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जब दंगाइयों पर भारी पड़े अटल

कवि और प्रखर वक्ता अटल बिहारी वाजपेयी के सामने हत्यारों का आत्मसमर्पण दिल्ली ने देखा था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे।

जब दंगाइयों पर भारी पड़े अटल

कवि और प्रखर वक्ता अटल बिहारी वाजपेयी के सामने हत्यारों का आत्मसमर्पण दिल्ली ने देखा था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे। मौत का नंगा नाच खेला जा रहा था, मानवता मर रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी तब दिल्ली प्रेस क्लब के लगभग सामने स्थित 6 रायसीना रोड के बंगले में रहते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक नवंबर 1984 को सुबह दस बजे अपने बंगले के गेट से बाहर भयावह मंजर देखा। उनके घर के सामने स्थित टैक्सी स्टैंड पर काम करने वाले सिख ड्राइवरों पर हल्ला बोलने के लिए गुंडे-मवालियों की भीड़ एकत्र थी। वे तुरंत बंगले से अकेले ही निकलकर टैक्सी स्टैंड पर पहुंच गए। उनके वहां पर पहुंचते ही हत्याएं करने के इरादे से आई भीड़ तितर-बितर होने लगी। भीड़ ने अटल जी को तुरंत पहचान लिया था। उन्होंने भीड़ को कसकर खरी-खरी सुनाई। मजाल थी कि उनके सामने कोई आंखें ऊपर कर देख लेता।

उसी दिन शाम को अटल जी अपनी पार्टी के सहयोगी लाल कृष्ण आडवाणी के साथ तब के केन्द्रीय गृहमंत्री पीवी नरसिंह राव से मिलने गए। उन्हें सारी घटना की विस्तार से जानकारी दी। बताया कि जलती दिल्ली को तुरंत बर्बाद होने से बचाया जाए। उन्होंने रात के समय भाजपा के 11 अशोक रोड दफ्तर में एक मीटिंग तलब की। उसमें विजय कुमार मल्होत्रा, मदन लाल खुराना और केदार नाथ साहनी सरीखे पार्टी के असरदार नेताओं को बुलाया गया। अटल जी ने दिल्ली के इन नेताओं को निर्देश दिए कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर सिखों के कत्लेआम को हर कीमत पर रोकें।

दरअसल अटल जी का दिल्ली से सन 1957 में रिश्ता कायम हो गया हो था। वो तब पहली बार भारतीय जनसंघ की टिकट पर लोकसभा के लिए निर्वाचित होकर आए थे। वे साउथ एवेन्यू के फ्लैट नंबर 111 में रहते थे। तब उनके पास कोई वाहन नहीं था। यहां पर उनके ग्वालियर के एक संबंधी मौरिस नगर में रहते थे। जिनसे मिलने वे तीन मूर्ति से बस नंबर 15 लेकर जाते। ये माना जा सकता है कि उनका तब से ही दिल्ली से अटूट संबंध स्थापित हो गया। वो 1977 और 1980 में नई दिल्ली सीट से विजयी होकर लोकसभा पहुंचे। तब दिल्ली वाले उनकी नई दिल्ली के बोट क्लब, कनॉट प्लेस, मिन्टो रोड सरकारी प्रेस, सरोजनी नगर मार्केट की सभाओं को सुनने का बेसब्री से इंतजार करते थे। सबको अटल जी के ओजस्वी भाषणों को सुनना होता था।

अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी भी अपने को सिर्फ राजनीति तक ही सीमित नहीं किया। उनके सियासत से इतर के मित्र भी कम नहीं रहे। इनमें कवियों की संख्या अच्छी-खासी रही। वे इनकी ताजा कविताएं सुनते,बदले में इनका मुंह मीठा करवाते। मेजबानी तो कोई अटल बिहारी वाजपेयी से सीखे। वे हर अतिथि को चांदनी चौक के घंटे वाले या गोल मार्किट के बंगला स्वीट हाउस की बालूशाही खिलाते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी के 6 रायसीना रोड और फिर प्रधानमंत्री आवास की तरह 6-ए कृष्ण मेन मार्ग पर उनसे निरंतर मिलने वालों में उनके दो अभिन्न सहयोगी रहे सुप्रीम कोर्ट के वकील एनएम घटाटे और शिव कुमार थे। दोनों के अटल जी से 60 वर्ष से अधिक पुराने संबंध थे। मौजूदा आवास में लाल कृष्ण आडवाणी और बीसी खंडूरी भी नियमित रूप से उनसे मिलने या उनकी बेटी नमिता से कुशल क्षेम जानने आते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने मौजूदा कृष्णा मेनन मार्ग के आवास में शिफ्ट होने से पहले इसका पता बदलवाया था। कहने वाले कहते हैं कि वाजपेयी जी अपने नए आवास का पता 7-ए रखना चाहते थे। लेकिन ये संभव नहीं था क्योंकि लुटियंस जोन के बंगलों के नंबर सड़क के एक तरफ विषम हैं और दूसरी ओर सम हैं।

उनके आग्रह के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), शहरी विकास मंत्रालय और नई दिल्ली नगर पालिका (एनडीएमसी) ने इस बंगले को नया पता दे दिया था। हालांकि ये गुत्थी कभी नहीं सुलझी कि अटल जी ने अपने आवास का पता क्यों बदलवाया था। ये जानकारी आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल के प्रयासों से सामने आई थी। कहते हैं कि अटल जी इधर कतई मन से शिफ्ट नहीं हुए थे। प्रधानमंत्री पद से साल 2004 में मुक्त होने के बाद वे इधर आए थे।

यूपीए सरकार बनने के तीन-चार महीनों तक वे 7, रेसकोर्स रोड ( लोक कल्याण मार्ग) में ही रहते रहे। अटल जी को यकीन था कि सन 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए विजयी होगी। इसलिए उन्होंने बड़े ही भारी मन से प्रधानमंत्री आवास को छोड़ा था।

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