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बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच इस वजह से हुए थे मतभेद

मध्य प्रदेश स्थित महू नगर सैन्य छावनी में 14 अप्रैल 1891 को जन्में भारतीय संविधान के निर्माता भीमराव रामजी अंबेडकर जी की आज पुण्यतिथि है। बाबा साहेब अंबेडकर ने छह दिसंबर 1956 को अंतिम सांस ली थी जिसके बाद से इसे ‘महापरिनिर्वाण दिवस'' (Mahaparinirvan Diwas 2018) के रूप में मनाया जाने लगा।

बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच इस वजह से हुए थे मतभेद

मध्य प्रदेश स्थित महू नगर सैन्य छावनी में 14 अप्रैल 1891 को जन्में भारतीय संविधान के निर्माता भीमराव रामजी अंबेडकर (B. R. Ambedkar Death Anniversary) की आज पुण्यतिथि है। बाबा साहेब अंबेडकर (Babasaheb Ambedkar) ने छह दिसंबर 1956 को अंतिम सांस ली थी जिसके बाद से इसे ‘महापरिनिर्वाण दिवस' (Mahaparinirvan Diwas 2018 - B. R. Ambedkar Death Anniversary) के रूप में मनाया जाने लगा। बाबा साहेब अंबेडकर (B. R. Ambedkar) और महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के बीच 1932 के कम्यूनल अवार्ड में दलितों को पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र अधिकार मिलने के कारण मतभेद उभरे थे। लेकिन वक्त के गुजरने के साथ ही डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) और महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) में एक-दूसरे को लेकर परस्पर आदर का भी पैदा हो गया था।

बाबा साहेब अंबेडकर (B. R. Ambedkar) और महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के बीच हुए मतभेद की कहानी

उपर्युक्त अवार्ड दलितों को अन्य मुसलमानों, सिखों, एंग्लो इंडियंस वगैरह के साथ-साथ पृथक निर्वाचन के रूप में विधानसभाओं और केन्द्रीय एसेम्बली के लिए अपने नुमाइंदे चुनने का अधिकार देता था। बापू इस अवार्ड का विरोध कर रहे थे। उन्होंने इसके विरोध में 20 सितम्बर 1932 से आमरण अनशन चालू कर दिया। वे मानते थे कि इससे दलित हिन्दू समाज से अलग हो जाएंगे जिससे हिन्दू समाज दो फाड़ हो जाएगा।

अंत में बापू के अनशन के आगे सबको झुकना ही पड़ा। दोनों का विकास का मॉडल भी अलग था। जहां गांधी जी की स्पष्ट राय थी कि देश के गांवों का विकास किए बगैर भारत खुशहाल नहीं हो सकता, डा. अंबेडकर का मानना था कि विकास का रास्ता औद्योगिकरण से ही मुमकिन है। बहरहाल, ये दोनों 1946 के मध्य से राजधानी दिल्ली में रहने लगे।

गांधी जी 9 सितंबर 1946 के बाद अलबुर्कर रोड पर स्थित बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में रहने लगे। इस दौरान बाबा साहेब पहले रहते थे एक हार्डिंग लेन (अब तिलक लेन) और फिर 22, पृथ्वीराज रोड पर। गांधी जी का बिड़ला हाउस से पहले आशियाना पंचकुईया रोड पर स्थित वाल्मीकि मंदिर में रहा। यानी ये सब जगहें एक-दूसरे से कोई बहुत दूर नहीं थी।

पर इन दोनों महान जननेताओं के बीच यहां पर किसी मुलाकात का कोई उदाहरण नहीं मिलता। पर ये सोचना-समझना भी गलत होगा कि ये दोनों एक-दूसरे से मिलने से बचते होंगे। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र होता है। फिर 29 अगस्त 1947 को डा. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत का नया संविधान बनाने के लिए एक सात सदस्यीय कमेटी बना दी जाती है।

बाबा साहेब देश के नए संविधान को तैयार करने के अहम कार्य में जुट जाते हैं। इसकी बैठकें मौजूदा संसद भवन में होती हैं। पर ये भी सत्य है कि प्रधानमंत्री नेहरु और सरदार पटेल तो संवैधानिक मामलों के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान सर गऊर जैनिंग्स को भी देश के संविधान को अंतिम रूप देने के लिए आमंत्रित करने पर विचार कर रहे थे। इसी सिलसिले में ये दोनों एक बार बापू से मिले।

