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Banst Panchmi 2019: प्रकृति-प्रेम का उत्सव है बसंत पंचमी, जानिए कैसे मनाएं

वसंत पंचमी मां सरस्वती का प्रकटोत्सव है। इसीलिए इस तिथि को ज्ञान-वाणी की अधिष्ठात्री की साधना-आराधना की जाती है। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती के प्रभाव को असीम और अनंत बताया गया है। वेद मंत्र कहते हैं-वाग्देवी सौम्य गुणों को देने वाली हैं, वसु रूप सभी देवताओं की रक्षा करने वाली हैं। इनकी कृपा से ही मानवीय-राष्ट्रीय भावना उत्पन्न होती है। सरस्वती की कृपा प्राप्त कर व्यक्ति लोक मंगल के लिए कार्य करता है। ऐसा व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी घबराता नहीं बल्कि उन्हें अनुकूल कर लेता है। सरस्वती की कृपा से ही व्यक्ति प्रज्ञावान विवेकवान होकर महर्षि और ब्रह्मर्षि बन जाता है, वह स्वयं सिद्ध प्रमाणित हो जाता है।

Banst Panchmi 2019: प्रकृति-प्रेम का उत्सव है बसंत पंचमी, जानिए कैसे मनाएं
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सरस्वतीं शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।
कोटि चंद्रसम प्रभांमुष्टपुष्ट श्रीयुक्त विग्रहम्।।
वसंत पंचमी मां सरस्वती का प्रकटोत्सव है। इसीलिए इस तिथि को ज्ञान-वाणी की अधिष्ठात्री की साधना-आराधना की जाती है। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती के प्रभाव को असीम और अनंत बताया गया है। वेद मंत्र कहते हैं-वाग्देवी सौम्य गुणों को देने वाली हैं, वसु रूप सभी देवताओं की रक्षा करने वाली हैं।
इनकी कृपा से ही मानवीय-राष्ट्रीय भावना उत्पन्न होती है। सरस्वती की कृपा प्राप्त कर व्यक्ति लोक मंगल के लिए कार्य करता है। ऐसा व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी घबराता नहीं बल्कि उन्हें अनुकूल कर लेता है। सरस्वती की कृपा से ही व्यक्ति प्रज्ञावान विवेकवान होकर महर्षि और ब्रह्मर्षि बन जाता है, वह स्वयं सिद्ध प्रमाणित हो जाता है।
आरण्यक ग्रंथों का कहना है, सरस्वती ब्रह्म स्वरूप एवं कामधेनु हैं, वाग्देवी ही सरस्वती, विद्या और बुद्धि हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में कहा गया है-

‘या च भक्ति: सृष्टि काले पंचधा चेश्वरेच्छया।
राधा, पद्मा सावित्री दुर्गा देवी सरस्वती।’

प्रकृति में परिवर्तन

माघ शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी एवं श्री पंचमी कहा जाता है। प्रकृति में इस दिन से नई चेतना का संचार होने लगता है, वृक्षों में तरुणाई का स्पंदन होने लगता है, पुष्प कलियों का प्रस्फुटन होने लगता है। ऋतु समशीतोष्ण होने लगती है। प्राणियों में प्रेम-अनुराग उमड़ने लगता है। महर्षि वात्स्यायन के अनुसार कामदेव अपना प्रभाव चर-अचर जगत में दिखाने लगते हैं।
अत: काम साधना द्वारा आचरण शुद्धि हेतु, भगवती सरस्वती की साधना परम आवश्यक है। मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ कर्मों द्वारा समन्वय, सौहार्द का प्रतीक बने, इसीलिए वसंत पंचमी को सरस्वती की आराधना परम आवश्यक मानी गई है। इस पर्व पर स्नान, दान, पूजा, पीले पुष्पों से अर्चन, श्वेत पुष्पों की माला, केले के तोरण द्वार सजाकर मां सरस्वती की आराधना की जाती है।

सरस्वती पूजन करना

प्राचीन काल में वसंत पंचमी को सरस्वती पूजन के साथ ही नवछात्रों द्वारा विद्या अध्ययन प्रारंभ किया जाता था। आज के समय में भी विद्यार्थी पुस्तकों और पाठ्य सामग्री का पूजन वसंत पंचमी के अवसर पर करते हैं।
माघस्य शुक्ल पंचम्यां विद्यारंभ दिनेऽपि च।
पूर्वेऽह्नि संयमं कृत्वा तत्राहि्न संयत: शुचि:।।
वर्तमान में सरस्वती पूजा के लिए सार्वजनिक पूजामंडलों का निर्माण किया जाता है। दिन में पूजन एवं रात्रि में जागरण, स्तुति गायन एवं भजनों द्वारा सरस्वती माता को प्रसन्न किया जाता है। शास्त्रों का मत है गंगा माता और सरस्वती माता एक समान हैं क्योंकि गंगा पापहारिणी हैं, सरस्वती अविवेक-हारिणी।

पुनिबंद ॐ शारद सुर सरिता।
युगल पुनीत मनोहर चरिता।।
मज्जन पान पय हर एका।
कहत सुनत एक हर अविवेका।।
इसीलिए भारतीय जन मानस संगम अथवा तीर्थों में जाकर माघ मास में कल्पवास का संकल्प लेता है। जहां मज्जन और मंथन अर्थात रुचि पूर्वक तन और मन की साधना के साथ मां शारदा की उपासना करता है, यही मानव जीवन का परम लक्ष्य भी है।

