएक बाहर निकल आया।

उसे बाहर आते देख वे तीनों एकसाथ वाहियात चिल्लाए, ‘मिल गया! मिल गया! उनके द्वारा धुलाए पांव का तोड़ मिल गया,’ और देखते ही देखते वे मेरे मैले कुचैले पांव पर ऐसे पिल्ल पड़े कि.... मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस पांव पर चल मैं ईमानदारी की दो वक्त की रोटी भी नहीं कमा सका, वही पांव उनके धुलाए पांवों का रिकार्ड तोड़ देगा।

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