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अटल के पांव धरती पर रहे मगर ज़हन आकाश में रहा

अजातशत्रु, सर्वप्रिय और अब देवानाम प्रिय। ऐसे कितने ही विशेषणों से जड़े व जुड़े अटल बिहारी वाजपेयी, गांधी, नेहरू के बाद संभवत: सर्वाधिक कद्दावर भारतीय शख्शियत थे। ऐसे शिखर पुरुषों द्वारा छोड़े गए शून्य कभी भरा नहीं करते।

अटल के पांव धरती पर रहे मगर ज़हन आकाश में रहा

अजातशत्रु, सर्वप्रिय और अब देवानाम प्रिय। ऐसे कितने ही विशेषणों से जड़े व जुड़े अटल बिहारी वाजपेयी, गांधी, नेहरू के बाद संभवत: सर्वाधिक कद्दावर भारतीय शख्शियत थे। ऐसे शिखर पुरुषों द्वारा छोड़े गए शून्य कभी भरा नहीं करते।

राजनीति के क्षेत्र में कई नाबाद पारियां खेल चुके इस शख्स को अपने देश का शिखर 'स्टेट्समैन' माना जाता रहा है। कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं, जो अपने दल और अपने कालखंड से भी बड़ा रूप ले लेती हैं। भाजपा और उससे पूर्व भारतीय जनसंघ के महानायक एवं संस्थापकों में अग्रणी और शायद सर्वाधिक संवेदनशील इस राजनेता ने अपने चिंतन कर्मठता से अपने समकालीन राजनीतिक इतिहास की जो इबारत लिखी,वह वाकई विलक्षण है।

आठवें दशक में उनको करीब से अपने अबोहर- स्थित निवास पर मिलने का अवसर मिला था। नाश्ते पर आए थे। मेरे सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वे हर बार कहते, 'थोड़े सामान्य रहो भाई। सवालों का सिलसिला थामों, पहले आराम से खुद भी कुछ खा लो, मुझे भी खाने दो, ये सवालों के सिलसिले तो तब तक जारी रहेंगे, जब तक सांसों का आना-जाना चलेगा, वैसे भी हम लोग गंभीर चिंतन के समय खाने पर ध्यान देने लगते हैं, जबकि खाने के समय गंभीर चिंतन की बातों पर उतर आते हैं '।

उनका जन्म ग्वालियर में हुआ था। एक सामान्य सा परिवार था, मगर सपने ऊंचाइयों को छूने वाले थे। पांव धरती पर रहे मगर ज़ेहन आकाश में रहा। बोलते थे तो आंखें बंद कर लेते या शून्य में मुखातिब होने लगते। उन्हें तालियों से ज्यादा सरोकार नहीं होता था। कहते थे, 'जब बातें भीतर से निकलती है तो तालियां बेमानी हो जाती है। सवाल ज़ेहन में उतरने का होने चाहिए।

यह शख्स जब किसी मुद्दे पर आह्वान की मुद्रा में होता था तो श्रोताओं की रगें फड़कने लगतीं थीं। जब विनोद प्रियता के लम्हे आते तो पूरी उपस्थिति ठहाके लगाने पर मजबूर हो जाती थीं।

जो शख्स ' काल के कपाल पर लिखता, मिटाता हूं 'सरीखी बातें कहने में समर्थ था, उसके सम्मान में पर्वत भी नमन करने पर विवश हो जाते थे।

ठन गई!

मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

ऐसी कालजयी सृजनशीलता वाली इस मसीही शख्सियत का कवित्व वाला पहलू भी उतना ही सशक्त था, जितना कि राजनीतिज्ञ वाला पहलू।

सर्वाधिक सर्वप्रियता का उनका यह भी एक वैशिष्ट्य था कि प्रधानमंत्री के रूप में अपनी एक पारी में तो 24 दलों को साथ लेकर चलने में भी समर्थ रहे थे। उनकी भाषण शैली के प्रशंसकों की फेहरिस्त में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं नेहरू भी थे, बाद में आए प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव और चंद्रशेखर तो उन्हें 'गुरु जी 'के रूप में सम्बोधित करते थे। कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनके 'जम्हूरियत, इंसानियत व् कश्मीरियत' वाला नुक्ता उनके प्रखर विरोधियों ने पूरे स्नेह व्गांभीर्य के साथ स्वीकार किया था। गुजरात पर उनकी 'राजधर्म 'का पालन ' करने की नसीहत उनकी वैचारिकता का चरम था।

कश्मीर के बेहद संवेदनशील प्रश्न पर 'आगरा सम्मेलन और लाहौर बस यात्रा सरीखी पहल कदमियों ने भी नया इतिहास रचा था और 'पोखरण - परमाणु विस्फोट ' सरीखे संकल्पबद्ध फैसले इस गरिमापूर्व शख्सियत की जिंदगी के मील के पत्थर हैं .....।

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