वर्तमान समय में प्रासंगिकता

भारतीय जीवन चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित है। पाश्चात्य दुनिया में धर्म और मोक्ष की कल्पना तक नहीं है साथ ही अर्थ और काम है तो वह भी विकृत रूप में। इसे यों भी कह सकते हैं। पाश्चात्य जीवन पद्धति कैश-ऐश के इर्द-गिर्द घूमती है। यद्यपि भारत में पाश्चात्य विकारों की बहुत घुसपैठ हो चुकी है तथापि अभी भी भारतीय परंपरा और संस्कृति के दर्शन होते रहते हैं। इसी कारण पश्चिमी देशों में भी भारतीय संस्कृति एवं जीवन पद्धति की ओर झुकाव बढ़ रहा है क्योंकि कैश कमाओ ऐश करो से अब वहां लोग ऊबने लगे हैं।
वसंत पंचमी का महत्व आज हमें यह विचार देता है कि अर्थ और काम ऐसी अनियंत्रित नदी का प्रवाह है, जिसे हम धर्म और मोक्ष के तटबंधों से नियंत्रित कर सकते हैं। धर्म-मोक्ष रूपी दो तटबंधों के बीच प्रवाहित अर्थ और काम पुरुषार्थ होता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि परमात्मा ने अपने संकल्प से सर्वप्रथम काम को उत्पन्न किया ‘कामस्तदग्रे समवर्तत’
वसंत पंचमी काम साधना की ओर भी प्रेरित करता है, इसीलिए संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों, हिंदी साहित्य आदि में वसंत पंचमी को ‘मदनोत्सव’ अर्थात कामदेव का उत्सव भी कहा गया है।
कामदेव की पत्नी रति हैं, काम और रति के मिलन से ही प्राणियों की उत्पत्ति होती है। पाश्चात्य जगत ने काम को व्यभिचार में बदल दिया है, जबकि भारतीय मनीषा में, काम-राम की प्राप्ति का साधन मात्र है अर्थात अच्छी एवं संस्कारवान सूरत लेकर जीव इस संसार में आ सकता है, इसीलिए इस पर्व को कमनीय पर्व भी कहा गया है। जिसकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती हैं।

प्रेम-पर्व भी है वसंत पंचमी

‘प्रेम’ के उत्सव वसंत पंचमी के बारे में भारतीय साहित्य में वर्णन मिलता है। कामदेव को मदन भी कहा जाता है। वसंत पंचमी ही वास्तविक मदनोत्सव है। कामदेव के वाण, नील कमल, मल्लिका, आम्रमंजरी, चंपक और शिरीष, पत्र-पुष्पों की पंचमी से अलंकृत रहते हैं। कामदेव का धनुष गन्ने का होता है, वाहन शुक (तोते) का होता है।
ध्वजा लाल वसना की तथा उसमें मछली की आंख अंकित (मीनाक्षी) रहती है। वस्तुत: वसंत पंचमी यानी मदनोत्सव ऐसे वातावरण की ऋतु में होता है, जब प्रकृति में सर्वत्र कमनीयता (सुंदरता) छाई रहती है। ऐसा सुंदर उत्सव भारत वर्ष की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का द्योतक है। हमें इसके स्वरूप को आत्मसात करना होगा अन्यथा हम अपनी उदात्त धर्म-संस्कृति से बहुत दूर हो जाएंगे। महाकवि ने लिखा है-

नव पलाश-पलाश वनं पुर:
स्फुट पराग परागत पंकजम
मृदुलतात्र लतात्र मलोकयत
स सुरभिं सुरभिं सुमनोभरै:
महाकवि कलिदास मेघदूत में लिखते हैं-
‘कामरूपं मघोन:’
छायावादी कवि सुमित्रा नंदन पंत लिखते हैं-
सुमन सुना विहग सुंदर
मानव तुम सबसे सुंदरतम
गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस की पूर्णता में लिखते हैं-
कामिहि नारिपियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमिदाम।
तिथि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम।।
वस्तुत: काम से राम की ओर मुड़ना ही काम पुरुषार्थ है
(लेखक भारतीय मनीषा के तत्ववेत्ता हैं)

पूजन विधि

वसंत पंचमी को साधक प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में जागकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर पवित्र सरोवर अथवा नदी में स्नान कर वहां से पूजन हेतु जलकलश लाएं, पूजा मंडप में पंचांग पूजन की वेदियां बनाकर, कलश स्थापना कर गणपति पूजन से अर्चना प्रारंभ करनी चाहिए। कलश के साथ पूजा मंडप के मध्य प्रधान इष्ट सरस्वती की स्थापना कर पूजन करना चाहिए।
सरस्वती पूजा क्रम में सबसे पहले तीन आचमन कर संकल्प पाठ कर पुष्प, प्रसाद, फल आदि द्वारा माता सरस्वती का उनके समस्त अलंकारों, वाहन हंस एवं वीणा का पूजन करना होता है। पूजा संपन्न होने पर स्तुतियों का गायन कर महाआरती करनी चाहिए। पुस्तक और कलम का पूजन इस अवसर पर अवश्य करना चाहिए। इस प्रकार अनेक भक्ति भावना से पूजित सरस्वती माता कल्याणकारिणी फल प्रदान करती हैं।
पूजा में मां सरस्वती को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का भी बहुत महत्व है। पंचामृत, दूध, दही, मक्खन, सफेद तिल के लड्डू, गन्ना, सफेद चंदन का भोग लगाने से मां सरस्वती बहुत प्रसन्न होती हैं। चांदी के आभूषणों से उनका श्रंगार करना चाहिए। यदि वस्तुएं उपलब्ध नहीं हों तो मानस पूजा अर्थात पवित्र स्थान पर आसन लगा कर एक लोटा पानी भरकर अपने सामने रखकर ध्यानावस्था में स्वयं को माता सरस्वती को समर्पित करना चाहिए। ॐ श्रीं हृीं सरस्वत्यै नम: मंत्र का निरंतर जाप करना चाहिए।

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