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विधानसभा चुनाव 2018: आंकड़ों में जानिए छत्तीसगढ़-एमपी समेत पांच राज्यों का हाल

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ जो राजनीतिक बिगुल बजा है 11 दिसंबर को मतगणना के साथ उसकी प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी, लेकिन यहां अल्पविराम की संभावना भी नहीं है, क्योंकि 2019 के आम चुनाव के लिए राजनीतिक मोर्चाबंदी जारी रहेगी।

विधानसभा चुनाव 2018: आंकड़ों में जानिए छत्तीसगढ़-एमपी समेत पांच राज्यों का हाल

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ जो राजनीतिक बिगुल बजा है 11 दिसंबर को मतगणना के साथ उसकी प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी, लेकिन यहां अल्पविराम की संभावना भी नहीं है, क्योंकि 2019 के आम चुनाव के लिए राजनीतिक मोर्चाबंदी जारी रहेगी। इन राज्यों में कुल 680 विधानसभा सीटें हैं। इसमें 2013 के चुनावों भाजपा को सबसे ज्यादा 382, कांग्रेस को 169, बसपा को आठ तेलंगाना राष्ट्र समिति या टीआरएस को 82 तथा मिजो नेशनल फ्रंट को पांच सीटें मिलीं थीं।

इस तरह एक साथ मिलाकर देखने से यह भाजपा बनाम कांग्रेस की ही लड़ाई दिखती है, किंतु तेलंगाना में टीआरएस को जितनी सफलता मिलेगी कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए वहां 2019 की चुनौती बढ़ जाएगी। टीआरएस के प्रमुख एन चन्द्रशेखर राव गैर भाजपा गैर कांग्रेस मोर्चा की वकालत कर रहे हैं।

चूंकि यह 2019 के आम चुनाव से पहले के चुनाव हैं, इसलिए इन्हें उसके पूर्वपीठिका के रूप में देखा जाना स्वाभाविक है। वैसे इन राज्यों में जिन पार्टियों को विधानसभा में सफलता मिली है वे ही प्रायः लोकसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन कर पाती हैं। इन राज्यों में लोकसभा की कुल 83 लोकसभा सीटें हैं।

इनमें से 2014 में भाजपा ने 63, कांग्रेस ने 6 तथा टीआरएस ने 11 सीटें जीतीं थीं। इस समय कांग्रेस के पास 9 सीटें हैं और भाजपा के पास 60। तीन उप चुनाव कांग्रेस जीती है। जाहिर है, भाजपा को 2019 के अंकगणित तक पहुंचना है तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान चुनावों में 2013 को दोहराना होगा, तेलंगाना एवं मिजोरम में प्रदर्शन बेहतर करना होगा।

वास्तव में राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ का महत्व ज्यादा है। पहले राजस्थान से आरंभ करें। वहां अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। 2013 आते-आते स्थिति बदल चुकी थी। नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय क्षितिज पर आ गए थे। उनके प्रति जरबदस्त आकर्षण था।

केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार एक साथ भ्रष्टाचार के आरोपों से दबी हुई थी। मोदी की सभाओं में समां बंधता था। पूरा माहौल पलट गया। भाजपा को रिकॉर्ड 163 सीटें मिलीं। काग्रेस को 21 पर सिमटना पड़ा। भाजपा को 45.17 प्रतिशत, कांग्रेस को 33.07 प्रतिशत, बसपा को 3.37 प्रतिशत तथा नेशनल पीपुल्स पार्टी को 4.25 प्रतिशत मत मिले थे।

दोनों मुख्य पार्टियों के बीच 12 प्रतिशत का बहुत बड़ा अंतर था। मध्यप्रदेश में भाजपा को 165, कांग्रेस को 58, बहुजन समाज पार्टी को 4 तथा निर्दलीय को 3 सीटें मिलीं थीं। लगातार तीसरे चुनाव में भाजपा की सीटें बढ़ीं तथा कांग्रेस की घटी। भाजपा को 44.88 प्रतिशत, कांग्रेस को 36.38 प्रतिशत, बसपा को 6.29 प्रतिशत, सपा को 1.20 प्रतिशत मत मिला था।

दोनों मुख्य पार्टियों में करीब 8 प्रतिशत मतों का अंतर था। यह भी छोटा अंतर नहीं है। छत्तीसगढ़ में भाजपा को 49, कांग्रेस को 39, बसपा को 1 तथा निर्दलीय को भी 1 सीट प्राप्त हुई थी, किंतु यहां लड़ाई कांटे की थी। भाजपा को 41.04 प्रतिशत, कांग्रेस को 40.29 प्रतिशत, बसपा को 4.27 प्रतिशत मत मिला था। दोनों प्रमुख पार्टियों में केवल.75 का अंतर था।

भाजपा को कुल 53 लाख 65 हजार 272 मत मिले थे। कांग्रेस को 52 लाख 67 हजार 698 मत मिले। यानी केवल 97 हजार 584 मतों का अंतर से कांग्रेस सत्ता पाने से वंचित रह गई। ध्यान रखिए, बसपा को 5 लाख 58 हजार 424 मत मिले। मिजोरम में कांग्रेस को 34, मिजो नेशनल फ्रंट को 5 तथा मिजोरम पीपुत्स कॉन्फ्रेंस को 1 सीटें मिलीं थीं।

