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अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक सफर : जब अटल जी की मथुरा में हुई थी जमानत जब्त

अटल बिहारी वाजपेयी 1951 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने लेकिन लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे, मथुरा में जमानत जब्त हुई, लेकिन बलरामपुर से जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे, यह उनके अगले पांच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरुआत थी।

अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक सफर : जब अटल जी की मथुरा में हुई थी जमानत जब्त

काल के कपाल पर लिखता, मिटाता हूं मैं गीत नया गाता और मैंने जन्म नहीं मांगा था किंतु मरण की मांग करुंगा, जाने कितनी बार जिया हूं जाने कितनी बार मरा हूं, जन्म मरण के फेरे से मैं इतना पहले नहीं डरा हूं। 25 दिसंबर, 1924 को जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी का आज जन्मदिन है। अटल में काल से अटल रार करने का एक ऐसा माद्दा था जिसने उन्हें राजनीति जैसे कलुष से भरे क्षेत्र में भी एक चमकदार नायाब हीरा बनाए रखा। अटल जी वे पहले शख्स थे जिन्होने इस मिथक को तोड़ा कि भारतीय राजनीति में नेहरु वंश के सिवा कोई और देश नहीं चला सकता। वे ऐसे अजातशत्रु राजनेता थे जिन्होंने अपनी वाक्पटुता और अद्भुत भाषण कला से ने केवल आम जनता को अपना मुरीद बनाया अपितु उनके कट्टर विरोधी भी उनके कायल रहे।

ब्रिटिश दल के भारत आने पर नेहरु जी ने उनका परिचय कुछ यूं कराया था, यें हमारे विपक्ष के युवा नेता हैं, जो मेरे कटु आलोचना का कोई मौका नहीं खेाते, पर उनमें एक उज्जवल भविष्य देखता हूं। यानि अटल जी में नेहरु ने बहुत पहले ही भावी प्रधानमंत्री देख लिया था। इंदिरा गांधी ने कांगेस में आने को कहा पर अटल नही माने।

अटल बिहारी वाजपेयी जीवट के धनी थे उन्होंने सारी दुनिया की परवाह किए बगैर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाया, विपक्ष में रहकर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में देश का प्रतिनिधित्व किया, वहां पहली बार हिंदी का परचम लहराया। 1951 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य अटल ने अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति में रंग जमाया।

पर वे लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे, मथुरा में जमानत जब्त हुई, लेकिन बलरामपुर से जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे, यह उनके अगले पांच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरुआत थी।

1968 से 1973 तक भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे अटल आपातकाल में जेल में गए व 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने, इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। 1980 में वे बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे और 1986 तक अध्यक्ष व बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए, दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति भी रही। 1962 से 1967 और 1986 में राज्यसभा के सदस्य रहे। 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को संख्या बल के आगे नतमस्तक होने के वक्तव्य के साथ त्यागपत्र दे दिया।

1999 में एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली इस बार वे पूरे कार्यकाल के प्रधानमंत्री रहे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के शासन काल में भारत एक सशक्त परमाणु शक्ति सपन्न राष्ट्र बना और स्वच्छ सुशासन की राजनीति का उद्घोष हुआ। अटलजी महान राजनेता ही नहीं अपितु साहित्यकार, पत्रकार, संपादक व कुशल कवि तथा वक्ता भी थे।

उनकी वकतृत्व कला के लिए नेहरु व इंदिरा जैसे विपक्षी नेता भी उन पर फिदा रहे हैं, इसी वजह से विदेशमंत्री के रूप में वें सर्वाधिक लोकप्रिय हुए तथा विदेशों में व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को निखारने में अद्भुत योगदान दिया। यह अटल जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान जैसी भारत विरोधी शक्तियां भारत के प्रति विद्वेष की भावना भरने में नाकामयाब रहीं।

वे खुद विद्वेष से दूर थे इसीलिए खुद समझौता एक्स्प्रेस लेकर पाकिस्तान गए, मुशर्रफ को आगरा बुलवाया पर उनकी चिकन बिरयानी के जवाब में जब कारगिल हुआ तो अटल ने पाक को मुंह तोड़ ज़वाब भी दिया। अटल राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय व संवैधानिक विषयों के गूढ़ ज्ञाता रहे। 1946 में वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ खुद को संघ के प्रति समर्पित कर दिया।

अटल कहते थे कि भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्र पुरूष है। यह जीवन का आदर्श व एक जीवन पद्धति है जहां से ज्ञान की रश्मियां सम्पूर्ण विश्व में फैली हैं। यही वह देश है जिसने सम्पूर्ण विश्व को आध्यात्म का संदेश दिया है और विश्वगुरू कहलाया है। यह सदैव से धर्म, दर्शन, अध्यात्म के उच्चतम सिध्दान्तों का देश रहा है और जिसके वातावरण में मानवता तथा विश्व के बंधुत्व का राग ध्वनित होता रहता है।

हमारी विरासत है, हमारी संस्कृति। भारत वन्दन की, अभिनन्दन की भूमि है। प्रधामंत्रीत्व काल में अटल का रणनीतिक कौशल देखकर राजनीतिक समीक्षक दंग रहे। विपरीत रीतियों-नीतियों वाले दलों के गठबंधन को उन्हानें कुशल ढंग से संभाला। परमाणु बम बनाने के बाद भी उन्होंने देश को अमेरिका व दूसरे देशों के दबाव में नही आने दिया।

उस समय वे बहुत कम बोले परन्तु जो बोलेे वह अन्तर को छूने वाला व रणनीतिक कौशल से भरा होता था। एक परिश्रमी भारत व विजयी भारत बनाने का अटल का सदा ही सपना रहा। जब अटल जी ने राजनीति को अलविदा कह रखा है तब उनके धुर विरोधी रहे नेता भी मानते थे कि उनका चिंतन व मनन अद्भुत रहा, एक हिंदुवादी दल में होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में अटल बेमिसाल रहे हैं।

अटल की खास बात रही है कि वे वक्त पड़ने पर अपनी बेलाग बातें कहने से कभी नहीं चूके। जब लालकृष्ण अडवाणी की रथ यात्रा के बाद संसद में उन्हें संसदीय दल का नेता बनाया जा रहा था तब उन्होंने कहा था, आड़वाणी जी के इन भालू बंदरों को संभालना मेरे बस की बात नहीं है। पर न केवल संभाला अपितु अगले ही चुनाव में सरकार बनाने में सफल रहे। जब गोधरा कांड हुआ तब वे प्रधानमंत्री थे। जब पत्रकारों ने पूछा अब मुख्यमंत्री को क्या करना चाहिए तब अटल ने बेलाग कहा था उन्हे अपना राजधर्म निभाना होगा।

बिना किसी के दबाव में आए अटल ने अपना तीसरा कार्यकाल जिस तरह पूरा किया वह भारत के धर्मरिपेक्ष स्वरूप की छवि का एक स्वर्णकाल कहा जा सकता है। दंगे व पंगे से रहित उस काल ने अटल को बहुत पहले ही भारतरत्न बना दिया था जिस पर भारत सरकार की मोहर तो बहुत बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लगी। अटल 94 साल हमारे बीच रहे अटल 16 अगस्त को इस वर्ष दैहिक से दैविक हो गए पर उनकी छवि, अद्भुत भाषण कला वह रुक-रुककर बोलना और देश के लिए दल को गौण कर देना हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा।

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