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Basant Panchmi 2019: कला के क्षेत्र में क्या है बसंत का महत्व, यहां पढ़िए

जैसे गृहस्थ में पगी होती हैं औरतें, खेतों में फसल, सड़क पर डामर, साहित्य में साहित्यकार वैसे धरती के कण-कण में रमा होता है बसंत। बसंत वर्ष का प्रेमी है। राह का गुलमोहर, जो मुसाफिरों को हंस-हंस कर मिलता है। ऋतुओं की दर्शकदीर्घा का वीआईपी कोना। समस्त काम कलाओं का खजुराहो। प्रकृति का मनोहारी रूप। धरती का सुखकारी आश्चर्य। इस नश्वर संसार में जो भी अजर-अमर है, सर्वव्यापी है, सत्य है, वह बसंत का आगमन है। अनंत युगों से अनंत युगों तक बसंत आता रहा है, आता रहेगा। क्योंकि बसंत का आना ही निसर्ग का मुस्काना है।

Basant Panchmi 2019: कला के क्षेत्र में क्या है बसंत का महत्व, यहां पढ़िए
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जैसे गृहस्थ में पगी होती हैं औरतें, खेतों में फसल, सड़क पर डामर, साहित्य में साहित्यकार वैसे धरती के कण-कण में रमा होता है बसंत। बसंत वर्ष का प्रेमी है। राह का गुलमोहर, जो मुसाफिरों को हंस-हंस कर मिलता है। ऋतुओं की दर्शकदीर्घा का वीआईपी कोना। समस्त काम कलाओं का खजुराहो। प्रकृति का मनोहारी रूप। धरती का सुखकारी आश्चर्य। इस नश्वर संसार में जो भी अजर-अमर है, सर्वव्यापी है, सत्य है, वह बसंत का आगमन है। अनंत युगों से अनंत युगों तक बसंत आता रहा है, आता रहेगा। क्योंकि बसंत का आना ही निसर्ग का मुस्काना है। मुरझाए का खिल जाना है और सृष्टि का चलते जाना है। बसंत जीवन के थिर पानी में आया आवेग है, हलचल है, धारा है। जिंदगी की कुंद हुई गति को धार देने वाला कारगर हथियार है। बसंत में नवसृजन का जैसा मेला लगता है वैसे अन्यत्र कहीं दुर्लभ है।

रज-रज में समाया

वो जो सरसों के खेत में सोना सा चमकता है, असल में, वह बसंत का दमकता रूप है। क्यारियों में फूल बन खिलता है। आम्रमंजरियों में सुगंध बन महकता है। बरगद, पीपल के पेड़ों में कोंपले बन छाया है, बसंत है। वो जो महुए की डाल-डाल में फूल बन कोचियाया है, बसंत ही तो है। वो जो कोयल बड़े दिनों बाद इतने मधुर स्वर में कूक रही है, वह बसंत की संगिनी है। पेड़, छाल, पात, डाल हर तरफ बसंत है। मैदानों में, कछारों में, ढलानों में पहाड़ों में, बागों, बगीचों, तनों फुनगियों, क्यारियों, गमलों और मन की धरती के हर कोने में जो बिहस रहा, वह बसंत है। जैसे कृष्ण की बांसुरी का मोहक स्वर ब्रज के हर कोने-अंतरे में समाया था, बसंत रज-रज में समाया है।