कांग्रेस को 44.63 प्रतिशत, मिजो नेशनल फ्रंट को 28.65 प्रतिशत, भाजपा को 0.37 प्रतिशत, एमपीसी 6.15 प्रतिशत जेडएनपी को 17.42 प्रतिशत मत मिला था। तेलंगाना में 120 सीटों में से तेलंगाना राष्ट्र समिति को 63 सीटें, तेदेपा को 12, भाजपा को 5, वाईएसआर को 3, बसपा को 2, अन्य को 2, कांग्रेस 17, एआईएमआईएम को 7, भाकपा को 1, माकपा को 1 सीटें थीं, लेकिन 19 निर्दलीय टीआरएस में शामिल हो जाने से उसकी संख्या 82 हो गई।

अब जरा लोकसभा चुनाव के अनुसार विचार करें। मध्यप्रदेश में भाजपा को 163 एवं कांग्रेस को 75 तथा बसपा को 2 विधानसभा सीटों पर बढ़त थी। मिजोरम में कांग्रेस 21 तथा निर्दलीय 19 सीटों पर आगे थी।

राजस्थान में भाजपा 180 तथा कांग्रेस केवल 11 सीटों पर आगे थी। छत्तीसगढ़ में भाजपा को 48.90 प्रतिशत तथा कांग्रेस को 38.40 मत मिले तो विधानसभा का एक प्रतिशत से कम का अंतर 10 प्रतिशत से ज्यादा अंतर में परिणत हो गया।

मध्यप्रदेश में भाजपा को 54 प्रतिशत तथा कांग्रेस को 34.90 प्रतिशत मत मिले। यह करीब 19 प्रतिशत का अंतर है। राजस्थान में भाजपा को 50.90 प्रतिशत तथा कांग्रेस को 30.40 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। यहां तो करीब 20.50 प्रतिशत का अंतर। ये अंतर काफी बड़े हैं।

तेलंगाना में टीआरएस 33.90 प्रतिशत, कांग्रेस को 20.5 प्रतिशत, भाजपा 8.50 प्रतिशत, तेदेपा को 3.10 प्रतिशत, युवजन श्रमिका रीथू कांग्रेस पार्टी को 2.90 प्रतिशत, एआईएमआईएम को 1.40 प्रतिशत मत मिला था।

इस तरह लोकसभा चुनाव के अनुसार भी कांग्रेस से टीएसआर भारी मतों से आगे थी। 2013 के चुनाव परिणाम के बाद हुए एक सर्वेक्षण में काफी लोगों ने बताया था कि उन्होंने मतदान करते समय केंद्र सरकार के कार्यों को भी ध्यान में रखा।

जाहिर है, यूपीए की छवि का पूरा असर चुनाव पर था। मोदी की तीन राज्यों में 53 रैलियां कराई गईं और सबमें भीड़ उम्मीद से अधिक आई। छत्तीसगढ़ के परिणामों से साफ हो गया था कि अगर मोदी नहीं होते तो रमण सिंह सत्ता से बाहर हो जाते।

तीनों प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व के बीच आंतरिक कलह भी उसके बुरे प्रदर्शन का कारण था। इस समय केंद्र में उसकी सरकार नहीं है तथा तीनों जगह पार्टी लगभग एकजुट है। छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश में 15 वर्षों की सरकार होने के कारण कुछ लोग बदलाव चाहने वाले भी होंगे।

इससे आम विश्लेषण यही है कि कांग्रेस को इसका लाभ मिलना चाहिए, किंतु छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी तथा बसपा के बीच समझौते से कांग्रेस के रास्ते बाधाएं आ गईं है। जोगी के साथ मिलने से इस बार तीसरी शक्ति उभरने की संभावना बन गई है।

मध्यप्रदेश में भी बसपा ने अलग लड़ने का ऐलान कर दिया है। 2019 के चुनाव को देखते हुए महागठबंधन की जो चर्चा चल रही हैं कांग्रेस की पहली परीक्षा इन राज्यों मे होनी है। छत्तीसगढ़ में यह सफल नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में भी पूर्ण गठबंधन की संभावना नहीं है।

यही स्थिति राजस्थान की है। इससे 2019 की दृष्टि से भाजपा राहत की सांस ले सकती है, किंतु उसके लिए इन तीन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करना अपरिहार्य है। ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस एवं विपक्षी दल यह प्रचारित करेंगे कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अपराजेय नहीं है।

इससे भाजपा के आत्मविश्वास में कमी आएगी तथा कांग्रेस का उत्साह बढ़ेगा एवं वह अन्य दलों के साथ प्रभाव स्तर पर गठबंधन के लिए बात कर सकेगी,

लेकिन अगर परिणाम इसके विपरीत आ गया तो फिर 2019 में वह नए उत्साह के साथ उतरेगी और परिणाम अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करेगी। इस तरह ये चुनाव दोनों पक्षों के लिए 2019 की दृष्टि से करो या मरो का प्रश्न है।

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