तब बापू ने उन्हें सलाह दी थी कि डा. अंबेडकर सरीखे विधि और संवैधानिक मामलों के उद्भट विद्वान की मौजूदगी में किसी विदेशी को देश के संविधान को तैयार करने की जिम्मेदारी देना उचित नहीं होगा। बापू की सलाह पर अमल करते हुए डा. अंबेडकर को संविधान सभा से जुड़ने का प्रस्ताव दिया गया। जिसे वे तुरंत स्वीकार कर लेते हैं।

इससे स्पष्ट है कि गांधी जी सम्मान करते थे डा. अंबेडकर की विद्वता का। वहीं डा. अंबेडकर को भी पता चल गया होगा कि उन्हें इतनी अहम जिम्मेदारी गांधी जी की सलाह पर ही मिली है। समय बीतता गया और देश ने देखा 30 जनवरी 1948 का काला स्याह दिन। उस दिन एक विक्षिप्त शख्स बापू हत्या कर देता है। बापू की हत्या से देश बिलखने लगता है।

बापू की हत्या का समाचार सुनकर बाबा साहेब भी स्तब्ध हो जाते हैं। वे पांच मिनट तक सामान्य नहीं हो पाते। फिर कुछ संभलते हुए कहते कि बापू का इतना हिंसक अंत नहीं होना चाहिए था। 22 पृथ्वीराज रोड के सरकारी आवास में ही डा. भीमराव अंबेडकर पत्नी सविता अंबेडकर, सहयोगी रहे नानक चंद रत्तू और सेवक सुदामा के साथ रहे।

वे साप्ताहिक अवकाश के दिनों में राजधानी के करोल बाग के टैंक रोड और रैगरपुरा जैसे इलाकों में अपने परिचितों से मिलने जुलने के लिए जाना पसंद करते थे। करोल बाग के असरदार जनसंघ नेता गोपाल कृष्ण रातावाल अपने समर्थकों के साथ बाबा साहेब से मिलने पृथ्वीराज रोड और 1951 के बाद अलीपुर रोड जाते। बाबा साहेब सबको यही कहते कि दलितों को अधिक से अधिक संख्या में संसद और विधानसभाओं में पहुंचना है।

बहरहाल 27 सितंबर 1951 को डा. अंबेडकर ने नेहरु जी की कैबिनेट से अप्रत्याक्षित रूप से त्यागपत्र दे दिया। दोनों में हिन्दू कोड बिल पर गहरे मतभेद उभर आए थे। डा. अंबेडकर ने अपने इस्तीफे की जानकारी संसद में दिए अपने भाषण में दी। वे दिन में तीन-चार बजे अपने आवास वापस आए। तब उन्होंने रत्तू को अपने पास बुलाकर कहा कि वे चाहते हैं कि सरकारी आवास कल तक खाली कर दिया जाए।

सबको बाबा साहेब के इस्तीफे की खबर आकाशवाणी से मिल चुकी थी। करोल बाग से आने वालों की चाहत थी कि बाबा साहेब करोल बाग में शिफ्ट कर लें। उन्हें इस तरह का घर दिलवा दिया जाएगा जिसमें उनकी लाइब्रेयरी और मिलने-जुलने के लिए आने वालों के लिए पर्याप्त स्पेस हो। पर बाबा साहेब के चाहने वाले एक सज्जन ने उन्हें अपना 26 अलीपुर रोड का घर रहने के लिए देने का प्रस्ताव दिया।

उन्होंने अगले ही दिन यानी 28 सितंबर 1951 को 26 अलीपुर रोड में शिफ्ट कर लिया। उन्होंने 26 अलीपुर रोड में रहते हुए ही ‘बुद्धा एंड हिज धम्मा’ अपनी अंतिम पुस्तक लिखी। उन्होंने कभी गांधी जी की आलोचना नहीं की। डा. अंबेडकर की 6 दिसम्बर 1956 को मृत्यु हुई।

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