बसंत में प्रेम

बसंत अपनी प्रेमिकाओं के अंग-अंग में छाया हुआ है। लताओं में, हवाओं में श्रृंगार बनकर बैठा है। अपनी गगरी से प्रेम, माधुर्य, उल्लास और सौंदर्य का जल छलका रहा है। दिवस रूपी नायिका की कमर में कमरबंद बना लटक रहा। विरहणियों के मन में कसक बन कसक रहा। बसंत आ गया और उनका प्रेमी न आया। इस मौसम में एक आत्ममुग्धता छाई रहती है। धरती के रोम-रोम पर प्यार इतराता है। इधर गोरी किवाड़ खोलती है उधर द्वार पर बसंत खड़ा दिखाई पड़ता है। गोरी उसे एकटक निहारती है और बसंत उसके मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। वह भी पीले, गेरुए वस्त्र धारण कर बसंत के रंगों में घुलमिल जाती है। पीले फूलों की माला, गजरा और बाजुबंद पहन अपनी सखियों के साथ नाच उठती है। बसंत की यही तो खासियत है। उसके आने की उमंग हर ओर फैल जाती है। हर कोई चिहुक उठता है। गाने लगता है। ढोल बजाने लगता है। बसंत में मादकता की बात कोई कोरी कल्पना तो नहीं। बसंत में प्रेम है और प्रेम में मादकता तो अवश्यंभावी है।

निश्चल बसंत

इस लौकिक संसार में धरती से बसंत का प्रेम सबसे निराला है। यह दैहिक होकर भी अनंग है, मानसिक होकर भी आत्मिक है। प्रत्यक्ष होकर भी अप्रत्यक्ष है। बसंत का धरती से प्रेम सबको दिखाई देता है लेकिन उनका मिलन नितांत गुप्त है। जैसे ब्रह्म मुहुर्त में पेड़ से महुआ टपकता है वैसे बसंत का प्रेम भी किसी अनदेखे क्षण में धरती पर झर जाता है और हम धरती के प्राणी भोर होने पर उसके फल-फूल से अपने आंखों व आत्मा की खांचियां भरते हैं। बसंत के प्रेम में स्फूर्ति, स्थायित्व और परिपक्वता है। उसमें एक बच्चे की निश्छलता है तो वयस्क का सयानापन भी।

साहित्य में बसंत

ऋतुराज बसंत कवियों का भी प्रिय मौसम है। लेखकों और कवियों ने अपने साहित्य की खांची में जी भर बसंत खिलाए हैं। बसंत को अलंकार की भांति इस्तेमाल किया। किसी ने इसे प्रेमी लिखा, किसी ने महंत, किसी ने इसे कामदेव कहा तो किसी ने ऋतुओं का राजा। किसी को फूल हंसते दिखाई पड़ रहे तो किसी को धरती का श्रृंगार होता दिख रहा। सभी इसके आकर्षण और उल्लास से मोहित हैं। महाप्राण निराला के लिए तो बसंत का आना नवोत्कर्ष का छा जाना है। वहीं सुमित्रा नंदन पंत के लिए बसंत पृथ्वी पर आया स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह है। सभी ने इसके सौंदर्य का वरण किया। फूलों पर कविता कहा। बसंती हवाओं के लिए गीत गाए।
हवा हूं, हवा मैं बसंती हवा हूंध/सुनो बात मेरी अनोखी हवा हूं/बड़ी बावली हूं/बड़ी मस्तमौला
/नहीं कुछ फिकर है/बड़ी ही निडर हूं-केदारनाथ अग्रवाल
अधिकतर कवियों को मौसम की मादकता मदमस्त करती है। तो कुछ संयम के बंध टूटने की बात भी करते हैं।
संयम के टूटेंगे फिर से अनुबंध, महुए की डाली पर उतरा बसंत। -डॉ अजय पाठक

जीवन मे वसंत

फूलों के गदराने या मौसम के गुलाबी हो जाने में एक संदेश छुपा है बसंत के साथ अपने भीतर भी एक बसंत लाने का। उसकी पछुआ हवाओं के साथ हिलते पीले फूलों के साथ हमारी धड़कनें भी ताल मिलाएं। जाड़े की शुष्कता के बाद जैसे फिजाओं में बहार आती है वैसे हमारे जीवन में भी हर्ष का उल्लास आए। नई कलियों के साथ हमारा जीवन भी एक नई शुरुआत करे। कुछ नया सोचे, नया करे, नया कहें। जीवन में स्नेह, मिलन और प्रेम की जामुनी पत्तियां फूटें ताकि हम बसंत उसके सही अर्थों में मना सकें।

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